महंगी शादियों के साइड इफेक्टस

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ये ख़बर पढ़कर ख़ुशी हुई की पाकिस्तानी नेशनल असेंबली की तरह भारतीय लोकसभा भी अब शादी-ब्याह के नाम पर होने वाले फ़िज़ूलख़र्च पर रोक-टोक का क़ानून बनाने पर ग़ौर कर रही है.

लोकसभा का अगला सेशन कांग्रेस की मेंबर रंजीत रंजन के इस बिल पर ग़ौर करेगा कि शादी के मेहमानों और खाने की डिशों की तादाद पर रोक लगाई जाए.

अगर किसी शादी पर पांच लाख से ज़्यादा ख़र्च हो तो उसे सरकार के सामने डिक्लेयर किया जाए ताकि इस रक़म का दस प्रतिशत किसी ग़रीब लड़की की शादी के फंड में जमा हो सके.

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क्या हुआ दहेज पर बने क़ानून का?

क्या किसी को याद है 1961 में इसी लोकसभा ने दहेज पर पाबंदी का क़ानून भी मंज़ूर किया था.

जिसका उल्लंघन करने की सज़ा पांच साल क़ैद और 15 हज़ार रुपए तक जुर्माना था. कोई बताएगा कि इस क़ानून के लागू होने के बाद पिछले 56 बरस में कितनी लड़कियां कम दहेज लाने पर मर गईं या मार दी गईं या घरों से निकाल दी गईं.

वो लड़कियां और उनकी कहानियां कहां हैं.

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पाकिस्तान में ख़र्चीली शादियों पर पाबंदी का क़ानून

इसी तरह पाकिस्तान में भी 1976 में दहेज और शादी-ब्याह के ख़र्चे पर पाबंदी का क़ानून बड़े ज़ोर-शोर से मंज़ूर हुआ.

इस क़ानून के अनुसार कोई मेहमान 100 रूपए से ज़्यादा का तोहफ़ा नहीं दे सकता था, शादी पर पांच हज़ार से ज़्यादा का ख़र्चा नहीं हो सकता था, शादी के खाने पर ढाई हज़ार से ज़्यादा नहीं लगाया जा सकता था.

राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री, मंत्रीमंडल के मंत्रियों और संसद सदस्यों को मनाही कर दी गई थी कि वो अब अपने घर की शादियों में कोई तोहफ़ा क़ुबूल नहीं कर सकते. इस क़ानून को तोड़ने की सज़ा 6 महीने तक क़ैद और दस हज़ार रूपए जुर्माना था.

मगर क़ानून बनाने वाले जोश में भूल गए कि हर साल की मंहगाई के हिसाब से शादी के ख़र्चे में पांच या दस प्रतिशत इज़ाफ़े की खिड़की रखना भी ज़रूरी है. चुनांचे ये क़ानून अपनी मौत आप मर गया. मगर आज भी इसकी चिता सरकारी किताबों में महफ़ूज़ है.

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पाकिस्तान में है वन डिश क़ानून

पाकिस्तान के हर प्रांत की सरकार शादी के खाने पर बिल्कुल पाबंदी या वन डिश का क़ानून बना चुकी है.

कुछ दिन अमल होता है मगर यार लोग 'शॉर्टकट' निकाल लेते हैं.

जैसे वन डिश का मतलब जनता ने अपने आप ही ले लिया कि एक तो नमकीन डिश होगी, एक मीठी होगी, एक बीमार लोगों के लिए होगी, एक शुगर फ़्री होगी और एक डिश बच्चों के लिए होगी और एक उन बुज़ुर्गों के लिए जिनके दांत नहीं हैं.

लो हो गया अमल क़ानून पर.

चुनांचे पंजाब प्रांत की हुकूमत ने तंग आकर ज़ीरो डिश का क़ानून लागू कर दिया. यानी बारातियों को सिर्फ़ शरबत पेश किया जाएगा.

इसका तोड़ ये निकाला गया कि पहले से ही किसी अच्छे रेस्टोरेंट से डील कर ली जाती, बारातियों को खाने के टोकन बंट जाते और वो उस रेस्टोरेंट में टोकन दिखाकर, खाना खाकर डकार लेते हुए वापस बारात में आ जाते.

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बात ये है कि सारा खेल सामाजिक रवैये का है. जिन समाजों में शादी सादगी से और बिना दहेज होती है, वहां ये सब बग़ैर किसी क़ानून के हो रहा है. और जहां दिखावे का चलन है वहां क़ानून भी दिखावा बन जाता है.

बस यूं समझ लीजिए कि जितना पालन हम हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी चुनाव पर ख़र्चे के क़ानून का करते हैं, उतना ही हम शादी के ख़र्चे के क़ानून का भी करेंगे.

सुनो ग़ौर से दुनिया वालों बुरी नज़र ना हमपर डालो, चाहे जितना ज़ोर लगा लो सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी, ये गीत तो आपने सुना ही होगा.

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