विवेचना: जब मिस्र के राष्ट्रपति के दामाद ने इसराइल के लिए जासूसी की

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Image caption अशरफ़ मारवान को दुनिया के सबसे बेहतरीन जासूसों में गिना जाता है

5 अक्तूबर, 1973 की रात एक बजे लंदन में मोसाद के एजेंट दूबी के पास पेरिस से एक फ़ोन आया. फ़ोन सुनते ही दूबी के होश उड़ गए.

दूसरे छोर पर मोसाद का सबसे बड़ा और गुप्त एजेंट था जिसकी मौजूदगी के बारे में बहुत कम लोगों को पता था. उसका कोडनाम एंजिल था. एंजिल ने फ़ोन पर कुछ शब्द कहे. उनमें से एक शब्द ने दूबी का दिल दहला दिया. वो शब्द था 'केमिकल.' केमिकल का अर्थ था कि इसराइल पर तुरंत हमला होने वाला है.

इस फ़ोन काल से कुछ हफ़्ते पहले जॉर्डन के किंग हुसैन ने इसराइल की एक गुप्त यात्रा कर गोल्डा मायर को चेता दिया था कि मिस्र और सीरिया इसराइल पर हमले की योजना बना रहे हैं.

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इसराइली नेतृत्व

इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसियाँ भी एक सप्ताह पहले से मिस्र के ख़ेमें में हो रही हलचल को नोट कर रही थीं. 4 अक्तूबर को सोवियत संघ ने अपने सभी सैनिक सलाहकारों और उनके परिवारजनों को मिस्र से हटाना शुरू कर दिया था. फिर भी इसराइली नेतृत्व ये मानने के लिए तैयार नहीं था कि उनपर हमला होने जा रहा है.

'द एंजिल- द इजिप्शयन स्पाई हू सेव्ड इसराइल' के लेखक यूरी बार जोज़ेफ़ बताते हैं, "जासूस का नाम था अशरफ़ मारवान. वो केमेस्ट्री का विद्यार्धी था, उसलिए युद्ध की सूचना देने के लिए कोडवर्ड रखा गया था केमिकल. 4 अक्तूबर को जब उसका फ़ोन उसके हैंडलर दूबी के पास आया तो उसने केमिकल शब्द तो कहा ही, साथ ही ये मांग भी की कि उसकी मोसाद प्रमुख से लंदन में बैठक तय की जाए. ये ख़बर दो घंटे बाद इसराइल पहुंची."

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करारा जवाब

"मोसाद के प्रमुख मेजर जनरल ज़मीर ने लंदन के लिए जाने वाली सुबह की पहली फ़्लाइट पकड़ी. रात ग्यारह बजे उनके सेफ़ हाउज़ की घंटी बजी. उनके सामने अशरफ़ मारवान खड़े थे. वो अपने साथ कोई कागज़ नहीं लाए थे, लेकिन मिस्र की युद्ध योजना का एक-एक बिंदु उनकी याददाश्त में दर्ज था. बैठक दो घंटे चली. तड़के तीन बजे ज़मीर ने तेलअवीव फ़ोन मिलाया."

"साढ़े चार बजे तक प्रधानमंत्री गोल्डा मायर समेत इसराइल का पूरा नेतृत्व जाग चुका था. नौ बजे तक हमले का करारा जवाब देने के आदेश दे दिए गए और दस बजते बजते यौम किप्पूर की छुट्टी पर गए इसराइली सैनिकों के घर पर फ़ोन बजने लगे थे. उनसे कहा जा रहा था छुट्टी बीच में ही छोड़ कर तुरंत मोर्चे पर पहुंचें."

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पहले चरण में मिस्र के 32000 सैनिकों नें 720 नावों में स्वेज नहर पार की और बिना किसी अवरोध के इसराइली क्षेत्र में पहुंच गए. मैंने बार जोज़ेफ़ से पूछा कि इतनी जानकारी देने के बावजूद मारवान हमले का सही समय क्यों नहीं बता पाए. उन्होंने कहा कि हमला शाम छह बजे शुरू होगा, जबकि हमला दोपहर दो बजे ही शुरू हो गया.

बार जोज़ेफ़ का जवाब था, "वो सही समय इसलिए नहीं बता पाए क्योंकि वो मंगलवार को मिस्र छोड़ चुके थे. हमले का दिन बुधवार को बदला गया, जब मिस्र के युद्ध मंत्री सारिया के राष्ट्रपति से मिलने दमिश्क गए. सीरियाई सुबह छह बजे लड़ाई शुरू करना चाहते थे, जबकि मिस्र शाम छह बजे लड़ाई शुरू करने के पक्ष में था. बीच का रास्ता ये निकाला गया कि हमला दोपहर दो बजे शुरू होगा. इसलिए मरवान को इसकी भनक नही लग पाई."

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सर्वश्रेष्ठ ख़ुफ़िया एजेंसियां

लेकिन मिस्र के चोटी के सुरक्षा विशेषज्ञ अब्दुल मोनेम सएद कहते हैं कि मरवान ने जानबूझ कर इसराइलियों को ग़लत सूचना दी. "मारवान मिस्र के राष्ट्पति और उसके सुरक्षातंत्र दोनों के लिए काम कर रहे थे. ये पहले से ही तय था कि वो इस तरह की सूचना दे कर इसराइलियों को भ्रमित करेंगे."

जब सएद से कहा गया कि इसराइली तो कह रहे हैं कि मरवान ने उन्हें ऐसी जानकारी दी जो पहले उन्हें किसी से भी नहीं मिली थी तो सएद का जवाब था, "दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ख़ुफ़िया एजेंसियों में इसी तरह की ख़बरें दे कर विश्वास बनाया जाता है. आप उन्हे बेहतरीन सूचनाएं देते हैं, तभी आपका उद्देश्य पूरा होता है."

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सएद जो कुछ भी कहे लेकिन मोसाद के 1968 से 1974 तक यूरोप ऑपरेशन के प्रमुख शुमेल गोरेन कहते हैं, "इस तरह के स्रोत से इस तरह का मसाला एक हज़ार साल में एक बार मिलता है."

मरवान ने पहली बार 1970 में लंदन में मोसाद से संपर्क कर उनके लिए जासूसी करने की इच्छा जताई थी. बार जोज़ेफ़ बताते हैं, "हमें ये याद रखना चाहिए कि मारवान मिस्र का एक मामूली नागरिक नहीं था, बल्कि वो वहां के राष्ट्रपति नासेर का दामाद भी था. नासेर को मिस्र में वही दर्जा हासिल है जो भारत में नेहरू को है. मारवान ने उस ज़माने में लंदन के चप्पे-चप्पे पर मौजूद लाल टेलिफ़ोन बूथ से इसराइली दूतावास को फ़ोन मिलाया था. उसने अपना कोई टेलिफ़ोन नंबर भी नहीं छोड़ा था, बल्कि ये कहा था कि वो दोबारा फ़ोन करेगा."

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लंदन में मीटिंग

"जब दूतावास के अधिकारियों ने मोसाद के अधिकारियों को बताया कि एक शख़्स फ़ोन कर उनके लिए जासूसी करने की पेशकश कर रहा है, तो उन्होंने उसका नाम पूछा. जब उन्होंने बताया कि उसका नाम अशरफ़ मारवान है तो वो एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे. उन्होंने उसका नाम बहुत अच्छी तरह सुन रखा था."

"मोसाद और मारवान की पहली बैठक मध्य लंदन के एक होटल में हुई. निर्धारित समय पर मारवान, हाथ में एक ब्रीफ़ केस लिए हुए होटल की लॉबी में दाखिल हुआ. उसके हैंडलर दूबी ने आगे बढ़कर उससे हाथ मिलाया और अरबी में कहा, 'आप से मिल कर बहुत ख़ुशी हुई मारवान साहब.' उसको अरबी में बोलते सुन मारवान ने समझा कि मिस्र की ख़ुफ़िया एजेंसी ने उसके लिए जाल बिछा रखा है."

"उसने फ़ौरन अंग्रेज़ी में पूछा, 'आर यू इसराइली?' दूबी ने भी अंग्रेज़ी में जवाब दिया, 'हाँ मैं इसराइली हूँ.' मारवान ने अपने ब्रीफ़केस से हस्तलिखित अरबी के दस्तावेज़ निकाले और उन्हें ज़ोर ज़ोर से पढ़ने लगा. दूबी को सैनिक दस्तावेज़ों का अंदाज़ा था. मारवान उनके सामने मिस्र की सेना का अत्यंत गोपनीय ऑर्डर ऑफ़ बैटिल पढ़ रहा था."

दिलचस्प बात ये थी कि इसराइल के जासूसों से मिलते वक्त मारवान बहुत अधिक सावधानी नहीं बरतते थे. बार जोज़ेफ़ बताते हैं, "इस तरह के व्यवहार को किसी भी तरह समझाया नहीं जा सकता. लेकिन मारवान को अपने आप पर बहुत विश्वास था. एक बार तो उसने हद ही कर दी. वो दूबी से मिलने मिस्र के दूतावास की कार में आया जिसे दूतावास का ही एक ड्राइवर चला रहा था."

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Image caption अशरफ़ मारवान मिस्र के राष्ट्रपति नासिर और अपनी पत्नी के साथ

वायरलेस गैजेट

"एक दूसरे अवसर पर दूबी और मोसाद के एक और अफ़सर मायर, मारवान लंदन मेफ़ेयर के उसके अपार्टमेंट में उससे मिलने गए. पूरे समय वो लिविंग रूम में बातें करते रहे जबकि बग़ल के शयनकक्ष में एक सेक्स वर्कर मारवान का इंतज़ार कर रही थी. वो लिविंग रूम में होने वाली एक एक बात को सुन सकती थी, लेकिन मारवान को इसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं थी."

"मोसाद ने एक बार वायरलेस गैजेट की ट्रेनिंग के लिए एक विशेषज्ञ मारवाना के पास भेजा. लेकिन मारवान कभी भी कोई गैजेट चलाना नहीं सीख सका. इसराइल के इतिहास के इस सबसे बड़े जासूस ने मोसाद के लिए काम करते हुए कोई जानकारी कभी भी वायरलेस से नहीं दी. मोसाद में उसके हैंडलर मारवान के बारे में मज़ाक करते थे, 'उसके दो दो बाएं हाथ हैं.''

मोसाद और मारवान का रिश्ता इतना करीबी था कि एक बार मारवाना की पत्नी के रूठने पर मोसाद ने उसको मनाने के लिए हीरे की अंगूठी ख़रीद कर मारवाना को दी थी. कहने का मतलब ये कि मारवान की बीबी के लिए हीरे की अंगूठी इसराइली कर दाताओं के पैसे से आई थी.

सवाल उठता है कि मारवान के पास ऐसे क्या कारण थे जिसकी वजह से उसे अपने देश के साथ ग़द्दारी करने का फ़ैसला लिया. बारजोज़ेफ़ कहते हैं, "मोसाद का मानना है कि पैसा और इतिहास में एक ख़ास मुकाम हासिल करने की उसकी चाहत ने मरवान से ऐसा करवाया. कुछ लोगों में जोख़िम लेने की प्रवृति जन्मजात होती है. यही वजह कि कुछ लोग रॉक क्लाइंबिंग, स्काई डाइविंग और बंजी जंपिंग जैसे शौक़ चुनते हैं. लेकिन मारवान को खेलों का कोई शौक नहीं था."

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स्कॉटलैंड यार्ड

"इसकी जगह उसे जुए, अनैतिक व्यापार सौदों और इसराइल के साथ संबंधों में अनावश्यक जोखिम उठाने में अपूर्व संतुष्टि मिलती थी. ये समझना ग़लत नहीं होगा कि उसके बढ़े हुए अहम, नासिर के साथ उसके खराब संबंध और विश्वासघात...इन सबसे मारवान को एक ख़ास किस्म की किक मिलती थी."

2007 में अशरफ़ मारवान की लंदन में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई. वो लंदन के अपने फ़्लैट की पांचवीं मंज़िल से नीचे गिर गए. स्कॉटलैंड यार्ड ने उसकी जांच की लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया. बाद में मारवान के बेटे गमाल मारवान ने कहा, "मैं निश्चित नहीं हूँ कि हुआ क्या था? लेकिन इस बारे में मुझे कोई संदेह नहीं कि उनकी हत्या हुई थी. सौ फ़ीसदी."

उनका कहना था कि उनके पिता इतने कमज़ोर थे कि वो रेलिंग के ऊपर चढ़ कर नीचे नहीं कूद सकते थे. प्रत्यक्षदर्शियों ने घटनास्थल के पास दो काली चमड़ी के लोगों को मंडराते हुए देखा था. बारजोज़ेफ़ बताते हैं, "स्कॉटलैंड यार्ड ने इस पूरे मामले की जांच की थी और वो इस नतीजे पर पहुंचे थे कि ये आत्महत्या का मामला नहीं था और न ही ये दुर्घटना थी. इसका मतलब ये हुआ कि उनकी हत्या की गई थी. वो मेफ़ेयर में अपने फ़्लैट की रेलिंग पर चढ़ कर नीचे कूद गए थे. लेकिन हमारा मानना है कि उस दिन मारवान की बालकनी के बग़ल वाले शयनकक्ष में कुछ लोग मौजूद थे, जिन्होंने उन्हें ऐसा विकल्प दिया जिसे वो नामंज़ूर नहीं कर पाए."

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Image caption अशरफ़ मारवान की अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ मिस्र में हुआ था

राष्ट्रपति नासिर

"संभवत: उन्होंने उनसे कहा कि हमारे धक्का देने से बेहतर है कि तुम ही कूद कर अपनेआप को मार लो. मेरा मानना है कि मिस्र की ख़ुफ़िया एजेंसी ने ये काम अंजाम दिया था क्योंकि उनका अतीत मुबारक प्रशासन के लिए बहुत बड़ी शर्मिंदगी का सबब था."

उनकी मौत के बाद अशरफ़ मारवान के शव को मिस्र ले जाया गया. हज़ारों लोग उनकी शवयात्रा में शामिल हुए जिसमें राष्ट्रपति मुबारक के बेटे और मिस्र की ख़ुफ़िया एजेंसी के बड़े अधिकारी भी शामिल थे. राष्ट्रपति मुबारक ने भी वक्तव्य जारी कर कहा कि मारवान अपने देश के लिए वफ़ादार थे. मैंने यूरी बार जोज़ेफ़ से पूछा कि अगर मारवान ग़द्दार थे तो उनकी इतने सम्मान के साथ अंतयेष्टि कैसे हुई?

बार जोज़ेफ़ का जवाब था, "इस तरह की चीज़ें इसी तरह की जाती हैं. मारवान मिस्र के राष्ट्रपति नासिर का दमाद था. वो राष्ट्रपति सादात का भी बहुत नज़दीकी सलाहकार था. किम फ़िल्बी जब सोवियत संघ के लिए जासूसी करता हुआ पकड़ा गया तो ब्रिटिश चाहते थे कि वो सोवियत संघ वापस चला जाए, बजाए इसके कि उस पर ब्रिटेन में मुकदमा चलाया जाए."

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"उसी तरह मिस्र वाले भी चाहते थे कि मारवान की मौत लंदन में हो, बजाए इसके कि उस पर मिस्र में मुकदमा चलाया जाए और उसकी पूरी सरकार शर्मसार हो. इसलिए बेहतर था कि उससे लंदन में पिंड छुड़ाया कर उसकी राजकीय अंत्येष्टि का ढोंग रचाया जाए.'

मारवान के हैंडलर दूबी अभी भी इसराइल में रहते हैं. सुरक्षा कारणों से उनकी पहचान अभी तक जग ज़ाहिर नहीं की गई है.

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