उग्र राष्ट्रवाद के शिकार अमरीकी हिंदू दुविधा में

करूमांची दंपत्ति
Image caption करूमांची दंपत्ति

देवी करूमांची पिछले 32 सालों से अमरीका के एरिज़ोना राज्य के टुसॉन शहर में रह रही हैं और बरसों से एक ही डॉक्टर के पास जाती रही हैं.

कुछ हफ़्ते पहले उनके जर्मन मूल के अमरीकी डॉक्टर ने पूछा - भारत कब जा रही हैं?

उनका जवाब था: घूमने के लिए?

डॉक्टर का सवाल था: नहीं, हमेशा के लिए?

करूमांची इस सवाल को मज़ाक या यूं ही पूछा हुआ सवाल नहीं मानती हैं. उनका कहना था कि वो इस डॉक्टर को 20 साल से जानती हैं और जिस अंदाज़ में वो सवाल पूछा गया वो चौंकानेवाला था.

उन्होंने कहा कि उनका भी दिल चाहा ये पूछने का कि "तुम जर्मनी कब जाओगे" लेकिन चुप्पी लगा गईं.

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Image caption कैंसस राज्य में भारतीय इंजीनियर श्रीनिवासन कुचीवोतला को एक गोरे व्यक्ति ने गोली मार दी

ये शहर मेक्सिको की सरहद से लगा हुआ है. उनके ज़्यादातर पड़ोसी गोरे हैं और एरिज़ोना राज्य रिपब्लिकंस का हमेशा से गढ़ रहा है, लेकिन उनका कहना है कि ट्रंप की जीत के बाद से जैसे हवा बदल गई है और ये एहसास उन्हें और उनके पति वी चौधरी करूमांची दोनों ही को हो रहा है.

भारतीय इंजीनियर

एरिज़ोना की तरह ही कैंसस राज्य भी रिपब्लिकन या रेड स्टेट कहलाता है और वहां जब एक गोरे व्यक्ति ने एक रेस्तरां के अंदर "अपने देश वापस जाओ" कहते हुए भारतीय इंजीनियर श्रीनी कुचीवोतला को गोली मार दी तो कई भारतीय मूल के लोगों ने इसे एक व्यापक सोच का हिस्सा मानने से इंकार किया.

श्रीनी के दोस्त आलोक मदासानी के बचाव में आए अमरीकी युवक इएन ग्रिलॉट और फिर श्रीनी के परिवार के लिए 10 लाख डॉलर चंदा जमा करनेवाले अमरीकियों को मिसाल के तौर पर पेश किया गया.

और इसमें काफ़ी हद तक एक सच्चाई भी थी, लेकिन ट्रंप समर्थकों के गढ़ में रहनेवाले भारतीयों में से कई लोगों को लग रहा है जैसे उन्हें एक दूसरी नज़र से देखा जा रहा है.

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चौधरी करूमांची कहते हैं कि कई गोरे लोगों को लगता रहा है कि उनका देश बाहर से आए अल्पसंख्यकों की गिरफ़्त में जा रहा है और ट्रंप ने एक घोर-राष्ट्रवाद को हवा दे दी है.

संयुक्त राष्ट्र

कहते हैं, "ट्रंप की जीत ने इन लोगों में जैसे एक नई आक्रामकता ला दी है और इसका एहसास हमें ग्रॉसरी स्टोर हो या पेट्रॉल पंप हर जगह हो रहा है."

अमरीका में अंदाज़ा है 30 लाख से ज़्यादा भारतीय मूल के लोग हैं और इनकी गिनती यहां के सबसे ज़्यादा कामयाब अप्रवासियों में होती है.

प्रशासनिक तंत्र हो, सिलिकॉन वैली हो, अस्पताल हों या फिर स्पेलिंग बी के मुक़ाबले--भारतीय मूल के लोगों को पढ़े-लिखे, मेहनती और क़ानून को मानने वाले शांतिप्रिय क़ौम की तरह देखा जाता है.

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Image caption ट्रंप प्रशासन में संयुक्त राष्ट्र की राजदूत निकी हेली भारतीय मूल की हैं

इस वक्त कांग्रेस में भारतीय मूल के कम से कम पांच सांसद हैं. ट्रंप प्रशासन में संयुक्त राष्ट्र की राजदूत निकी हेली भारतीय मूल की हैं और प्रशासन में कई भारतीय मूल के चेहरे हैं.

भारतीय संस्कृति

ज़्यादातर भारतीय मूल के अमरीकी ख़ासतौर से नौजवान ख़ुद को अमरीकी मुख्यधारा का हिस्सा मानते हैं और इस वजह से पिछले दिनों में जो छिट-पुट ही सही हमले हुए हैं वो उनके लिए एक बड़ा झटका है.

आंध्र प्रदेश के छोटे-से शहर बापटला से यहां आए करूमांची दंपत्ति कहते हैं कि उनकी संस्कृति अभी भी भारतीय है, रहन-सहन, खान-पान और अंग्रेज़ी बोलने का अंदाज़ भारतीय है, लेकिन घर अमरीका है.

चौधरी करूमांची कहते हैं, "आज के दिन अगर कोई जंग हो और मुझे चुनना पड़े कि मैं भारत के लिए लड़ूंगा या अमरीका के लिए तो मैं अमरीका को चूनूंगा."

लेकिन इसी अमरीका का एक हिस्सा उन्हें अपना मानने से इंकार कर रहा है.

ज़्यादातर भारतीयों की कोशिश है इन घटनाओं को एक बुरे हादसे की तरह पीछे धकेल दें और काफ़ी हद तक जैसे ख़ुद को समझाने की कोशिश कर रहे हैं.

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टुसॉन शहर में रहनेवाले राणा प्रताप लवू का कहना है कि उन्होंने भारत में जिस तरह के भेदभाव का सामना किया है उसके मुक़ाबले तो यहां कुछ भी नहीं है.

ट्रंप का निर्वाचन

कहते हैं कि अस्सी के दशक में जब वो मुंबई में किराए का मकान ढूंढ रहे थे तो मराठी मकानमालिक एक दक्षिण भारतीय को मकान देने से साफ़ मना कर देते थे और आख़िरकार कंपनी को एक मकान किराए पर लेकर उन्हें देना पड़ा.

कहते हैं, "जब मेरा प्रमोशन हुआ तो जनरल मैनेजर ने मेरे बॉस से पूछा कि तुम्हें कोई मराठी नहीं मिला इस पोस्ट के लिए जो एक तेलुगू को ये पोस्ट दे रहे हो?"

लवू कहते हैं ज़्यादातर अमरीकी दूसरे रंग, मज़हब के लोगों के साथ सामंजस्य बिठाना जानते हैं, क्योंकि ये देश ही आप्रवासियों ने बनाया है, लेकिन उसी अमरीका ने तो ट्रंप को भी चुना है?

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जवाब देते हैं, "मुझे तो यही लगता है किसी तरह ये ट्रंप हट जाए. दरअसल उस पर भी क्यों ग़ुस्सा करूं, ग़लती तो हिलेरी क्लिंटन की है कि वो हवा को पहचान नहीं पाईं."

भारतीयों पर हमले

कई भारतीय ऐसे भी हैं, ख़ासतौर से वो जिनकी जड़े अभी ज्यादा गहरी नहीं हुई हैं, वो डीप रेड कहलानेवाले राज्यों और शहरों से निकलकर ऐसी जगहों पर नौकरी की तलाश कर रहे हैं जहां आबादी मिली-जुली हो.

उनकी चिंता और घबराहट का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनमें से जिन तीन-चार लोगों से मेरी बात हुई किसी ने भी अपना नाम छापने की मंज़ूरी नहीं दी.

भारतीय पहले भी नस्लभेदी हमलों के शिकार बन चुके हैं. अस्सी के दशक में डॉटबस्टर्स (बिंदी हटानेवाले) के नाम से न्यू जर्सी में एक पूरी मुहिम शुरू हुई थी और भारतीयों पर काफ़ी हमले हुए थे.

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लेकिन तब और अब के भारतीयों में ख़ासा फ़र्क है.

बुश का दौर

ख़ासतौर से 1995 के बाद से जो भारतीय यहां आए हैं वो आईटी क्षेत्र में अपना झंडा गाड़ चुके हैं और अमरीका के सामने अपनी काबिलियत पेश कर चुके हैं और अमरीका की तरक्की में उन्हें बराबर का हिस्सेदार माना जाता रहा है.

उनमें से कई इस नए बदलाव के साथ कैसे तालमेल बिठाएं ये समझ नहीं पा रहे.

ज़्यादातर भारतीय डेमोक्रैट्स रहे हैं लेकिन इस बार के चुनावों में कुछ हिंदुवादी गुटों को ट्रंप की मुसलमान-विरोधी भाषा पसंद आई और उन्हें लगा कि ट्रंप भारतीयों के लिए बेहतर रहेंगे तो वो उनके साथ हो लिए.

और अब जब भारतीय भी इन हमलों की चपेट में आए हैं तो उनमें से बहुतों का कहना है कि इस तरह के हमले ओबामा और बुश के दौर में भी हुए थे, ट्रंप को इनके लिए ज़िम्मेदार ठहराना ग़लत है.

ट्रंप प्रशासन की दलील भी काफ़ी हद तक यही रही है.

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लेकिन हाल ही में सिएटल के पास एक सिख व्यक्ति पर हुए हमले के बाद वहां के स्थानीय नेता जसमीत सिंह का कहना था, "इस तरह के हमलों के बाद पहले राष्ट्रपति जितनी कड़ाई से बयान देते थे कि ये हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे, वो अब नहीं दिखता."

भारतीय मूल

श्रीनी कुचीवोतला की विधवा ने एक सवाल किया था, "डू वी बिलॉन्ग हेयर (Do we belong here?)?"

पूरी दुनिया में इन दिनों राष्ट्रवाद की जो लहर नज़र आ रही है उसमें ये सवाल आप्रवासियों के लिए सबसे अहम सवाल बना हुआ है और अमरीका को अपना घर बना चुके भारतीय मूल के लोग भी इन दिनों अक्सर इसी सवाल से जूझ रहे हैं.

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बहुतों को उम्मीद है कि शायद ये एक दौर है जो ख़त्म हो जाएगा.

चुनाव परिणाम आने से पहले चौधरी करूमांची एक पेट्रॉल पंप पर थे जहां "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन" वाली लाल टोपी पहने एक गोरे शख्स ने उनपर चिल्लाकर कहा, "अपने देश वापस जाओ."

करूमांची ने भी चिल्लाकर जवाब दिया, "तुम भाड़ में जाओ."

कहते हैं अगर आज वही घटना दोबारा से होती है तो वो खामोशी से वहां से चल देंगे.

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