इस देश ने अंग्रेज़ी बोलने वालों का इंटरनेट काटा

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Image caption कैमरून का बेमंडा

हरे-भरे पहाड़ों के बीच बसा बमेंडा कैमरून के कुछ उन शहरों में शामिल है जहां अंग्रेज़ी बोली जाती है.

लेकिन बीते कई हफ्तों से यहां भाषा के मुद्दे को लेकर हिंसा भड़क उठी थी. कम से कम 10 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई है स्कूल और दुकानें बंद हैं, सड़कें सूनी हैं और दूसरे इलाकों से इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले मांग कर रहे हैं कि उन्हें उनका इंटरनेट लौटाया जाए (#BringBackOurInternet).

बीते महीने 18 जनवरी को कैमरून की सरकार ने एक विवादित आदेश जारी किया था जिसके अनुसार अंग्रेज़ी बोलने वाले इलाक़े (उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम इलाक़े) में इंटरनेट की सेवाएं बंद कर दी गई हैं.

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Image caption ट्विटर पर कई लोग इन 'डिजिटल शरणार्थियों' को जगह देने की बात कर रहें जो अपने इलाके में इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर सकते.

ये पहली बार था जब देश में इंटरनेट पर किसी तरह की कोई पाबंदी लगाई गई है. इसका उद्देश्य था इलाके में रहने वाले 50 लाख लोगों को इंटरनेट और सोशल मीडिया इस्तेमाल न करने देना.

रोक लगाने के बाद अधिकारियों ने लोगों को एसएमएस भेजा जिसमें कहा गया था कि सोशल मीडिया के ज़रिए 'ग़लत जानकारी' फैलाने वालों को जेल की सज़ा दी जाएगी.

इससे ठीक एक दिन पहले स्कूलों और कोर्ट में फ्रांसीसी भाषा अनिवार्य करने के विरोध में प्रदर्शन हुए. इसके बाद कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ये उन लोगों को हाशिए पर डालने जैसा है जो ये भाषा नहीं जानते.

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सरकारी होर्डिंग में आपत्तिजनक भाषा पर विवाद

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बमेंडा उत्तर-पश्चिम प्रांत की राजधानी है जहां कैमरूनी पिडगिन इंग्लिश बोली जाती है. ये यहां की आधिकारिक भाषा है जो जर्मनी और ब्रितानी उपनिवेशवाद के दौर से यहां बोली जाती है, हालांकि यह भाषा अब शुद्ध नहीं रह गई है. देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था का केंद्र दक्षिण-पश्चिमी प्रांत की राजधानी बूया का हाल भी कुछ ऐसा ही है.

देश में अधिकतर लोग फ्रांसीसी भाषा बोलते हैं और इन प्रातों में भाषाओं को लेकर लंबे समय से विवाद है.

अंग्रेज़ी बोलने वालों का कहना है कि उनके साथ भेदभाव होता है और उन्हें नौकरियां नहीं मिलतीं. उनका विरोध इस बात को ले कर भी है कि काफी सरकारी दस्तावेज़ फ्रांसीसी में हैं और क़ानूनी काम भी उसी भाषा में होता है.

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क्योंकि भाषा तो बहता पानी है...

विवाद बढ़कर इस हद तक पहुंच चुका है यहां अंग्रेज़ी का समर्थन करने वाले कुछ राजनेताओं ने इलाके की स्वतंत्रता की मांग की है.

कैमरून में कई लोगों ने सोशल मीडिया पर इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाने वाले सरकारी आदेश का विरोध किया है.

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Image caption केशलीन दोंगमो लिखती हैं, "सरकार सोशल मीडिया के बारे में धमकियां दे रही हैं. इससे पता चलता है कि उन्हें सच्चाई के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है."
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कैमरून 1960 में स्वतंत्र हुआ था जिसके बाद से यहां फ्रांसीसी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर चुना गया था. हालांकि असल में जनसंख्या का मात्र 20 फीसदी हिस्सा ही अंग्रेज़ी बोलता है.

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