जब जनरल ने आधा देश दे कर उधार चुकाया

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3 दिसंबर, 1971 की दोपहर जनरल याहया ख़ान ने अपने एडीसी स्कवार्डन लीडर अरशद समी ख़ाँ से कहा कि चार बजे जनरल हमीद राष्ट्रपति भवन आएंगे और फिर हम लोग साथ एक जगह जाएंगे जिसके बारे में मैं तुम्हें भी नहीं बताना चाहता.

ठीक चार बजे जनरल हमीद खुद अपनी टोयोटा मिलिट्री जीप चलाते हुए राष्ट्रपति भवन पहुंचे. उनका एडीसी उनकी बगल में बैठा हुआ था. जैसे ही कार रुकी उनका एडीसी पीछे आ गया.

आगे की सीट पर जनरल याहया और जनरल हमीद बैठे. पीछे की सीट पर दोनों के एडीसी सवार हुए. जैसे ही जीप आगे बढ़ी एक बहुत बड़ा गिद्ध उसके सामने आ कर बैठ गया. जनरल हमीद ने धीरे धीरे जीप बढ़ानी शुरू की लेकिन गिद्ध ने हिलने का नाम नहीं लिया. उन्होंने हॉर्न बजाया लेकिन गिद्ध ने उतनी ही हिकारत से उन्हें घूरा. याहिया ने भी जीप से कूद कर अपने बेंत से उसे भगाने की कोशिश की. लेकिन गिद्ध टस से मस नहीं हुआ.

माजरा देख कर पास काम कर रहा माली दौड़ता हुआ आया और अपने फावड़े से गिद्ध को भगाने की कोशिश करने लगा. गिद्ध ने बहुत मुश्किल से रास्ता छोड़ा और जनरल याहया की जीप आगे बढ़ी.

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ये सब लोग एक भवन के बाहर पहुंचे जो बाहर से एक गोदाम की तरह दिखाई देता था. हॉर्न बजाने पर एक संतरी बाहर निकला. जनरल याहया को पहचानते ही उसने उन्हें एक स्मार्ट सेल्यूट किया और गेट खोल दिया. पोर्च में पाकिस्तान वायुसेनाध्यक्ष एयर मार्शल रहीम ख़ाँ ने उन सबका स्वागत किया.

ये पाकिस्तानी वायुसेना का मुख्यालय था, जिसे आम लोगों से छिपा कर रखा गया था. जब तक ये सब लोग अंदर पहुंचते, पाकिस्तान के एफ़-86 बमवर्षक भारत के हवाई ठिकानों पर हमला करने के लिए उड़ान भर चुके थे.

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वायुसेना मुख्यालय पर आधा घंटा बिताने के बाद याहया ने राष्ट्पति भवन लौटने का फ़ैसला किया. अभी उनकी जीप रास्ते में ही थी कि हवाई हमले के सायरन बजने लगे.

स्कवाड्रन लीडर अरशद समी ने बीबीसी को बताया, "हमने देखा कि हमारे ऊपर से नीची उड़ान भरते हुए कुछ युद्धक विमान गुज़र गए. याहया ने ड्राइवर से कार रोक कर उसकी लाइट बुझाने के लिए कहा. तभी दूसरी तरफ़ से तेज़ी से विमान आते दिखाई दिए. याहया ने बहुत गर्व से कहा, ये हमारे इंटरसेप्टर्स हैं."

ये लड़ाई याहया की उम्मीदों के ख़िलाफ़ गई और जल्द ही उन्हें हर मोर्चे से नाकामयाबियों की ख़बर मिलने लगी. जब चीन से मदद की सारी उम्मीदें ख़त्म हो गईं तो उन्होंने मजबूरन अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को फ़ोन लगाया.

अरशद समी ख़ाँ ने बताया, "याहया ने जब निक्सन को फ़ोन किया तो वो किसी मीटिंग में थे. 13 दिसंबर, 1971 की रात दो बजे राष्ट्पति भवन के टेलिफ़ोन ऑपरेटर ने मुझे फ़ोन किया कि राष्ट्रपति निक्सन लाइन पर हैं. मैंने इंटरकॉम से फ़ोन कर याहया को जगाया. नींद में चूर याहया ने फ़ोन उठाया. लाइन बहुत ख़राब थी, इसलिए याहया ने मुझसे कहा कि मैं दूसरी लाइन पर सारी बातें सुनूँ और लाइन टूट जाए तो निक्सन से बात करना जारी रखूँ."

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"निक्सन की बातों का लब्बोलुआब था कि वो पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए बहुत चिंतित हैं और उन्होंने उसकी मदद के लिए सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया है. जैसे ही निक्सन ने फ़ोन रखा, याहया ने मुझसे कहा कि मैं जनरल हमीद को फ़ोन लगाऊं. जैसे ही हमीद ने फ़ोन उठाया, याहया लगभग चिल्लाते हुए बोले,'' हैम वी हैव डन इट. अमेरिकंस आर ऑन देयर वे."

अमरीकी बेड़ा अगले दिन तो दूर, ढ़ाका के गिरने तक बंगाल की खाड़ी में नहीं पहुंचा. दिलचस्प बात ये है कि आज़ादी के बाद सैम मानेक शॉ और याहया दोनों दिल्ली में सेना मुख्यालय में तैनात थे.

जनरल एस के सिन्हा, अपनी आत्मकथा 'अ सोलजर रिमेंबर्स' में लिखते हैं, "याहया को मानेक शॉ की लाल रंग की एक मोटरसाइकिल बहुत पसंद थी.1947 में जब याहया पाकिस्तान जाने लगे तो मानेकशॉ ने 1000 रुपए में अपनी मोटरसाइकिल उन्हें बेच दी.''

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Image caption जनरल मानिक शॉ

''याहया ने वादा किया कि वो पाकिस्तान जा कर पैसा भेजेंगे. लेकिन वहाँ जा कर वो इसके बारे में भूल गए. 1971 की लड़ाई के बाद सैम ने मज़ाक किया "मैंने याहया ख़ां के चेक का 24 सालों तक इंतज़ार किया लेकिन वह कभी नहीं आया. आखिर उन्होंने 1947 में लिया गया उधार अपना आधा देश दे कर चुकाया."

याहया ख़ान को लेडीज़ मैन कहा जाता था. कई महिलाओं के साथ उनकी दोस्ती थी. मलका-ए- तरन्नुम नूरजहाँ को वो नूरी कह कर पुकारते थे. वो भी याहया ख़ानको सरकार कह कर बुलाती थीं.

अरशद समी ख़ाँ ने याहया और नूरजहाँ से जुड़ा एक किस्सा मुझे सुनाया था, "एक बार कराची में याहया ख़ान अपने दोस्तों के साथ बैठे हुए थे. उन्होंने देर रात मुझे बुलाया और बोले बेटा नूरजहाँ का एक नया गाना आया है मेरी चीची दा. मेरे दोस्त कह रहे हैं कि ये गाना इतना नया है कि बाज़ार में नहीं आया है. लेकिन मैंने इनसे कह दिया है कि मेरा एडीसी ये गाना ले कर आएगा."

"बहरहाल मैं उस गाने को याद करते हुए अपने कमरे में घुसा लेकिन तब भी अपने कमरे तक आते आते उसे भूल गया. मैंने अपनी बीवी को फ़ोन लगाया और पूछा तुम्हें पता है नूरजहाँ का नया रिकार्ड आया है जो च से शुरू होता है. मेरी बीबी ने छूटते ही कहा, मेरी चीची दा."

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"रात के 11 बज रहे थे. मैंने गाड़ी मंगवाई. मैं कराची के गोरी बाज़ार पहुंचा. उस समय सारी दुकानें बंद हो चुकी थी. गलियों में घूमते हुए मैं एक रिकार्ड वाले की दुकान पर पहुंच गया. उसके दरवाज़े को खटखटाया. जब उसके मालिक बाहर आए तो मैंने कहा मुझे नूरजहाँ का फ़ला फ़लाँ रिकार्ड चाहिए. वो बोले कल सुबह आ जाइए. मैं आपको दे दूँगा."

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"मैंने कहा नहीं भाई. मेरी किसी के साथ शर्त लगी हुई है कि मैं इसी वक्त ये रिकार्ड ले कर आऊं. मैंने कहा मुंह मांगी कीमत दूँगा. वो समझा कि मैं बिगड़ा हुआ नवाब हूँ. उन्होंने दुकान खोलकर मुझे रिकार्ड पकडाया. उस ज़माने में रिकार्ड पाँच रुपए में मिला करते थे. मैंने उसे 50 रुपए दिए. जब मैंने जनरल याहया को वो रिकार्ड दिया तो वो खुशी से उछल पड़े."

जनरल याहिया की सबसे नज़दीकी महिला दोस्त थीं अक्लीम अख़्तर जो जनरल रानी के नाम से मशहूर हो गई थीं. एक बार उन्होंने एक पाकिस्तानी पत्रकार आयशा नासिर को दिए गए इंटरव्यू में कहा था, "मेरी जनरल याहया ख़ान से पहली मुलाकात पिंडी क्लब में हुई थी. इस तरह की पार्टियों में मैं जाती तो थी लेकिन शराब पीने या नाच गाने में हिस्सा नहीं लेती थी. मैं अक्सर पुरुषों के टायलेट के पास एक कुर्सी पर बैठी होती थी."

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"मुझे पता होता था कि लोग जितनी शराब पिएंगे, उतना ही टायलेट की तरफ़ आएंगे. इस पार्टी में आग़ा जानी (याहया) पूरी फ़ार्म में थे. शराब के नशे में धुत थे और बार बार टायलेट जा रहे थे. वहीं उन्होंने पहली बार मुझे देखा और उनका मुझ पर दिल आ गया. फिर मैंने उनको अपने घर आमंत्रित किया. उसके बाद वो मेरे यहाँ लगातार आने लगे."

एक बार इंदर मल्होत्रा ने मुझे बताया था, "याहया सैनिक के रूप में शायद अयूब से बेहतर रहे हों. लेकिन उनमें सोल्जर स्टेट्समैनशिप नहीं थी. उन्होंने पाकिस्तान में एक यूनिट को तोड़ कर पुराने सूबों को बहाल कर दिया. लेकिन उनमें दो बड़ी खराबियाँ थीं. एक तो बेतहाशा शराब पीते थे और दूसरे औरतों के मामले में भी वो कमज़ोर थे."

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याहया को पार्टियों में जाने का बहुत शौक था. एक बार वो राष्ट्पति के तौर पर पूर्वी पाकिस्तान गए. वहां एक रात उन्होंने अपने एडीसी अरशद समी ख़ाँ से कहा कि वो रात में बिना अपने सुरक्षाकर्मियों को बताए एक पार्टी में जाएंगे.

समी ने बीबीसी को बताया था, "याहया मुझसे बोले, क्या तुम एक पार्टी में चलना पसंद करोगे? जब मैंने हाँ कहा तो उन्होंने मुझसे पूछा, तुम कौन सी कार इस्तेमाल करते हो? मैंने जवाब दिया मर्सिडीज़ सर. उन्होंने कहा, आज तुम दूसरी कार मंगवाओ. ड्राइवर से कहो कि कार को तुम्हारे कमरे की बग़ल में पार्क करे. उससे कार की चाभी ले लो और उससे कहो कि अब तुम्हारी छुट्टी है."

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले...

"याहया बोले, ठीक नौ बज कर पांच मिनट पर तुम पिछले वाले बरामदे और अपनी कार के अंदर की लाइट ऑफ़ करोगे. नौ बजकर दस मिनट पर तुम कार का पिछला दरवाज़ा खोलोगे.. नौ बज कर पंद्रह मिनट पर मैं कार की पिछली सीट पर आकर बैठूँगा. तुम मुझे बग़ल में रखी हुई चादर से कवर करोगे और ये ख़्याल रखोगे कि मेरे करीने से सजाए हुए बाल न बिगड़ जाएं. तुम मुझे लेकर प्रेसिडेंसी के गेट से बाहर निकलोगे, ये सुनिश्चित करते हुए कि किसी को इस बात की हवा न लगे कि तुम पाकिस्तान के राष्ट्रपति को अपनी कार में ले कर जा रहे हो."

"सब कुछ योजनानुसार हुआ. थोड़ी दूर चलने के बाद याहया ने मुझसे कार रोकने के लिए कहा. वो आगे की सीट पर मेरी बग़ल में बैठते हुए बोले, तुम्हें ये नहीं लगना चाहिए कि तुम मेरे ड्राइवर हो. थोड़ा और आगे जाने पर उन्होंने कहा, पहले फूल वाले के यहाँ चलो और मिसेज़ खंडोकर के लिए फूल ख़रीदो. अपने दोस्त खंडोकर के घर पहुंच कर याहया ने अपने हाथों से उनके दरवाज़े की घंटी बजाई."

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"दरवाज़ा खुला और खंडोकर साहब उन्हें देख कर हक्काबक्का रह गए. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वो इस तरह चुपके से बिना किसी सायरन और लावलश्कर के उनके घर पहुंच जाएंगे. याहाया बोले, कानू तुम मुझे अंदर आने के लिए नहीं कहोगे? अपने भारी भरकम शरीर के बावजूद याहया बहुत अच्छे डांसर थे. उस रात उन्होंने पार्टी में मौजूद हर महिला के साथ डांस किया. चूंकि वो वीकेंड था.''

''पार्टी देर रात तक चली. बीच बीच में याहया मुझसे पूछते रहे, तुम्हें नींद तो नहीं आ रही? जिस तरह से मैं उन्हें लाया था, उसी तरह मैं उन्हें वापस ले गया. याहया कार की पिछली सीट से बाहर उतरे. मुझे धन्यवाद दिया और सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपने कमरे की तरफ़ चले गए."

याहया के एक मानवीय पक्ष के बारे में बहुत कम लोगों को पता है कि उन्हें तोहफ़े देने का बहुत शौक था. लेकिन इसके लिए वो सरकारी पैसे के बजाए अपना खुद का पैसा ख़र्च करते थे. अरशद समी खाँ ने बीबीसी को बताया था, 'जैसे ही याहया राष्ट्पति बने, उन्होंने मुझे निर्देश दिए कि मैं हमेशा अपने साथ कुछ उपहार तैयार रखूं, जिन्हें वो स्थानीय और विदेशी मेहमानों को दे सके."

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"ये कोई नई बात नहीं थी. अयूब ख़ाँ के ज़माने में भी हम इस तरह के उपहारों से भरा पूरा एक ट्रंक अपने पास रखते थे. दोनों के बीच फ़र्क सिर्फ़ इतना होता था कि याहया हर उपहार के लिए पैसा अपनी जेब से देते थे. एक बार बेगम याहया की एक दोस्त ढाका से उनसे मिलने उनके पास आईं. वो उनके साथ राष्ट्रपति भवन के दालान में बैठकर चाय पी रही थीं. तभी याहया गोल्फ़ खेल कर वापस लौटे."

"बेगम याहया ने उनसे फ़ारसी में कहा, आज मेरी दोस्त का जन्म दिन है. याहया बोले, मैं आपको क्या तोहफ़ा दे सकता हूँ? उस महिला ने बहुत सकुचाते हुए कहा, अगर आप तोहफ़ा देने के लिए इतना ज़ोर दे रहे हैं, तो अपनी इस्तेमाल की हुई कोई चीज़ मुझे दे दीजिए. याहया ने कहा, इस समय तो मेरे पास ये गोल्फ़ टी शर्ट, पैंट और जूते हैं. ये चीज़ें किसी महिला को नहीं दी जा सकती."

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"मेरे पास एक टावल रूमाल भी हो जो मेरे पसीने से भरा हुआ है. हाँ एक चीज़ है मेरे पास आपके लिए. आप अपनी आंखें बंद करें और मेरी तरफ़ बढ़ाएं. उस महिला ने अपनी आँखें बंद कीं और झिझकते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया. याहया ने अपने हाथ से सोने की ओएस्टर रोलेक्स घड़ी उतारी और उस महिला की कलाई में पहना दी. आँखे खोलते ही उस महिला ने विरोध करते हुए कहा, मैं तो आपसे एक रूमाल की उम्मीद कर रही थी. ये तो बहुत मंहगी चीज़ है. आप से वापस ले लीजिए. याहया हंसते हुए बोले, एक बार दिए जाने के बाद तोहफ़ा वापस नहीं लिया जाता."

1971 की लड़ाई में एक बार जब याहया के हाथों से चीज़ें निकलना शुरू हुई तो फिर उन्होंने रुकने का नाम नहीं लिया. उसके बाद तो उन्होंने हो रही घटनाओं पर प्रतिक्रिया भर दी.

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सत्तर के दशक मे पाकिस्तान के विदेश सचिव रहे सुलतान मोहम्मद ख़ाँ अपनी आत्मकथा मेमॉएर्स एंड रेफ़्लेक्शन ऑफ़ अ पाकिस्तानी डिप्लोमैट में लिखते हैं, "याहया ख़ान ये विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थे कि भारत पूर्वी पाकिस्तान में हस्तक्षेप भी कर सकता है. उस समय पाकिस्तानी सेना के जनरलों को ये ग़लतफ़हमी थी कि वो ग़ैर लड़ाकू बंगालियों को महज़ एक छर्रे की मदद से झुका देंगे."

"इतिहास ने बाद में सिद्ध किया कि वो कितने ग़लत थे. इस लड़ाई के बाद पाकिस्तान का आकार आधा हो गया. उन्हें बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी और उस मानसिक आघात से उबरने में उन्हें बहुत समय लगा. एक राष्ट्रपति के रूप में एक बिखरी हुई आबादी का नेतृत्व करने की क़ाबलियत उनमें नहीं थी. अनैतिक राजनीतिज्ञों से निपटने और विश्व राजनीति के दाँवपेचों को भी समझने की उनकी क्षमता सीमित थी."

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भुट्टो को अपना पद सौंपने के बाद याहया ने उनसे हाथ मिलाते हुए कहा था, गुड बाई सर, आई विश यू लक. जनरल पीरज़ादा ने उनसे हाथ मिलाते हुए कहा, अब आप एक आज़ाद व्यक्ति हैं. याहया ने ज़ोर का ठहाका लगाते हुए बगल में खड़े हुए अपने बेटे अली से कहा था, हाँ अली, तुम और हम अब आज़ाद हैं.

याहया बहुत ज़्यादा दिनों तक आज़ाद नहीं रहे और अपने जीवन के अगले पांच साल उन्होंने नज़रबंदी में बिताए. इस दौरान उन्हें लकवा भी मार गया. जनरल ज़िया ने जब भुट्टो को सत्ता से हटाया, जब जा कर याहया ख़ाँ की रिहाई हो सकी.

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