न्यूयॉर्क में भारतीय मज़दूरों को ऐसे मिला इंसाफ़

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भारत के हरियाणा राज्य से न्यूयॉर्क आकर करनैल सिंह पिछले कई वर्षों से मज़दूरी का काम करते रहे हैं. लेकिन उनका ठेकेदार उनको वाजिब पगार के बजाए बहुत ही थोड़ी रकम देकर अधिक से अधिक काम करवाता रहा.

इसकी एक वजह यह भी थी कि ठेकेदार को मालूम था कि करनैल सिंह के पास अमरीका में काम करने के लिए सही दस्तावेज़ नहीं हैं और शायद वह किसी से शिकायत करने नहीं जाएंगे.

करनैल सिंह इस बारे में बताते हैं,"मेरे पास दस्तावेज़ नहीं थे इसलिए मैं सही पगार देने के बारे में बोलता भी नहीं था. लेकिन जब एक महीने तक काम करने के बाद कोई पैसा नहीं मिला तो हमने केस करने की धमकी दी. तो वह बोला कि जाओ जो करना हो कर लो."

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Image caption न्यूयॉर्क के सिटी कॉम्प्ट्रोलर कार्यालय ने उठाया कम मज़दूरी का मुद्दा

भारतीय मज़दूरों को कम पगार

करनैल सिंह ने दो साल कड़ी मेहनत वाले काम किए जिसमें स्थानीय प्रशासन की विभिन्न इमारतों के निर्माण और उनकी मरम्मत भी शामिल थी. स्थानीय प्रशासन द्वारा यह काम विभिन्न निजी ठेकेदारों के ज़रिए भी कराए जाते हैं और इसी के तहत एक भारतीय मूल के ठेकेदार परेश शाह की के एस कंस्ट्रक्शन कंपनी को भी ठेका दिया गया था.

लेकिन ये कंपनी क़ानूनन करनैल सिंह जैसे मज़दूरों को प्रति घंटे के हिसाब से जितना पैसा मिलना चाहिए था वह नहीं दिया जाता था. मसलन अगर एक मज़दूर को 60 डॉलर प्रति घंटे के हिसाब से पगार मिलनी चाहिए तो सिर्फ़ 10 डॉलर प्रति घंटे पर ही टरका दिया जाता.

करनैल सिंह बताते हैं,"मैंने 2009 से 2011 तक काम किया. पहले ठेकेदार ने पूरे दिन के सिर्फ़ 90 डॉलर देने शुरू किए, कुछ महीने के बाद 100 डॉलर देने लगे और एक साल के बाद 110 डॉलर देने लगे. लेकिन हमें जो क़ानूनन भत्ता मिलना चाहिए था वह बहुत ज़्यादा बनता था. यह समझ लीजिए कि आठ घंटे एक दिन में काम करने का एक दिन में 350 अमरीकी डॉलर मिलना चाहिए था लेकिन हमें सिर्फ़ 100 डॉलर के क़रीब मिलता था."

न्यूयॉर्क के सिटी कॉम्प्ट्रोलर के दफ़्तर ने इस कंपनी के बारे में मज़दूरों को कम पगार दिए जाने की शिकायत की गई. कई महीनों की जांच पड़ताल के बाद मज़दूरों को उनका वाजिब बकाया मेहनताना दिलवाया.

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Image caption न्यूयॉर्क के सिटी कॉम्प्ट्रोलर स्कॉट स्ट्रिंगर

मज़दूरों को हक़ दिलाने की मुहिम

सिटी कॉम्प्ट्रोलर के कार्यालय ने के एस कंपनी और उसके मालिक परेश शाह पर प्रतिबंध के साथ साथ 36 मज़दूरों को धोखा देकर कम पगार देने के लिए एक लाख 70 हज़ार डॉलर का जुर्माना भी लगाया गया. अब यह रकम मज़दूरों में बांटी जाएगी. इनमें करनैल सिंह समेत कई भारतीय मूल के मज़दूर भी शामिल हैं.

सिटी कॉम्प्ट्रोलर कार्यालय द्वारा इस मुद्दे पर अधिक ज़ोर दिया जा रहा है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि जो मज़दूर शहर प्रशासन द्वारा शुरू किए गए निर्माण आदि कार्यों में लगे हैं उनको उचित मज़दूरी भी दी जा रही है.

न्यूयॉर्क के सिटी कॉम्प्ट्रोलर स्कॉट स्ट्रिंगर कहते हैं कि यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करें कि मज़दूरों को ठेकेदार क़नूनी तौर पर सही पगार दें.

बीबीसी हिंदी से बात करते हुए सिटी कॉम्प्ट्रोलर स्कॉट स्ट्रिंगर कहते हैं,"शहर में बहुत से लोग हैं जो शहर प्रशासन के विभिन्न प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं, और उनमें बहुत से मज़दूर ऐसे हैं जिन्हें उनके ठेकेदार सही दर पर पगार नहीं देते. जो कि ग़ैर-क़ानूनी है. हम ऐसे मामलों के पता लगने पर जांच करते हैं और मज़दूरों को उनका हक़ दिलाते हैं."

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ठेकेदारों की मनमानी

भारतीय मूल के कुलविंदर सिंह न्यूयॉर्क में कई वर्षों तक मज़दूरी करने के बाद अब मज़दूरों की यूनियन से जुड़े हैं. वह कहते हैं कि कई मज़दूरों को उनके काम के हिसाब से मज़दूरी इसलिए भी नहीं मिल पाती क्योंकि बहुत से ठेकेदार मज़दूरों के काम के हिसाब से पैसे नहीं देते.

कुलविंदर सिंह कहते हैं, "कई बार सही पगार इसलिए भी नहीं मिलती क्यूंकि मज़दूरी के काम में फ़र्क होता है. जैसे अगर कोई लेबर के काम के लिए रखा गया और उसने कुछ घंटे बढ़ई का भी काम करा तो दोनों काम के अलग-अलग रेट पर पगार दी जानी चाहिए, लेकिन उसको सिर्फ़ लेबर की ही पगार मिलती है जो कम होती है."

सिटी कॉम्प्ट्रोलर स्कॉट स्ट्रिंगर बताते हैं कि पिछले तीन साल में 35 ठेकेदारों को मज़दूरों को कम पगार देने के जुर्म में प्रतिबंधित कर दिया गया है. अब तक ठेकेदारों से 80 लाख डॉलर का जुर्माना भी वसूला गया है जो वापस मज़दूरों को दे दिया गया है.

अब भी न्यूयॉर्क शहर प्रशासन के पास ठेकेदारों से जुर्माने के तौर पर वसूली गई 50 लाख डॉलर की रकम पड़ी हुई है जो उन मज़दूरों के पगार का पैसा है जो उन्हें ठेकेदारों ने नहीं दिया था.

सिटी कॉम्प्ट्रोलर स्कॉट स्ट्रिंगर बताते हैं कि उनके कार्यालय ने भारत समेत कई देशों के करीब 1000 मज़दूरों की सूची बनाई है और उन देशों के दूतावास से भी संपर्क बनाकर उन मज़दूरों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं जो या तो वापस अपने देश चले गए हैं या फिर अमरीका से वापस भेजे जाने के डर से अपना पैसा लेने नहीं आ रहे.

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आप्रवासन के डर ख़ामोश भारतीय मज़दूर

जबसे डोनल्ड ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति बने हैं तब से न्यूयॉर्क जैसे शहरों में लाखों की संख्या में ग़ैर-क़ानूनी तौर पर रह रहे लोगों में डर बढ़ गया है कि उन्हें आप्रवासन अधिकारी पकड़कर अमरीका से बाहर कर देंगे.

और ऐसे माहौल में न्यूयॉर्क शहर में क़ानून का हवाला देने के साथ साथ इस मुद्दे पर राजनीति के तहत भी शहर का मौजूदा डेमोक्रेटिक प्रशासन इन ग़ैर-क़ानूनी मज़दूरों की हिमायत में तेज़ी दिखा रहा है.

इन मज़दूरों के मामले में सिटी कॉम्प्ट्रोलर का कार्यालय बार-बार यह प्रचार कर रहा है कि किसी भी मज़दूर से उसके आप्रवासन के दस्तावेज़ों के बारे में कोई पूछताछ नहीं की जाएगी.

सारा अमीन सिटी कंपट्रोलर के कार्यालय में काम करती हैं और मज़दूरों की पगार वापस दिलाने के काम से जुड़ी हैं.

सारा अमीन कहती हैं कि बहुत से मज़दूर उनके कार्यालय से संपर्क करने से डरते हैं.

वह कहती हैं, "मज़दूरों को एक तो यह डर होता है कि उनके पास काम करने के लिए सही कागज़ात नहीं होते तो वह समझते हैं कि अगर संपर्क किया तो कहीं एमिग्रेशन वाले पकड़कर अमरीका से बाहर न भेज दें. जबकि हमारा दफ़्तर एमिग्रेशन के बारे में कुछ नहीं पूछता, सिर्फ़ उन मज़दूरों को उनका पैसा वापस देना चाहता है."

सारा अमीन कहती हैं कि बहुत से मज़दूर बेहद कम पगार मिलने के बावजूद इसलिए भी ठेकेदारों की शिकायत नहीं करते क्योंकि उन्हें डर होता है कि उसके बाद उन्हे काम मिलना मुश्किल हो जाएगा. लेकिन जो हिम्मत करके अपना हक़ मांगने के लिए खड़े हो जाते हैं, उन्हें खुशी भी होती है.

करनैल सिंह को दो लाख डॉलर तक बकाया रकम मिलने की उम्मीद है.

वह कहते हैं,"मैं अब बहुत खुश हूं कि जो मेरा मेहनत का पैसा है वह अब मुझे मिलने वाला है."

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