ब्लॉग: सत्ता हमारी है, सिर्फ़ मनभावन समाचार सुनाओ

  • 28 फरवरी 2017
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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से लेकर झुमरीतलैया के कल्लन तक, सब यही चाहते हैं कि पूरी दुनिया उनकी पसंद से चले और बाक़ी सब ख़त्म हो जाएँ.

"एक शिक्षित दिमाग़ की पहचान है कि वह विचारों से सहमत हुए बिना भी उन्हें समझ सकता है." अरस्तू ने 2300 साल पहले ये बात कही थी.

मोबाइल और सोशल मीडिया के कस्टमाइज़ेशन वाले इस दौर में समझना तो दूर, लोग सुनने-देखने-पढ़ने तक को तैयार नहीं हैं.

दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता का एलान है, बीबीसी, सीएनएन, वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स सब झूठे हैं. दूसरी ओर, व्हाट्सऐप पर शेयर हो रही शरारत को आम आदमी ही नहीं, देश का पीएम तक सच मान लेता है बशर्ते बात मनभावन हो.

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ट्रंप ने राह दिखाई है, जो पसंद नहीं उसे नज़रअंदाज़ मत करो, उसे ख़त्म किया जाना चाहिए, बैन कर देना चाहिए, ऐसा करने के लिए ताक़त चाहिए, जो हमारे पास है. वो ताकत भी क्या ताकत है जो तथ्यों-तर्कों की मोहताज हो.

ट्रंप और सत्ता में बैठे दूसरे लोग साफ़ संदेश देते दिख रहे हैं कि जो नापसंद या असुविधा पैदा करने वाली बात है उसके लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, सही-ग़लत की बहस में पड़े बिना, पूरी ताक़त से खिझाने वाली आवाज़ों का ख़ात्मा होना चाहिए.

ये ताक़त कहीं सत्ता की है, कहीं संख्या बल की, कहीं तोड़-फोड़ में निपुणता की. सबसे घातक हालात तब पैदा होते हैं जब ये सब एक साथ मिल जाएँ. सत्ता-पोषित हिंसा और हुड़दंग पूरी बेशर्मी से जारी है.

यह कोई नई बात नहीं है, सत्तर के दशक में भी देश ने यह सब झेला है, तब सत्ता में कोई और था. हिंसा और हुडदंग के नए म्युटेंट वायरस की यह वापसी अरूण जेटली जैसे लोगों को चिंतित करती नहीं दिख रही है जो कभी छात्र नेता के रूप में इससे लड़े थे.

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ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के कुछ ही दिन बाद जेएफ़के एयरपोर्ट पर बुरक़ा पहनने वाली कर्मचारी पर हमला हुआ, हमलावर लात चलाते हुए चीख़ा था, "अब ट्रंप आ गया है, तुम सब लोगों को देश से बाहर निकालने."

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उस वक़्त ट्रंप साफ़ संदेश दे सकते थे कि उनके नाम पर गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, उसके बाद भारतीय इंजीनियर की हत्या जिस तरह एक 'स्वघोषित देशभक्त' के हाथों हुई वह सबके सामने है और ट्रंप की चुप्पी भी.

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दादरी में अख़लाक की हत्या के बाद लोग लंबे समय तक देश के प्रधानमंत्री से माँग करते रहे थे कि वो साफ़ संदेश दें कि सरकार ऐसे लोगों के साथ नहीं है, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

कुछ साल पहले अमरीका में जब एक मॉडल घड़ी लेकर स्कूल गए बच्चे अहमद मोहम्मद को टाइम बम के संदेह में पुलिस ने गिरफ़्तार किया तो ओबामा ने वैज्ञानिक बुद्धि वाले इस बच्चे को व्हाइट हाउस बुलवाया, उनका मक़सद एक संदेश देना ही तो था.

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जो लोग भारत में मुखर महिलाओं को सामूहिक बलात्कार की धमकियाँ दे रहे हैं जिनकी टाइमलाइन पर 'भारत माता की जय' और 'तेरी माँ की...' एक साथ दिखाई देते हैं जो लोग रामजस कॉलेज में हुई मारपीट को सेलिब्रेट कर रहे हैं, उनको किसने क्या संदेश दिया है?

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उनके दिमाग़ में और कुछ हो न हो, उन्हें मालूम है कि वे सत्ता के साथ हैं और सत्ता उनके साथ है. और उनको ये भी मालूम है कि सत्ता में बैठे लोग जिन्हें नापसंद करते हैं उन्हें निशाना बनाने की सज़ा तो नहीं ही मिलेगी, बल्कि शायद इनाम मिल जाए.

ये बात उनके दिमाग़ में यूँ ही नहीं आई, वे देखते हैं कि पीएम क्या कह रहे हैं, मंत्री क्या कह रहे हैं, सांसद क्या कह रहे हैं, वो ये भी देखते हैं कि देश के पीएम ख़ुद किन लोगों को फॉलो कर रहे हैं? पीएम कई ऐसे लोगों को ट्विटर पर फॉलो कर रहे हैं जो पेशेवर गालीबाज़ हैं.

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जब विदेश राज्य मंत्री 'प्रेस्टीट्यूट' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जब हिंदी में उसका अनुवाद प्रेश्या किया जाता है, जब मनभावन समाचार न देने वालों को 'बिकाऊ मीडिया' और बाक़ियों को देशभक्त मीडिया कहा जाता है तो बहुत सारे लोग इस पर तालियाँ बजाते दिखते हैं.

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ये वो लोग हैं जो ताल ठोककर मनभावन समाचार की माँग कर रहे हैं. 'जब फलाँ घटना हुई तब तुम कहाँ थे?', 'इसके बारे में तो तुमने ऐसा क्यों नहीं कहा?' कौव्वे को काला कहने से पहले, उनकी माँग होती है कि हर काले जीव की सूची दी जाए.

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ये वो लोग हैं जिनका कहना है-- मेरी भावनाएँ ही सत्य हैं, तुम्हारे तर्क देशद्रोह हैं. तथ्यों और तर्कों को ग़लत साबित करने के बदले उसे सामने रखने वालों को गद्दार, मक्कार, देशद्रोही, वामी, शेख़ुलर, सिकुलर, दलाल और बुद्धूजीवी कहने का ज़ोरदार अभियान बेवजह नहीं चल रहा है, इसका मक़सद ऐसी सारी आवाज़ों को बंद न करा पाने की हालत में, उन्हें संदेह के दायरे में लाना है.

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ये वो लोग हैं जयकार की गूंज में ख़लल डालने वाली कोई आवाज़ नहीं सुनना चाहते, यानी लोकतंत्र में संवाद की गुंजाइश पूरी तरह ख़त्म करने की कोशिश. जब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संवाद ख़त्म हुआ था तभी देश बँटा था, और तब अफ़वाहें तो थीं लेकिन व्हाट्सऐप और फ़ेसबुक नहीं था.

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भारत ऐसा ही है और सोशल मीडिया की वजह से साफ़ दिखने लगा है या फिर सोशल मीडिया उसे ऐसा बना रहा है, शायद दोनों बातें सच हों. फ़िलहाल तो दिखता है, कान में रूई ठूँसकर गला फाड़कर चिल्लाता हुआ देश.

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