गुरमेहर के नाम पाकिस्तान से आई चिट्ठी

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प्यारी गुरमेहर कौर हमेशा सलामत रहो. उम्र में तो तुम मेरी बेटी से भी छोटी हो पर जुर्रत तुममें हमाला जितनी लगती है. वही हमाला जिसने तुम्हारे पिता समेत इधर और उधर के न जाने कितने बेटे निगल लिए.

लोग सौ-सौ साल जी कर भी नहीं समझ पाते जो तुम 19 साल की उम्र में ही समझ गई कि जंग कोई किसी नाम से लड़े जंग सिर्फ़ जंग होती है और इसमें भारतीय या पाकिस्तानी से पहले इंसान और धर्म से पहले इंसानियत मरती है.

तुम्हें तो मैं ये भी नहीं कह सकता कि तुम्हारे 32 प्लेकार्ड में पूरी दुनिया के लिए छिपे पैग़ाम में से सिर्फ़ एक लाइन को उठा कर बवाल उठाने वालों और इस बवाल को कपड़ा बना कर आपनी राजनीति की फर्श चमकाने वालों से घबराना नहीं, अगर घबराती तो ऐसा काम ही क्यों करती.

अब गुरमेहर कौर की सुरक्षा को लेकर परिवार चिंतित

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हर नए पैगाम हर नई बात हर नए नज़रिए का ऐसे ही विरोध होता है. बड़ी सच्चाई विरोध के पन्ने पर ही तो लिखी जाती है.

हर बड़ा आदमी अकेले ही सफर शुरू करता है पत्थर खाता है, गिरता है उठता है और एक दिन उंगलियों में दबे पत्थर गिरने शुरू हो जाते हैं और सिर झुकते चले जाते हैं.

गुरमेहर तुम्हें क्या बताना कि मोहब्बत और ईमानदारी अंदर होती है और नफ़रत और बेईमानी बाहर से सिखाई जाती है.

गुरमेहर तुमने तो इतनी छोटी-सी उम्र में ना सिर्फ अपने पिता से बिछड़ने का दुख बल्कि इतिहास भी घोल के पी लिया.

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फ़्रां और जर्मनी, अमरीका और जापान की दुश्मनी कैसे खत्म हुई ये तुम जानती हो.

चलो मैं तुम्हें अपने इतिहास से एक कहानी सुनाता हूं कभी हमारे स्कूलों में ये कहानी पढ़ाई जाती थी, लेकिन अब ये कहानी नहीं पढ़ाई जाती क्योंकि राष्ट्र को अब हमारे दिल नर्म करने की नहीं दिल सख़्त करने की जरूरत आन पड़ी है.

जंग-ए-खंदक के मौक़े पर हज़रत मोहम्मद सल्ललाहवालेह वालेही वसल्लम के चचाज़ाद भाई हज़रत अली ने एक काफ़िर को नीचे गिरा दिया और उसके सीने पर चढ़ कर बैठ गए वो गले पर खंजर चलाने ही वाले थे कि उस काफ़िर ने हज़रत अली के मुंह पर थूक दिया.

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हज़रत अली उसके सीने से फ़ौरन उतर गए और कहा चला जा. काफ़िर ने पूछा कि अली तुमने मुझे क़त्ल क्यों नहीं किया.

हज़रत अली ने कहा कि जिस वक्त मैंने तुझे गिराया तो मेरे सामने सिर्फ़ अल्लाह को राज़ी करना था, लेकिन जब तुमने मेरे मुंह पर थूक दिया तो अल्लाह से तेरी दुश्मनी में मेरा ज़ाती गुस्सा भी शामिल हो गया.

मेरी तुझसे जंग अल्लाह के लिए है अपनी ज़ात के लिए थोड़े ही है इसलिए मैंने तुझे माफ़ कर दिया.

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गुरमेहर जो आज तेरे दुश्मन हैं वो नहीं जानते कि तू असल में क्या कह रही है. जब वो अपनी नाक से आगे देखना सीख लेंगे तो तेरा पैगाम पढ़ना भी शायद सीख लेंगे.

तुझे शायद मालूम हो गुरमेहर पाकिस्तान में भी तेरी तरह कुछ पागल ऐसी ही एक जंग लड़ रहे हैं इस यक़ीन के साथ कि एक दिन ये बीज घना दरख़्त बनेगा.

गांधी जी कह गए हैं मकर ओ फ़रेब और झूठ की कमाई और नज़रिए के नाम पर कमज़ोरो पर अत्याचार के घनघोर बादल देख कर घबराना नहीं चाहिए इन बादलों के ऊपर हमेशा साफ आसमान रहेगा.

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गुरमेहर के इस पोस्टर के पीछे का सच क्या है?

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