ब्लॉग: धमाकों के बीच पाक हिंदुओं के लिए अच्छी ख़बर

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पिछले एक हफ्ते से आप पाकिस्तान में आत्मघाती हमलों की खौफनाक नई लहर के बारे में ही सुन रहे होंगे.

लेकिन एक अच्छी ख़बर इस लहर के बीच कहीं दबकर रह गई. यानी पाकिस्तान बनने के 70 वर्ष बाद यहां पर बसने वाले हिंदुओं को आखिर हिंदू मैरिज एक्ट मिल ही गया.

पिछले वर्ष सितंबर में नेशनल असंबेली ने इस क़ानून की मंजूरी दी थी और दो दिन पहले राज्यसभा यानी सीनेट ने भी इस बिल को बिना किसी विरोध मंजूर कर लिया.

अब राष्ट्रपति इस पर दस्तख़त करेंगे और पाकिस्तान की हिंदू बिरादरी की कम से कम एक मुसीबत ज़रूर कम हो जाएगी.

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कभी आपने सोचा कि आप भले शादीशुदा हों लेकिन कोई सरकारी दफ़्तर, अदालत, पुलिस और वो समाज जिसके बीच आप रहते हों उसे दिखाने के लिए आपके पास अपनी शादी का कोई कागजी सबूत न हो तो आपका क्या होगा?

और तो और अगर आपका ताल्लुक अल्पसंख्यक समुदाय से है तो आपका जीवन कैसे गुजरेगा?

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शादी का कोई कानूनी दस्तावेज न होने की सूरत में आपका शिनाख्ती कार्ड या पासपोर्ट कैसे-कैसे सबूतों के जोखिम से गुज़रकर बनता होगा.

किसी महिला का बैंक अकाउंट कैसे खुलता होगा और जायदाद के बंटवारे में शादीशुदा औरत का हिस्सा रिश्तेदारों और सरकार समेत कौन-कौन तसलीम करता होगा, इत्यादि, इत्यादि.

और सबसे बड़ी बात कि अगर आप किसी अल्पसंख्यक समुदाय की महिला हैं और कोई आपका अपहरण करके जबरदस्ती आपका धर्म बदलवा कर आपसे शादी कर ले तो अदालत में आप कैसे साबित करेंगी कि आप तो पहले से शादीशुदा हैं और आपके बच्चे भी हैं.

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हिंदू मैरिज एक्ट बनाने की पहली योजना सत्तर के दशक में भुट्टो हुक़ूमत ने बनाई थी लेकिन हर बार तान यहां आकर टूट जाती कि राजपूत, बनिए और जाट वर्ग के हिंदू खड़े हो जाते थे कि हमारे यहां तो तलाक़ होता ही नहीं.

पिछड़ी जातियां अगरचे बहुमत में थीं मगर उनकी आर्थिक और राजनीतिक ताकत कम थी. इसलिए उनकी कोई नहीं सुनता था कि भइया हमारे यहां तलाक़ को लेकर कोई आपत्ति नहीं. कम से कम मैरिज एक्ट तो बना दो.

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अब कहीं जाके कौमी असेंबली के एक मैंबर रमेश कुमार बैंकवानी की कोशिशों से तीन वर्ष बाद एक ऐसा हिंदू मैरिज एक्ट मंजूर हो गया है जिसमें दूल्हा और दुल्हन की उम्र 18 साल से कम नहीं होनी चाहिए.

शादी पत्र पर पंडित जी के हस्ताक्षर होंगे और फिर शादी पत्र सरकारी दफ़्तर में भी रजिस्टर होगा और तलाक़ समेत किसी भी मसले की सूरत में शादी पत्र की वही कानूनी हैसियत होगी जो मुसलमानों के यहां निकाहनामे की होती है.

नए क़ानून के अंतर्गत पति की मौत के छह महीने बाद विधवा चाहे तो दोबारा अपना घर भी बसा सकेगी और उसके इस फ़ैसले को कोई चैलेंज नहीं कर सकेगा.

इससे पहले कि आप तक कोई बुरी ख़बर पहुंचे मैंने सोचा कि अच्छी ख़बर की भी बात हो जाए. कल हो न हो.

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