नवाज़ की जीवनी...कभी बच्चों से पूछा कैसी लगी?

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सुबह पंजाब की तमाम सरकारी लाइब्रेरी और कॉलेजों को आदेश दिया गया है कि वे नवाज़ शरीफ़ की ज़िंदगी और कारनामों पर लिखी हुई पुस्तक- नवाज शरीफ़ दस्ताने हयात ख़रीदें, ताकि अगली पीढ़ियां पाकिस्तानी इतिहास में पहली बार तीन बार प्रधानमंत्री बनने वाले नवाज़ शरीफ़ के जीवन से कुछ सीख सकें.

ये तो मालूम नहीं है कि इस पुस्तक से अगली पीढ़ियों को कोई फ़ायदा होगा. मगर किताब का लेखक सौ प्रतिशत धन्य हो जाएगा.

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'इंसाफ अंधा ही नहीं, बहरा और गूंगा भी चलेगा'

नवाज़ शरीफ़ और उनके बच्चों को इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में पनामा पेपर्स के अनुसार लंदन के चार अपार्टमेंट्स के मालिकी के संदर्भ में जाँच का सामना करना है. इस बारे में नवाज़ शरीफ़ भरी एसेंबली में कह चुके हैं- मेरी ज़िंदगी खुली किताब है.

मगर पनामा पेपर्स का मुकदमा सुनने वाले एक जज ने कहा कि नवाज़ की खुली किताब में से कुछ पन्ने शायद ग़ायब हैं. हो सकता है कि अब पंजाब की लाइब्रेरी और कॉलेजों में, नवाज़ शरीफ़ की जो जीवन कहानी बेचने की सरकारी योजना हो रही है, उसमें वो ग़ायब पन्ने भी शामिल हों, जो श्रीमान न्यायाधीश ढूंढ़ रहे हैं.

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पुराने जमाने में बादशाहों को चूंकि चार-पांच वर्ष बाद चुनाव नहीं झेलना पड़ता था, इसलिए वो अपने कारनामों का ढिंढ़ोरा पीटने का काम इतिहासकारों पर छोड़ देते थे और पसंदीदा इतिहासकारों के खान-पान का भी ख़्याल रखते थे. चुनांचे हर राजा और बादशाह का जमाना कम से कम इतिहास के पन्नों पर तो शानदार नज़र आता है.

लेकिन आज के बादशाहों को यक़ीन नहीं कि वे कितने समय तक पद पर टिके रहेंगे. इसलिए उनकी कोशिश होती है कि ख़ुद ही अपना नाम इतिहास में टांक लें. और इसके लिए सबसे बेहतर खूंटी सरकारी लाइब्रेरी और शिक्षण संस्थाएं ही हैं जिनमें गधे की तरह कोई भी किताब लादी जा सकती है.

भारत और पाकिस्तान में आप बोर नहीं होंगे

जनरल परवेज़ मुशरर्फ़ और उस जमाने के पंजाब के मुख्यमंत्री परवेज़ इलाही ने भी अध्ययन पुस्तकों के सहारे ही अगली पीढ़ी के दिल में बसने की कोशिश की मगर अगली सरकार ने आते ही इन पुस्तकों से इन श्रीमानों का नाम ऐसे मिटाया जैसे ब्लैकबोर्ड पर लिखा मिटाया जाता है.

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पुस्तकबाजी का फैशन असल में फ़ील्डमार्शल अयूब ख़ान की सरकार ने शुरू किया था. लेकिन उन्होंने शायद अगली पीढ़ियों का जीवन सफ़ल करने के लिए अपनी जीवन कथा फ्रेंड्स नॉट मास्टर्स इतनी बड़ी संख्या में छपवा लीं कि रद्दी बेचने वालों की अगली पीढ़ियां भी संवर गई. और आज वो किताब फुटपाथ पर भी देखे से नहीं मिलती.

जब हम प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे तो उस समय अयूब ख़ान की तस्वीर नीचे लिख रहता है- ये हमारे प्यारे सदर फ़ील्ड मार्शल अयूब ख़ान हैं. इन्हें मुल्क और कौम की भलाई का हर वक्त ध्यान रहता है.

'लो अब कटोरा भी नज़र नहीं आ रहा'

समय बदला तो अयूब ख़ान की जगह याहिया ख़ान और फिर भुट्टो साब और फिर ज़िया उल हक़ की तस्वीर आ गई है लेकिन नीचे का लिखा ज्यों का त्यों रहा- इन्हें मुल्क और कौम की भलाई का हर वक्त ध्यान रहता है.

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ख़ास ये लोग मुल्क और कौम की भलाई के बारे में हर वक्त सोचने के बजाए कुछ कर जाते तो ये मुल्क कहीं का कहीं पहुंच जाता था मगर हुआ ये कि इन लोगों की वजह से मुल्क कहीं का कहीं पहुंच गया.

भारत का बताइए, क्या वहां भी प्रधानमंत्री बच्चों की टेक्स्ट बुक में घुसकर हर वक्त देश और कौम की भलाई का सोचता रहता है?

कोई कहेगा तुग़लक़ बेवकूफ बादशाह था?

अगर ऐसा है तो कभी बच्चों से भी पूछ लें कि वे उन्हें देखकर क्या-क्या सोचते हैं? हमारे यहां तो जो सोचते हैं वो मैं केवल कान में ही बता सकता हूं.

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