चीनी कहते हैं, 'भारत में है करुणा की कमी'

भारत में 54 साल से फंसे चीन के नागरिक वांग छी पर बीबीसी की कहानी पर भारत में चीन के दूतावास ने कहा है कि उन्हें वांग छी से सहानुभूति है और वो उनको लगातार मदद देते रहे हैं.

दूतावास ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि इस मामले को संतोषजनक तौर पर सुलझा लिया जाएगा.

वांग छी मध्य प्रदेश के तिरोड़ी गांव में अपने परिवार के साथ रहते हैं.

उनका कहना है कि 1962 भारत-चीन युद्ध के कुछ वक्त बाद वो गलती से भारतीय इलाके में आ गए थे और उन्हें भारतीय सैनिकों के हवाले कर दिया गया.

उधर भारतीय दस्तावेज़ों के मुताबिक वांग छी भारत में "बिना अनुमति घुस आए" और "अपनी पृष्ठभूमि के बारे में भारतीय अधिकारियों को गलत जानकारी दी".

वांग छी ने सात साल विभिन्न भारतीय जेलों में गुज़ारे और फिर उन्हें पुलिस ने मध्य प्रदेश के एक गांव तिरोड़ी में छोड़ दिया.

54 साल से भारत में फंसा चीनी सैनिक

1963 में भारत में पकड़े गए वांग छी क्यों वापस नहीं जा सके - वीडियो देखें

वांग छी तब से लगातार वापस अपने परिवार से मिलने के लिए चीन जाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि उन्होंने तिरोड़ी में शादी की और उनका परिवार भी है.

चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स में छपी एक ख़बर के मुताबिक दिल्ली में चीन के दूतावास ने भारतीय अधिकारियों को 2013 में वांग छी मामले से जुड़ी एक अर्ज़ी दी थी, लेकिन उस पर अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है और इस कारण गतिरोध जारी है.

बीबीसी द्वारा भारतीय गृह मंत्रालय को भेजे गए सवालों का अभी तक कोई जवाब नहीं मिल पाया है.

उधर इस खबर के बीबीसी चीनी सेवा और अंग्रेज़ी सेवा की वेबसाइट पर छपने के बाद चीन के कई स्थानीय मीडिया संस्थानों ने इसे प्रकाशित किया है.

बीबीसी चीनी सेवा के मुताबिक चीन के लोग लगातार वांग छी के बारे में प्रतिक्रिया दे रहे हैं और उन्होंने वांग छी से सहानुभूति जताई है.

कई लोगों ने बीबीसी चीनी सेवा के फ़ेसबुक पन्ने पर अपनी प्रतिक्रिया भी दी है.

चियान फ़े लिन ने बीबीसी चीनी सेवा के फ़ेसबुक पन्ने पर सीधे वांग छी को लिखा, "इस लड़ाई को कई दशकों पहले जीत लिया गया. वक्त है घर आने का."

ही वानयुन ने सिना डॉट कॉम डॉट सीएन (sina.com.cn) पर लिखा, "इसे लड़ाई के बाद सुलझा लिया जाना चाहिए था जब युद्धबंदियों या फिर उनके शवों की अदला-बदली की जाती है. ऐसा कभी नहीं होना चाहिए था. कितनी विचित्र घटना है."

कई पाठकों ने वांग छी की स्थिति के लिए भारत को ज़िम्मेदार ठहराया.

चिन माओ लिन ने बीबीसी चीनी सेवा के फ़ेसबुक पन्ने पर लिखा, "युद्धविराम के बाद चीनी पक्ष ने सभी भारतीय युद्धबंदियों को उनके हथियारों और सामान के साथ रिहा कर दिया. भारतीय सरकार में इंसानी करुणा नहीं है."

लियुमिंग ने लिखा, "मैंने लेख पढ़ा. साफ़ है कि भारत ने उनके साथ जान-बूझकर अच्छा व्यवहार नहीं किया. ये बहुत बुरी बात है."

कई लोगों ने चीन की सरकार पर भी आरोप लगाए हैं कि वो अपने नागरियों को बचा पाने में नाकाम रही है.

मानमान चेनमो ने सीना डॉट कॉम डॉट सीएन (sina.com.cn) पर लिखा, "हमारे देश ने उनके साथ अच्छा नहीं किया."

ह्यू यू ने बीबीसी चीनी सेवा के फ़ेसबुक पन्ने पर लिखा, "वो पार्टी और देश के लिए लड़ रहे थे, लेकिन उन्हें पार्टी और देश ने त्याग दिया."

एक पाठक ने सीना डॉट कॉम डॉट सीएन पर लिखा, "हमने इतने सारे भारतीय युद्धबंदियों को छोड़ा, लेकिन हमें नहीं पता कि हममें से एक लापता है? वो किस रेजीमेंट के हैं, ये पता करना आसान था."

मेडिंग शियाओचाओरेन ने लिखा, "भारतीय नौकरशाहों को ज़िम्मेदार मत ठहराइए. ये हम हैं जिन्होंने अपने हीरो को गंभीरता से नहीं लिया. इस घटना से मैं थर्रा गया हूं."

कुछ पाठकों ने ये भी लिखा कि अगर वांग छी लड़ाई के बाद चीन वापस आ जाते तो उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता.

जियार्जिओ ये ने साइना डॉट कॉम डॉट सीएन (sina.com.cn) पर लिखा, "अगर वो चीन वापस आ जाते, उन्हें भी युद्धबंदी ही माना लिया जाता और वो रेड गार्ड्स के हाथों मारे जा सकते थे. कोरियाई युद्ध से वापस आए बंदियों की तक़दीरों को ही देख लीजिए."

खुद को जस्ट पीपो कहने वाले एक व्यक्ति ने लिखा, "हमें कूटनीतिक तरीका चाहिए. ऐसे व्यक्ति ने जिसने अपनी ज़िंदगी देश के नाम कर दी, ये अच्छा होगा कि अगर हम एक संतोषजनक निष्कर्ष की ओर बढ़ें."

चुआन बीज़िंग नाओचान ने लिखा, "ये कहानी पश्चिमी मीडिया ने कैसे खोज निकाली? चीन की मीडिया बस मनोरंजन और सनसनीखेज़ खबरों को ढूंढ निकालने में ही अच्छी है."

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