अमरीका जाना किधर चाहता है, उसे भी नहीं पता

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न्यूयॉर्क शहर में शनिवार की देर रात हो चुकी थी बल्कि रविवार का सवेरा उसके आगोश से निकलने को कसमसाने लगा था.

लुढ़कती, खिलखिलाती जवानियां, नाकाम मजनू, कॉलेज की फ़ीस भरने के लिए दिनभर रेस्तरां में काम करने वाली स्टूडेंट, काले, गोरे, हिस्पैनिक, देसी--सब खटर-खटर चल रही सबवे ट्रेन के अंदर बैठे अपने-अपने स्टेशन की राह तक रहे थे.

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और उन्हीं हिचकोलों से उबकर या फिर मचलकर एक शराब की बोतल ट्रेन की सीट के नीचे से लुढ़ककर सामने आ गई. एक गोरे ने उठाया, बगल में बैठे काले से नज़र मिली. दोनों बिल्कुल अजनबी लेकिन बोतल फ़ौरन खुल गई और फिर वो भी खुल गए. पीने के लिए प्याली कहां से मिलती तो इधर-उधर देखा, एक पौवा वाली खाली बोतल पड़ी हुई थी. एक ने उसमें उड़ेली, दूसरे ने बोतल में ही मुंह लगाया.

सामने बैठी एक फ़्रीलांस पत्रकार ने धीरे से फ़ोन पर तस्वीर ली, ट्विटर पर डाला और कटी पतंग की तरह तस्वीर ये जा, वो जा करती हुई वायरल हो गई. अमरीका हल्के से मुस्कराया--ठहाके लगाने वाले दिन तो अब रहे नहीं!

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दो दिन पहले इसी अमरीका को शाम को ऑफ़िस से लौटते हुए शराबखाने में बैठकर बीयर की चुस्कियां ले रहे दो देसियों की सूरत पसंद नहीं आई तो उन्हें गोली मार दी. और फिर इसी अमरीका ने उन्हें बचाने के अपना सीना सामने कर दिया. और फिर इसी अमरीका ने मारे गए देसी के लिए इंटरनेट पर दस लाख डॉलर जमा कर लिए.

कई बार लगता है कि अमरीका ख़ुद भी नहीं समझ पा रहा है कि वो जाना किधर चाहता है और जा किस ओर रहा है. लोग वही हैं, मिट्टी वही है, बस हवा में कुछ घुल गया है.

वाशिंगटन में इस बार ठंड बिल्कुल नहीं पड़ी बल्कि जाड़े के मौसम में कई दिन गर्मियों वाला एहसास हुआ.

व्हाइट हाउस के इर्द-गिर्द लगे कुछ पेड़-पौधों को भी मौसम की समझ नहीं आ रही. कई बौखलाकर वक्त से पहले ही फूलों से लद गए हैं. लेकिन सर्दियां अभी खत्म हुई नहीं हैं, एक बर्फ़ की आंधी आएगी और सारे फूल ज़मीन चूम लेंगे. लेकिन इतनी दूर की कौन सोचे. कौन फ़्रिक करे कि फूल झटके में गिर गए तो पेड़ का क्या होगा.

शेयर मार्केट बेवजह ही हर दिन रेकॉर्ड तोड़ रहे हैं. कोई ऐसी खुशख़बरी नहीं आई है कि वो आसमान चूमने लगें लेकिन बस चूमे जा रहे हैं. कल अगर औंधे मुंह गिरे तो क्या होगा इस पर कोई नहीं सोच रहा.

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कई बार लगता है जैसै सबने कल के लिए नहीं, सिर्फ़ मौजूदा पल में जीने की ठान ली है.

बिग, ब्यूटीफ़ुल, एन्जॉय, सैड! सब कुछ एक्सक्लेमेशन मार्क के साथ, विस्मय के साथ. ठोस, पूर्ण, फ़ुल स्टॉप की जगह नहीं है.

सबकुछ एक ऐसे लाइव रिएलिटी शो की तरह हो रहा है जहां हर किरदार ने बिग ब्रदर से बगावत कर दी हो.

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शायद हर ट्रेन में सीटों के नीचे एक शराब की बोतल रख देनी चाहिए. लुढ़ककर बाहर आएंगी, जाम टकराएंगे, दोस्तियां होंगी.

तब शायद कोई ये नहीं पूछेगा कि कहां से आए हो, किस रंग के हो, किस मज़हब के हो, किस वीज़ा पर हो. तस्वीरें वायरल होंगी, लोग लाइक के बटन दबाएंगे और मुस्कराता हुआ अमरीका दुनिया को भी कुछ सुकून देगा.

वैसे ये मेरा ओरिजनल आइडिया नहीं है. किसी ने ट्विटर पर सुझाया है.

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