सर्जरी के दौरान वो बेहोशी से जाग गई, और फिर..

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मैंने पहले भी कई बार एनेस्थेसिया लिया था, लेकिन ऐसा अनुभव कभी नहीं हुआ.

ये कहना था कनाडा के एक छोटे से शहर में बहुत सक्रिय जीवन जीने वाली डोना पेन्नर का.

लेकिन 2008 में उन्हें एक मामूली ऑपरेशन के लिए मैनिटोबा के ग्रामीण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और इसके बाद उन्हें नींद न आना, बेचैनी, रात में डर लगना, तनाव जैसे लक्षणों से गुज़रना पड़ा.

हालाँकि इन्हीं लक्षणों से जुड़ी एक कहानी जब उन्होंने वैज्ञानिकों को सुनाई तो वैज्ञानिकों को इस समस्या को सुलझाने में बड़ी मदद मिली.

चींटियों के पास ग़ज़ब का दिमाग़

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डोना कहती हैं, "किन्हीं वजहों से उस दिन मैं कुछ घबराई हुई थी. ये लेप्रोस्कोपी थी यानी ऐसी प्रक्रिया जिसमें पेट में कुछ जगह चीरे लगाए जाते हैं."

वो आवाज़ें मुझे डरा रहीं थीं

वो बताती हैं, "उन्होंने मुझे ऑपरेशन टेबल पर लिटा दिया और अपना काम करने लगे. उन्होंने मेरे शरीर में कई तार लगाए, जो मॉनिटर से जुड़े थे. मुझे एनेस्थेसिया भी दिया गया, पहले इंजेक्शन से और फिर मास्क के ज़रिए. इसके बाद मुझे लंबी-लंबी सांसें लेने को कहा गया."

डॉक्टरों ने जैसा कहा, डोना ने वैसा ही किया और जैसा कि उम्मीद थी, जल्द बेहोश हो गईं.

डोना कहती हैं, "जब मैं जगी तो मैं ऑपरेशन के कमरे की आवाज़ों को सुन सकती थी. मशीन की आवाज़, लोगों के चलने की आवाज़, डॉक्टरों की हाथों में कैंचियों की आवाज़....."

डोना कहती हैं, "मैंने सोचा कि सब कुछ खत्म हो गया है!"

मैं दवा के असर में थी, लेकिन होश में थी.

कसरत करें वरना जल्द आएगा बुढ़ापा

कुछ देर बाद मैंने सुना कि सर्जन कुछ कह रहे थे. डोना आगे बताती हैं, "लेकिन जैसे ही सर्जन के मुंह से निकला, छुरी प्लीज़, मैं सहम गई."

लेकिन डोना हिलडुल नहीं सकती थीं, क्योंकि उन्हें एनेस्थेसिया के साथ-साथ न्यूरोमस्कुलर ब्लॉकर भी दिया जाता है, जिससे मरीज़ को पैरालाइसिस न हो जाए.

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वो बताती हैं, "ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि जब वो पेट के निचले हिस्से को चीरें-फाड़ें, तो मांसपेशियां शिथिल हों. बदकिस्मती ने एनेस्थेसिया विफल रहा, लेकिन मैं हिल-डुल नहीं पा रही थी."

डोना कहती हैं, "मैं डर गई थी, मैं कुछ देर रुकी, लेकिन फिर मुझे दर्द का आभास हुआ....इतना तेज़ दर्द कि उसे बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. मैं अपनी आँखें नहीं खोल पा रही थी. मैंने उठने की कोशिश की, लेकिन मैं हिल नहीं सकती थी. मैं ऐसा महसूस कर रही थी जैसे कि कोई मेरे ऊपर बैठा हुआ हो. दर्द इतना भयानक था कि मेरे आँसू निकलने शुरू हो गए थे, लेकिन मैं पैरालाइज्ड थी कि रोना तो दूर आंसू भी नहीं गिरा सकती थी."

'सब कुछ आँखों के सामने हो रहा था'

ऑपरेशन ऐसा चल रहा था मानो कुछ हुआ ही न हो.

डोना याद करती हैं, "मॉनीटर की आवाज़ से मैं सुन सकती थी कि मेरी दिल की धड़कन कितनी तेज़ चल रही थी."

कम से कम तीन मौके ऐसे आए जब मैंने अपनी पूरी ताकत को समेटते हुए अपने पैर को हिलाने की कोशिश की, लेकिन आखिरी क्षणों में मैंने ऐसा नहीं किया.

करीब डेढ़ घंटे तक चली इस सर्जरी में डोना की इस गतिविधि पर किसी का ध्यान नहीं गया.

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डोना बताती हैं, "मैं सुन सकती थी कि वो क्या बातें कर रहे हैं और क्या कर रहे हैं. मैं महसूस कर सकती थी कि वो कैसे मेरे पेट के निचले हिस्से पर चीरा लगा रहे हैं और कैसे मैंने अपने अंगों को हिलाया था."

मैं सुन सकती थी कि कैसे सर्जन कह रहे थे कि अपैंडिक्स को देखो, ये गुलाबी है, बड़ी आंत ठीक लग रही है, गर्भाशय भी ठीक है......

मैं मशीन से सांस ले रही थी, जिसके जरिए मुझे एक मिनट में सात बार ही ऑक्सीजन दी जा रही थी, लेकिन जिस तरह के हालात थे मेरी दिल की धड़कन 148 प्रति मिनट पहुँच गई थी.

जब ऑपरेशन खत्म होने को था तो डोना ने नोटिस किया कि वो अपनी जीभ कुछ हिला पा रही हैं.

नई मुसीबत

डोना कहती हैं, "सांस लेने के लिए जो नली मेरे मुंह में डाली गई थी, मैंने उसे जीभ से हिलाना शुरू किया ताकि इस तरफ लोगों का ध्यान जा सके. मैंने ऐसा किया, लेकिन उन्होंने सोचा कि मरीज में ऐसा करने की ताकत नहीं होगी, इसलिए उन्होंने नली को हटा दिया."

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मैं नई मुसीबत में पड़ गई थी. दर्द इतना भयानक था कि मुझे लग रहा था कि मैं मरने जा रही हूँ. मैं सांस भी नहीं ले पा रही थी.

तभी नर्स चिल्लाई, "डोना सांस लो...सांस लो!"

और तब मेरे साथ सबसे हैरतअंगेज़ बात हुई. मैं ईसाई हूँ और मैं नहीं कह सकती कि मैं स्वर्ग में थी, लेकिन कम से कम में धरती पर नहीं थी. मैं कहीं और थी. डर और दर्द अब जा चुका था. मैं गर्म, सहज और सुरक्षित महसूस कर रही थी. मैं महसूस कर सकती थी कि मैं अकेली नहीं थी. मेरे साथ कोई और भी था. मैं हमेशा कहती हूँ कि वो ईश्वर था, क्योंकि मुझे कोई शक़ नहीं है कि वो वहाँ मेरे साथ थे.

तभी मैंने सुना, "तुम्हें कुछ नहीं होगा, तुम ठीक हो जाओगी."

मैं पहले मन ही मन प्रार्थना कर ही होती थी, अपने पति और बच्चों के बारे में सोच रही होती थी, लेकिन जब मैंने इस मौजूदगी को महसूस किया तो मैंने कहा, "मुझे घर ले चलो, मुझे मरने दो...क्योंकि मैं अब और खड़ा नहीं हो सकती."

दोष किसी को नहीं

तभी मुझे महसूस हुआ कि वह लौट गया है. मुझे फिर से ऑपरेशन कक्ष में ले जाया गया.

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तब तक शायद डॉक्टरों को लग गया था कि कुछ गड़बड़ है. फिर सर्जन मेरे कमरे में आए कहा, "मुझे बताया गया है कि कोई गड़बड़ थी."

जिसके जवाब में मैंने कहा कि जब वो छुरी चला रहे थे तो मुझे महसूस हो रहा था. डॉक्टर ने मेरा हाथ पकड़कर कहा कि उन्हें इसका बहुत दुख है.

मनोचिकित्सकों का कहना है कि ऐसे मामलों में मरीज़ पर लंबे समय तक बुरा असर रहता है, लेकिन मेरे मामले में क्योंकि मैं लगातार अपना दर्द बयां कर पा रही थी, इसलिए इससे उबर पाना आसान रहा.

डोना कहती हैं, "अपने मामले में मैं किसी पर दोष नहीं मढ़ती. मैं चाहती हूँ कि लोग इससे सबक सीखें."

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