पाकिस्तानियों ने कैसे गिरफ़्तार किया शेख मुजीब को

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ढाका से जनरल याहिया ख़ाँ की रवानगी को दस दिन पहले हुए उनके आगमन से भी ज़्यादा गुप्त रखा गया था.

बात 25 मार्च 1971 की है, जब जनता को धोखा देने के लिए एक ड्रामा किया गया था. दोपहर की चाय के बाद याहिया ख़ाँ की कारों का काफ़िला फ़्लैग स्टाफ़ हाउस की तरफ़ बढ़ा था.

अँधेरा होते होते याहिया का काफ़िला वापस प्रेसिडेंट हाउस की तरफ़ चल निकला था. उस काफ़िले में एक पायलट जीप, कुछ मोटर साइकिल सवार अंगरक्षक और राष्ट्रपति की चार स्टार और पाकिस्तानी ध्वज वाली वाली कार थी. लेकिन उसमें राष्ट्रपति याहिया ख़ाँ नहीं थे.

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Image caption याहिया ख़ाँ

उनकी जगह पर ब्रिगेडियर रफ़ीक बैठे हुए थे. पाकिस्तानी समझ रहे थे कि वो लोगों को धोखा देने में सफल हो गए हैं.

लेकिन तत्कालीन पाकिस्तानी सेना में जनसंपर्क अधिकारी के तौर पर काम करने वाले सिद्दीक़ सालिक अपनी किताब 'विटनेस टू सरेंडर' में लिखते हैं, "मुजीब के जासूसों ने सारा खेल समझ लिया था. याहिया की सुरक्षा टीम में तैनात लेफ़्टिनेंट कर्नल एआर चौधरी ने देख लिया था कि एक डॉज गाड़ी में राष्ट्रपति याहिया का सामान हवाई अड्डे पहुंच चुका था और उन्होंने इसकी सूचना मुजीब तक पहुंचा दी थी. जब शाम सात बजे याहिया ख़ाँ विमान पर चढ़ने के लिए पाकिस्तान एयरफ़ोर्स के गेट में घुसे तो अपने दफ़्तर से पूरा दृश्य देख रहे विंग कमांडर खोंडकर ने शेख मुजीब को फ़ोन कर इसकी सूचना दे दी."

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'हमें उन सब को मारना ही था'

सालिक़ आगे लिखते हैं, "उसी समय इंटरकॉन्टिनेंटल होटल से एक विदेशी संवाददाता ने मुझे फ़ोन कर पूछा कि क्या आप इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि राष्ट्रपति याहिया ढाका छोड़ चुके हैं?"

तब तक रात गहरा चुकी थी. उस समय किसी को पता नहीं था कि यह एक बहुत लंबी रात होगी.

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Image caption जनरल टिक्का ख़ान

उसी दिन दोपहर में मेजर जनरल ख़ादिम हुसैन अभी शेख मुजीब और याहिया खाँ के बीच होने वाली बातचीत के संभावित परिणाम के बारे में सोच ही रहे थे कि उनके सामने रखा हरा टेलिफ़ोन बजा. दूसरे छोर पर लेफ़्टिनेंट जनरल टिक्का खाँ थे.

टिक्का फ़ौरन काम की बात पर आ गए, "ख़ादिम इसे आज ही करना है."

ख़ादिम इन शब्दों का पहले से ही इंतज़ार कर रहे थे. उन्होंने तुरंत ही अपने स्टाफ़ को 'इस हुक्म' की तामील करने का आदेश दिया.

सिद्दीक़ सालिक लिखते हैं, "मैंने देखा कि 29 कैवेलरी के रेंजर रंगपुर से मंगवाए गए पुराने एम-24 टैंकों की ऑयलिंग कर रहे थे. क्रैकडाउन का समय तय किया गया था 26 मार्च की सुबह एक बजे. उम्मीद थी कि तब तक राष्ट्रपति याहिया ख़ाँ कराची में लैंड कर चुके होंगे."

रात करीब साढ़े ग्यारह बजे ढाका के स्थानीय कमांडर ने टिक्का ख़ाँ से क्रैकडाउन का समय पहले करने की अनुमति मांगी क्योंकि ख़बरें आ रही थी कि दूसरा पक्ष विरोध करने की ज़बरदस्त तैयारी कर रहा था.

सालिक लिखते हैं, "सब ने अपनी घड़ी की ओर देखा. राष्ट्रपति अभी तक कोलंबो और कराची के बीच में ही थे. जनरल टिक्का ने कहा, 'बॉबी से कहो जितना रुकना संभव हो रुकें.'

रात साढ़े ग्यारह बजे लगा कि जैसे पूरे शहर पर पाकिस्तानी सेना ने हमला बोल दिया हो. ऑपरेशन सर्चलाइट की शुरुआत हो चुकी थी.

सैयद बदरुल अहसन अपनी किताब 'फ़्रॉम रेबेल टु फ़ाउंडिंग फ़ादर' में लिखते हैं कि शेख़ की सबसे बड़ी बेटी हसीना ने उन्हें बताया कि जैसे ही गोलियों की आवाज़ सुनाई दी, शेख़ ने वायरलेस से संदेश भेज बांग्लादेश की आज़ादी की घोषणा कर दी.

शेख़ ने कहा, "मैं बांग्लादेश के लोगों का आह्वान करता हूँ कि वो जहाँ भी हों और जो भी उनके हाथ में हो, उससे पाकिस्तानी सेना का प्रतिरोध करें. आपकी लड़ाई तब तक जारी रहनी चाहिए जब तक पाकिस्तानी सेना के एक-एक सैनिक को बांग्लादेश की धरती से निष्कासित नहीं कर दिया जाता."

रात को करीब एक बजे कर्नल ज़ेड ए ख़ां के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना का एक दल 32, धानमंडी स्थित शेख़ मुजीब के घर पर पहुंचा जहाँ मुजीब उनका इंतज़ार कर रहे थे.

गेट पर पहुंचते ही सैनिकों ने ताबड़तोड़ गोलियाँ चलानी शुरू कर दी.

शेख़ की सुरक्षा देख रहे एक स्थानीय सुरक्षा कर्मी को भी एक गोली लगी और उसकी तुरंत मौत हो गई.

दूसरी मंज़िल पर शेख़ मुजीब ने अपनी पत्नी और बच्चों को एक कमरे में बंद किया, बाहर से कुंडी लगाई और पूरी ताकत से चिल्लाए,'फ़ायरिंग रोको.'

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Image caption शेख मुजीबुर रहमान अपने परिवार के साथ.

मशहूर पत्रकार बी ज़ेड ख़ुसरू अपनी किताब 'मिथ्स एंड फ़ैक्ट्स बांग्लादेश लिबरेशन वार' में लिखते हैं, "जब फ़ायरिंग रुकी कर्नल ख़ाँ घर के अंदर घुसे. नीचे किसी को न पा कर वो सीढ़ियों से ऊपर चढ़े. मुजीब एक कमरे के बाहर खड़े थे. एक सैनिक ने उनकी गाल पर थप्पड़ मारा. जब कर्नल से मुजीब से चलने के लिए कहा तो उन्होंने पूछा क्या वो अपने परिवार को गुड बाय कह सकते हैं? वो जल्दी से अपने परिवार से मिल कर आए."

बी ज़ेड ख़सरू ने आगे लिखा है, "लेकिन जब वो सैनिक वाहन में बैठने लगे तो मुजीब को याद आया कि वो अपना पाइप भूल आए हैं. कर्नल और मुजीब पाइप लेने दोबारा घर में घुसे. थोड़ी देर बाद जब मुजीब को लगा कि उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा, उन्होंने कर्नल ज़ेड ए ख़ाँ से पूछा, आने से पहले आपने मुझे सूचित क्यों नहीं किया? कर्नल ने जवाब दिया कि सेना आपको दिखाना चाहती थी कि आपको गिरफ़्तार भी किया जा सकता है."

बाद में ज़ेड ए ख़ाँ ने एक किताब लिखी,'द वे इट वाज़', जिसमें उन्होंने लिखा कि शेख़ को गिरफ़्तार करते ही 57 ब्रिगेड के मेजर जाफ़र ने वायरलेस पर संदेश दिया, 'बिग बर्ड इन केज, स्मॉल बर्ड्स हैव फ़्लोन.(बड़ी चिड़िया पिंजड़े में हैं, छोटी चिड़िया उड़ गई हैं.)' मैंने जनरल टिक्का खाँ से वायरलेस पर पूछा, ' क्या आप चाहते हैं कि शेख़ मुजीब को उनके सामने पेश किया जाए.' जनरल ने गुस्से में जवाब दिया था, 'मैं उसका चेहरा नहीं देखना चाहता.'

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Image caption शेख मुजीबुर रहमान पाकिस्तान में हिरासत के दौरान.

सालिक लिखते हैं, "उस रात मुजीब के साथ उस घर में रहे सभी पुरुष लोगों को हम गिरफ़्तार करके लाए थे. थोड़ी देर बाद उनके नौकरों को हमने छोड़ दिया था. उस रात उन्हें आदमजी स्कूल में रखा गया. अगले दिन उन्हें फ़्लैग स्टाफ़ हाउस में शिफ़्ट किया गया. तीन दिन बाद उन्हें कराची ले जाया गया. बाद में मैंने अपने दोस्त मेजर बिलाल से पूछा कि आप लोगों ने गिरफ़्तार करते समय ही मुजीब को ख़त्म क्यों नहीं कर दिया? बिलाल ने कहा कि जनरल टिक्का ने मुझसे व्यक्तिगत रूप से कहा था कि मुजीब को हर हालत में ज़िंदा ही गिरफ़्तार किया जाए."

उसी रात एक पाकिस्तानी कैप्टन ने वायरलेस से संदेश दिया कि उसको ढाका विश्वविद्यालय के इक़बाल हॉल और जगन्नाथ हॉल से कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है.

सिद्दीक सालिक लिखते हैं, "उसी समय एक वरिष्ठ स्टाफ़ अफसर ने मेरे हाथ से हैंड सेट छीन कर कहा, 'तुम्हें उन्हें बेअसर करने के लिए और कितना समय चाहिए ? … चार घंटे ? बकवास... तुम्हारे पास कौन कौन से हथियार हैं? रॉकेट लांचर, रिकॉयलेस गन, मोर्टार... सब का इस्तेमाल करो और दो घंटे में पूरे इलाके पर नियंत्रण की सूचना दो."

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Image caption ढाका में शेख मुजीबुर रहमान का स्वागत करते लोग.

चार बजे तक विश्वविद्यालय परिसर पर पाकिस्तानी सेना का नियंत्रण हो गया. लेकिन बंगाली राष्ट्रवाद की भावना को कुचलना पाकिस्तानी सैनिकों के वश की बात नहीं थी.

शायद विचारों और भावनाओं पर विजय इतनी आसान भी नहीं होती. सुबह तड़के भुट्टो को उनके ढाका के होटल के कमरे से उठा कर ढाका हवाई अड्डे पहुंचाया गया.

विमान पर बैठने से पहले पहले उन्होंने पाकिस्तानी सेना की भूमिका की तारीफ़ करते हुए कहा, "शुक्र है पाकिस्तान को बचा लिया गया."

अगले दिन सुबह जब सिद्दीक सालिक शेख मुजीब के धानमंडी स्थित घर गए तो उन्हें वहाँ कोई नहीं मिला.

ऐसा लगता था कि पूरे घर की तलाशी ली गई थी. पूरे घर में उन्हें कुछ भी यादगार नहीं दिखाई दिया, सिवाय रवींद्रनाथ टैगोर के एक बड़े चित्र के. उसका फ़्रेम कई जगहों से टूटा हुआ था लेकिन तस्वीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था.

Image caption शेख मुजीबुर रहमान और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो

पाकिस्तान में शेख़ मुजीब को मियाँवाली जेल में एक कालकोठरी में रखा गया जहाँ उन्हें रेडियो टेलीविज़न तो दूर, अख़बार तक उपलब्ध नहीं कराया गया.

मुजीब करीब नौ महीने तक उस जेल में रहे. 6 दिसंबर और भारत-पाकिस्तान युद्ध ख़त्म होने तक यानी 16 दिसंबर के बीच, एक सैनिक ट्राइब्यूनल ने उन्हें मौत की सज़ा सुना दी.

इस बीच पाकिस्तान की सत्ता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के हाथ में आ गई. उन्होंने आदेश दिया कि मुजीब को मियाँवाली जेल से निकाल कर रावलपिंडी के पास एक गेस्ट हाउज़ में ले जाया जाए.

7 जनवरी 1972 की रात, भुट्टो स्वयं मुजीब को छोड़ने रावलपिंडी के चकलाला हवाई अड्डे गए. उन्होंने बिना कोई शब्द कहे मुजीब को विदा किया और मुजीब भी बिना पीछे देखे तेज़ी से हवाई जहाज़ की सीढ़ियाँ चढ़ गए.

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Image caption शेख मुजीबुर रहमान 1972 में लंदन में एक प्रेस कांफ्रेस में.

लंदन में दो दिन रुकने के बाद मुजीब नौ जनवरी की शाम ढाका के लिए रवाना हुए. रास्ते में वो कुछ घंटों के लिए नई दिल्ली में रुके.

बांग्लादेश के पूर्व विदेश मंत्री डॉक्टर कमाल होसैन याद करते हैं, "भारत के राष्ट्रपति वी वी गिरि, प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी, उनका पूरा मंत्रिमंडल, सेना के तीनों अंगों के प्रमुख और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर राय, शेख़ के स्वागत में दिल्ली के हवाई अड्डे पर मौजूद थे. सब की आँखें नम थीं. ऐसा लग रहा था कि किसी परिवार का पुनर्मिलन हो रहा हो."

सेना के केंटोनमेंट के मैदान पर मुजीब ने एक जनसभा में बांग्लादेश के स्वाधीनता संग्राम में मदद करने के लिए भारत की जनता को धन्यवाद दिया.

शेख़ ने अपना भाषण अंग्रेज़ी में शुरू किया. लेकिन तभी मंच पर मौजूद इंदिरा गांधी ने उनसे अनुरोध किया कि वो बांग्ला में भाषण दें.

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दिल्ली में दो घंटे रुकने के बाद जब शेख़ ढाका पहुंचे तो करीब दस लाख लोग उनके स्वागत में ढाका हवाई अड्डे पर मौजूद थे.

नौ महीने तक पाकिस्तानी जेल में रहने के बाद काफ़ी वज़न खो चुके शेख़ मुजीब ने अपने दाहिने हाथ से अपने बढ़े हुए बालों को पीछे किया और प्रधानमंत्री ताजउद्दीन अहमद आगे बढ़ कर अपने नेता को अपनी बाहों में भर लिया. दोनों की आँखों से आँसू बह निकले.

रेसकोर्स मैदान पर लाखों की भीड़ के सामने उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर को याद किया.

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महान कवि को उद्धृत करते हुए शेख़ ने कहा कि आपने एक बार शिकायत की थी कि बंगाल के लोग सिर्फ़ बंगाली ही बने रहे, अभी तक सच्चे इंसान नहीं बन पाए.

नाटकीय अंदाज़ में मुजीब ने कहा, "हे महान कवि वापस आओ और देखो किस तरह तुम्हारे बंगाली लोग उन विलक्षण इंसानों में तब्दील हो गए हैं जिसकी कभी तुमने कल्पना की थी."

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