ट्रंप पहले आते तो ये दिग्गज कहां जाते?

डोनल्ड ट्रंप इमेज कॉपीरइट Getty Images

आप्रवासियों को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नीति ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है. फिलहाल उन्होंने सात मुल्क़ों के नागरिकों के अमरीका आने पर पाबंदी लगाई है.

आशंका है कि कुछ और मुल्क़ों के नाम भी इस फ़ेहरिस्त में जुड़ सकते हैं. ट्रंप का कहना है कि अमरीका को सुरक्षित बनाने के लिए ये क़दम उठाना ज़रूरी है और वे अपने फ़ैसले ने पीछे हटने को तैयार नहीं.

ट्रंप को ब्रिटेन आने से रोकने के लिए हस्ताक्षर अभियान

निंदा करनेवाली अटॉर्नी जनरल सैली येट्स को ट्रंप ने किया बर्खास्त

ज़ाहिर है ट्रंप की नीति का सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जो बाहर से जाकर वहां बसे थे. लेकिन अमरीका का अतीत देखें,तो वो ऐसे दिग्गजों से भरा पड़ा है जिन्होंने अपनी काबिलियत के दम पर दुनिया में शोहरत कमाई.

ट्रंप के बैन से किसका चैन गया, किसकी उड़ी नींद

फ़ैसले की चौतरफ़ा निन्दा, पर ट्रंप अड़े

सवाल उठ रहे हैं कि अगर ट्रंप पहले राष्ट्रपति बने होते और इस तरह की नीति पहले लागू होती तो इन लोगों का क्या होता.

अमरीका को 'महान' बनाने वाले लोगों में कई ऐसे हैं जो मूल रूप से अमरीकी नहीं थे और बाहर से आकर यहां बसे थे. ऐसे ही कुछ लोगों की कहानी ये रही:

अल्बर्ट आइंस्टी

इमेज कॉपीरइट AFP

E = mc2 जैसी दुनिया की सबसे मशहूर इक्वेशन और सापेक्षता का नियम समझाने वाले वाले इस महान वैज्ञानिक का जन्म साल 1879 में जर्मनी में हुआ था, लेकिन उन्होंने अमरीका को अपना घर बनाया.

फ़रवरी, 1933 में वो अमरीका दौरे पर गए तो उन्हें इस बात का इल्म था कि एडॉल्फ़ हिटलर के बढ़ते प्रभुत्व की वजह से वो अपने देश नहीं लौट पाएंगे. कई साल अलग-अलग जगह गुज़ारने के बाद वो साल 1940 में अमरीकी नागरिक बन गए. साल 1955 में अमरीका के न्यू जर्सी में उन्होंने अंतिम सांस ली.

मैडलिन अलब्राइट

इमेज कॉपीरइट Reuters

पूर्ववर्ती चेकोस्लोवाकिया के प्राग में मेरी जेन कोरबेलोवा के रूप में जन्मी मैडलिन अलब्राइट अमरीका में जाकर बसीं और सियासत की सीढ़ियां चढ़ते हुए वहां की पहली महिला विदेश मंत्री बनीं.

साल 1996 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उन्हें नामित किया और सीनेट ने 99-0 की सर्वसम्मति से उनके नाम पर अंतिम मुहर लगाई. साल 1948 में उनका परिवार ग्रेट ब्रिटेन से अमरीका पहुंचा और वहां उन्होंने राजनीतिक शरण मांगी जिसे मंज़ूर कर लिया गया.

सर्गेइ ब्रिन

इमेज कॉपीरइट Getty Images

जिस गूगल पर दुनिया के ज़्यादातर लोग अपने सवालों के जवाब खोजते हैं, उसकी नींव रखने वाले सर्गेइ मिखाइलोविच ब्रिन भले आज अमरीका के दिग्गज आंत्रप्रेन्योर हों, लेकिन उनका घर पहले रूस हुआ करता था.

ब्रिन का जन्म रूसी यहूदी दंपत्ति के घर मॉस्को में हुआ था. उनके पिता मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफ़ेसर थे और उनकी मां नासा के गोडार्ड स्पेस फ़्लाइट सेंटर में रिसर्चर हैं. ट्रंप के फ़ैसले पर ब्रिन का कहना है, ''दूसरे कई लोगों की तरह इस आदेश से मैं भी नाराज़ हूं क्योंकि मैं भी आप्रवासी और शरणार्थी रहा हूं.''

सलमा हायेक

इमेज कॉपीरइट Getty Images

जिस मेक्सिको की सरहद पर अमरीकी राष्ट्रपति दीवार खड़ा करना चाहते हैं, वहीं से आई एक नायिका ने अमरीका में ख़ासा नाम कमाया है. सलमा हायेक का जन्म मेक्सिको के वेराक्रूज़ में हुआ था.

वो साल 1991 में एक्टिंग की पढ़ाई करने के लिए कैलिफ़ोर्निया आईं और फिर कामयाबी मिलने के बाद यहीं की हो गईं. बाहर से आकर हॉलीवुड में छाने वाली सलमा अकेली नहीं हैं. जानी-पहचानी अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप ने हाल में एक पुरस्कार समारोह में कहा था कि अगर बाहर के लोगों पर पाबंदी लगती थी तो हॉलीवुड खाली हो जाता.

याओ मिंग

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमरीका में बास्केटबॉल को लेकर गज़ब दीवानगी है और चीन से आने वाले 7 फ़ुट, 6 इंच लंबे एक खिलाड़ी ने धमाका कर दिया था. याओ मिंग अब रिटायर हो चुके हैं, लेकिन साल 2002 में जब उन्हें ह्यूस्टन रॉकेट्स के लिए चुना गया तो पूरी दुनिया में ख़बर बनी. वो चार बार एनबीए प्लेऑफ़ में पहुंचे.

अपने अंतिम सीज़न में वो एनबीए में खेलने वाले सबसे लंबे खिलाड़ी थे. पिछले साल उन्हें शेकिल ओ नील और एलन इवर्सन के साथ नाइस्मिथ मेमोरियल बास्केटबॉल हॉल ऑफ़ फ़ेम में शामिल किया गया.

जैकी चेन

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अपनी नई फ़िल्म 'कुंगफ़ू योगा' के प्रचार के लिए हाल में भारत आए जैकी चेन को अमरीका के हॉलीवुड में सबसे बड़े तमग़े से नवाज़ा गया है. हांगकांग में जन्मे चैन कोंग-सॉन्ग ने अपने कुंगफ़ू और कॉमिंग टाइमिंग से दुनिया भर में नाम कमाया. वो 150 से ज़्यादा फ़िल्मों में नज़र आ चुके हैं.

उन्हें हांगकांग एवेन्यू ऑफ़ स्टार्स और हॉलिवुड वॉक ऑफ़ फ़ेम में जगह दी गई है. चैन केंटोनीज़, मंदारिन, अंग्रेज़ी और अमरीकी साइन लैंग्वेज़ जानते हैं. उन्हें फ़ुटबॉल ख़ासी पसंद है.

स्टीव जॉब्स

इमेज कॉपीरइट Getty Images

मोबाइल फ़ोन की दुनिया में आईफ़ोन की क्या जगह है - ये हम सभी जानते हैं और उसे बनाने वाली कंपनी एप्पल अमरीका की शान मानी जाती है. लेकिन अगर बाहरी लोगों के अमरीका में बसने पर पाबंदी होती, तो ये कंपनी कभी ना बनती.

क्योंकि इसे खड़ा करने वाले स्टीव जॉब्स सीरियाई इमिग्रेंट के बेटे थे और अगर वो विस्कोंसिन में आकर ना बसे होते तो अमरीका को ये दिग्गज कंपनी ना मिलती. एप्पल की कमान संभाल रहे टिम कुक का कहना है कि दूसरे लोगों की तरह वो भी चिंतित हैं और इस नीति का समर्थन नहीं करते.

पियरे ओमिदयार

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमरीकी ई-कॉमर्स कंपनी ईबे इंक दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल है. लेकिन आपको ये जानकर हैरानी हो सकती है कि इस कंपनी को खड़ा करने वाले पियरे मोराद ओमिदयार फ्रांस में जन्मे ईरानी-अमरीकी उद्यमी हैं.

उनका जन्म पेरिस में हुआ था और उनके ईरानी इमिग्रेंट माता-पिता ने उन्हें पढ़ाई के लिए फ़्रांस भेजा. ईरानी माता-पिता ने उन्हें परवेज़ नाम दिया था. उन्होंने अमरीका को घर बनाया और कामयाबी ने उन्हें अपनाया. साल 2017 में पियरे ओमिदयार की नेटवर्थ 8.1 अरब डॉलर रही.

जोसफ़ पुलित्ज़र

इमेज कॉपीरइट Getty Images

दुनिया के सबसे बड़े प्रकाशक कहे जाने वाले जोसफ़ पुलित्ज़र ने भी अमरीका को अपना घर बनाया. हंगरी में जन्मे पुलित्ज़र साल 1864 में अमरीका के बॉस्टन पहुंचे. उस वक़्त उनकी उम्र 17 बरस थी.

आगे चलकर वो डेमोक्रेटिक पार्टी के दिग्गज नेता बने. बड़े कारोबारियों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और स्टैचू ऑफ़ लिबर्टी को न्यूयॉर्क में बनाए रखने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई.

मेरी अने मक्लाउड हब्रिडिएन

इमेज कॉपीरइट MIRRORPIX

ये नाम पढ़ने के बाद आपके ज़हन में सवाल आ सकता है कि इन्होंने ऐसा क्या ख़ास किया है. दरअसल, ये नाम इसलिए ख़ास है क्योंकि ये नए अमरीकी राष्ट्रपति की मां का है.

डोनल्ड ट्रंप की मां मेरी अने मक्लाउड हब्रिडिएन आइलैंड ऑफ़ लुइस में पली-बढ़ीं थीं, लेकिन बाद में वह न्यूयॉर्क आ गई थीं. मेरी अने उन दसियों हज़ार स्कॉटिश लोगों में से एक थीं जिन्होंने 20वीं सदी के शुरुआती सालों में आर्थिक संकट से बचने के लिए अमरीका और कनाडा का रुख किया था.

इमेज कॉपीरइट Reuters

मार्टिना नवरातिलोवा, सुब्रमण्यन चंद्रशेखर, एंग ली, इंद्रा नूई, विनोद धाम, रजत गुप्ता, सुंदर पिचाई, गुरबख़्श चाहल...ये कुछ और नाम हैं जो दुनिया के अलग-अलग कोनों से अमरीका पहुंचे और अपने साथ-साथ उसका सम्मान भी बढ़ाया.

और संभावनाएं तलाशकर बुलंदी तक पहुंचे आप्रवासी अमरीकियों की कुल संख्या इससे कहीं आगे है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे