जापान के लोगों पर चर्बी क्यों नहीं चढ़ती

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Image caption जापान में मोटापे की दर बहुत कम है.

दुनिया के 50 सबसे दुबले देशों की जारी सूची में वे देश हैं जो गरीबी, भूख, असुरक्षा जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. पर सूची के 38वें नंबर पर जापान है जहां गरीबी नहीं होने के बावजूद लोगों का औसत वजन कम है.

जापान में औसतन दस में से तीन लोग ही मोटे हैं.

बताया जा रहा है कि जापान में मोटापा इतना कम है कि सरकार ने वजन बढ़ाने से जुड़ी नीतियों को बढ़ावा दे रही है.

बीबीसी वर्ल्ड ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के न्यूट्रीशन एक्सपर्ट कैटरीन एंगेलहर्ड्ट से बात की.

बीबीसी ने कोशिश की कि एक खाता-पीता और संपन्न देश होने के बावजूद यहां मोटापा या अधिक वजन की समस्या क्यों नहीं है?

"हेल्थ जापान 21"

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कैटरीन एंगलहर्ड्ट के अनुसार जापान मोटापे को हराने में कामयाब रहा है. और उसकी इस कामयाबी के पीछे सरकारी कमिटी है.

सरकारी कमिटी ने मोटापे पर नियंत्रण, पोषण और सेहत शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों में निवेश और कुछ खास कानून बनाने जैसे कदम उठाए हैं.

सरकार के 'हेल्थ जापान 21' अभियान के तहत ये कदम उठाए गए हैं.

न्यूट्रीशन एक्सपर्ट कैटरीन बताते हैं कि इन कदमों में सरकार के दो अहम कानून शामिल हैं. दोनों कानून मोटापे पर लगाम लगाने में सफल हुए हैं.

शुकु आईकु कानून

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Image caption शुकु का मतलब भोजन, आहार और खाने की आदत है

जापान ने 2005 में शुकु आईकु कानून लागू किया. यह कानून बच्चों को शिक्षा से जुड़ा है.

इस कानून के नाम में खास भाव छिपे हैं. कैटरीन बताते हैं कि शुकु का मतलब भोजन, आहार और खाने की आदत है तो आईकु का मतलब बौद्धिक, नैतिक और शारीरिक शिक्षा है.

इस कानून का मकसद बच्चों को भोजन की शृंखला, स्रोत और उत्पादन के बारे में अधिक से अधिक जानकारी देना है. उन्हें पोषण के बारे में जरूरी बातें बताना और सिखाना है.

वैश्विक संसाधनों पर मोटों का भार

कानून के अनुसार स्कूलों में बच्चों की सेहत और खान-पान से जुड़े कई अहम नियम का पालन जरूरी है

कैटरीन बताते हैं कि इस कानून के अनुसार स्कूल में कोई स्टोर या वेंडिंग मशीन नहीं होगा. इससे बच्चों को चिप्स या किसी तरह के शुगर सोडा जैसी सेहत के लिए हानिकारक चीजें नहीं उपलब्ध नहीं होतीं.

मेटाबो लॉ

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Image caption साल में एक दिन जापानी कंपनियां अपने कर्मचारियों के कमर का नाप लेती हैं.

बड़ों के वजन पर नियंत्रण रखने के लिए मेटाबो (मेटाबोलिज्म) कानून है.

मोटापे पर काबू पाने में सफल होने के पीछे इस कानून की भी अहम भूमिका है. यह कानून 40 से 75 के बीच की उमर वाले वयस्कों को बढ़ावा देता है कि वे हर साल अपनी कमर का नाप लें, उसका लेखा जोखा रखें.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पुरुषों की कमर की नाप 94 और महिलाओं की 80 हो तो उनमें ह्रदय रोग जैसे मेटाबोलिज्म से जुड़ी बीमारी का खतरा बढ़ जाता है.

कमर के इस नाप को लेकर न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन, बल्कि कंपनियां भी गंभीर हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञ के मुताबिक, "कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए साल में एक दिन तय किया है जिस दिन सारे स्टाफ को अपने कमर की नाप देनी होती है."

जिनकी कमर की नाप तय सीमा से अधिक पाई जाती है, कंपनियां वैसे कर्मचारियों को अधिक कसरत करने और हेल्प सेशन में भेजती हैं.

80 लाख रूपए की मछली

कानून का मकसद लोगों को सही वजन के प्रति जागरुक बनाना और शारीरिक रूप से सक्रिय रखना है.

मेटाबो कानून के मुताबिक कंपनियां अपने स्टाफ को कसरत के लिए रेस्ट ब्रेक देती हैं. कुछ कंपनियों में जिम या बैडमिंटन कोर्ट की सुविधा दी गई है ताकि स्टाफ आसानी से लंच या काम के पहले या बाद में कसरत कर सकें.

यही नहीं, उन्हें पैदल चलने और साइकिल पर दफ्तर आने के लिए उत्साहित किया गया है.

कम मात्रा में, पारंपरिक भोजन

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Image caption एक मुकाबले में जापानी पारंपरिक डिश बनाते हुए

जापान में लोग पारंपरिक खाने को काफी महत्व देते हैं.

कैटरीन बताते हैं, "उनका जोर ताजा और स्थानीय रूप से उगाए गए खाद्य पदार्थों पर होता है."

यहां के लोग जमीन के छोटे टुकड़ों और छोटे बागानों में कुदरती रूप से उगाए गए फल, सब्जियों और खाद्यानों का इस्तेमाल करते हैं.

इसके अलावा खाने को कम मात्रा में परोसने का भी चलन है.

विशेषज्ञ का कहना है, "यहां पारिवारिक उत्सवों में पारंपरिक तरीके से कई पकवान पकाए जाते हैं. लेकिन थाली में सब तरह के पकवानों को कम मात्रा में परोसा जाता है. इसमें बहुत सारी सब्जी, और ताजे फल भी होते हैं."

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