पाकिस्तान में गुप्त सैन्य अदालतें फिर से बहाल होंगी

  • 22 मार्च 2017
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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आलोचना के बावजूद पाकिस्तान के निचले सदन ने गुप्त फ़ौजी अदालतों को फिर से बहाल करने वाला बिल पारित कर दिया है.

ऐसी सैन्य अदालतों की स्थापना 2015 में पेशावर में सेना के एक स्कूल पर हुए हमले के बाद की गई थी. ये हमला पाकिस्तानी तालिबान ने किया था जिसमें 134 बच्चों की मौत हो गई थी.

ये अदालतें उन लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाती हैं जिन पर चरपमंथ से जुड़े अपराध के आरोप हैं. इन अदालतों की मियाद दो साल की थी जो सात जनवरी को ख़त्म हो गई थी.

अब ये बिल सीनेट में अनुमोदन के लिए जाएगा.

पाकिस्तान में फ़ौजी अदालतें बंद

प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की सरकार ने जनवरी में कहा था कि वो सैन्य अदालतों को दोबारा बहाल करना चाहती है, लेकिन सरकार को संसद में दो तिहाई बहुमत हासिल नहीं है.

राजनीतिक दलों के बीच कई महीनों की बहस के बाद इस बिल को मंगलवार को निचले सदन में पारित कर दिया गया.

क्या करती हैं गुप्त सैन्य अदालतें-

मौलिक रूप से गुप्त सैन्य अदालतों के तहत -

प्रतिवादियों को अपना वकील करने की अनुमति नहीं - उनके लिए सेना ही वकील मुकर्रर करती है.

  • मीडिया को अदालत की कार्यवाही देखने की अनुमति नहीं.
  • प्रतिवादियों को अपना वकील करने की अनुमति नहीं - उनके लिए सेना ही वकील मुकर्रर करती है.
  • जब तक अदालत का फ़ैसला नहीं आ जाता, मुकदमे का समय सार्वजनिक नहीं किया जा सकता.
  • अपील करने का अधिकार नहीं होता.
  • जजों के लिए क़ानून की डिग्री का होना या फ़ैसले की वजह बताना ज़रूरी नहीं.
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हालांकि नए बिल में कुछ संशोधन भी किए गए हैं, जैसे कि संदिग्ध अब अपने लिए वकील चुन सकते हैं.

पाकिस्तान - सैन्य अदालत के पक्ष में वोट

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता इलियास ख़ान का कहना है कि नए क़ानून के मुताबिक गिरफ़्तारी के समय संदिग्ध के सामने आरोपों को पढ़ना ज़रूरी होगा और उसे सैन्य अदालत के सामने 24 घंटे के भीतर पेश करना ज़रूरी होगा.

हमारे संवाददाताओं के मुताबिक स्थापना के पहले दो सालों में सैन्य अदालतों ने 160 से ज़्यादा लोगों को मौत की सज़ा सुनाई थी जिनमें से 20 को फांसी दी जा चुकी है.

पेशावर में स्कूल पर हमले के बाद पाकिस्तान ने मौत की सज़ा पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था.

इसका मक़सद चरमपंथ और कट्टरपंथ पर लगाम लगाना था.

उसके बाद से अब तक सज़ा ए मौत वाले 400 से ज़्यादा क़ैदियों को फांसी दी जा चुकी है.

सैन्य अदालतों के पक्ष में दी गई दलीलों में से एक ये है कि सरकार चरमपंथ से जुड़े मामलों को देख रहे जजों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे सकती है.

लेकिन आलोचकों का कहना है कि इन अदालतों में पारदर्शिता की कमी होती है और वे प्रावधानों का पूरी तरह पालन नहीं करतीं.

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