मिलिए जूनियर नोबेल पुरस्कार विजेता से

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17 वर्षीय भारतीय मूल की अमरीकी इंद्रानी दास को अमरीका के जूनियर नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया है.

यह पुरस्कार अमरीका में हाई स्कूल के विज्ञान और गणित के छात्रों की प्रतियोगिता के विजेता को दिया जाता है.

इस वर्ष 2017 की रीजेनेरोन साईंस टैलंट सर्च प्रतियोगिता की विजेता इंद्रानी दास को स्नायु-विज्ञान या न्यूरोलॉजी क्षेत्र में उनके प्रोजेक्ट के लिए दिया गया है.

इंद्रानी दास के प्रोजेक्ट में मानव मस्तिष्क में चोट लगने के बाद होने वाले नुकसान का इलाज करने का नया तरीका बताया गया है.

इंद्रानी दास कहती हैं उन्हें तो यकीन ही नहीं हो रहा है कि उन्हें जूनियर नोबेल पुरस्कार मिला है.

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वो कहती हैं, "जब यह पुरस्कार मुझे मिला तो मुझे तो बहुत अचंभा हुआ था, मुझे तो अभी भी यकीन नहीं होता. मैं तो बार बार उस लम्हे को याद करती हूं. लेकिन मैं अपने को बहुत भाग्यशाली समझती हूं."

"मेरे माता पिता ने तो पूरा पुरस्कार समारोह टीवी पर देखा था, उन्हें भी यकीन नहीं आ रहा था कि मुझे पुरस्कार मिला."

इस वैज्ञानिक प्रतियोगिता में शामिल होने वाले छात्रों ने कैंसर समेत कई जानलेवा बीमारियों से लेकर जलवायु परिवर्तन से निपटने के विभिन्न तरीकों का प्रदर्शन किया.

मार्च 9 से 15 तक होने वाली इस प्रतियोगिता में अमरीका भर से कुल 40 छात्र फ़ाइनल में पहुंचे.

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वैसे इस प्रतियोगिता में भारतीय मूल के छात्रों का ही डंका बजा.

इस प्रतियोगिता में भारतीय मूल के ही छात्र अर्जुन रमानी तीसरे नंबर पर रहे.

इसके अलावा इस प्रतियोगिता में पहले 10 विजेताओं में से 5 भारतीय मूल के युवा हैं.

पहले नंबर की विजेता इंद्रानी दास को 250,000 अमरीकी डॉलर भी इनाम में मिले. जबकि तीसरे नंबर पर आने वाले अर्जुन रमानी को 150,000 डॉलर मिला.

इंद्रानी दास न्यू जर्सी के ओराडेल में रहती हैं औऱ करीब के हैकेनसैक इलाके में अकादमी फ़ॉर मेडिकल साईंस टेक्नोलोजी की छात्रा हैं.

अर्जुन रमानी इंडियाना प्रांत के वेस्ट लाफ़यत हाई स्कूल के छात्र हैं.

उनका प्रोजेक्ट गणित की ग्राफ़ थ्योरी को कंप्यूटर प्रोग्रैमिंग के साथ मिलाकर किए गए प्रयोग से जुड़ा है.

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इंद्रानी दास अपने प्रोजेक्ट पर पिछले करीब 3 वर्षों से काम कर रही थीं.

इस प्रतियोगिता की तैयारी के लिए इंद्रानी ने अपने स्कूल की प्रयोगशाला में छुट्टियों के दौरान भी घंटों काम किया.

अपने प्रोजेक्ट के बारे में इंद्रानी दास बताती हैं,"यह प्रोजेक्ट तो मेरे 3 वर्षों की मेहनत थी. मेरा तो सारा काम ब्रेन सर्जरी पर है. इसमें सबसे अहम यह था कि मैंने अपने शोध के ज़रिए मस्तिष्क में गहरी चोट लगने के बाद उन सहयोगी सेल्स द्वारा स्वस्थ न्यूरोन सेल्स को मारने वाली प्रक्रिया को समझने की कोशिश की. और इसी के साथ इन सहयोगी सेल्स को कम हानिकारक बनाने की कोशिश भी की जिससे भयंकर बीमारियों का इलाज करने के लिए और अधिक शोध करने में मदद मिल सकती है."

इंद्रानी दास की कामयाबी पर उनका पूरा स्कूल खुशी मना रहा है.

उनकी अध्यापक डोना लिओनार्डी गर्व से इंद्रानी की तारीफ़ करते हुए कहती हैं,"इंद्रानी पर तो हम सबको बहुत गर्व है. उनको पुरस्कार मिलने पर हमारी तो खुशी का ठिकाना ही नहीं है. इंद्रानी बहुत ही मेहनती छात्रा हैं. मुझे उनके काम पर बहुत गर्व है. मुझे यकीन है कि वह भविष्य में भी जो क्षेत्र चुनेंगी हमेशा बुलंदियों को छुएंगी."

इंद्रानी दास अपने स्कूल में युवा वैज्ञानिकों की मदद भी करती हैं. इसके अलावा गणित में ट्यूशन भी पढ़ाती हैं.

पढ़ाई के बाद जो समय बचता है उसमें इंद्रानी दास एक जैज़ संगीत ग्रुप के साथ ट्रंपेट बजाना पसंद करती हैं.

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इंद्रानी कहती हैं,"मैं तो संगीत में खासकर यूरोपियन पॉप पसंद करती हूं. और मैं एक संगीत ग्रुप के साथ ट्रंपेट या बिगुल भी बजाती हूं. संगीत के लिए ज़्यादा समय तो नहीं मिलता, लेकिन मैं अक्सर ट्रंपेट या बिगुल बजाती हूं."

इंद्रानी बताती हैं कि जब उनको पुरस्कार मिलने की खबर फैली तो भारत से भी उनके रिश्तेदारों के बधाई संदेश आने लगे.

वह 5 साल पहले 12 वर्ष की उम्र में भारत गई थीं, और उनको अपनी दादी के साथ कोलकाता में समय गुज़ारना और उनसे कढ़ाई सीखना याद है.

इंद्रानी दास अपने क्षेत्र में बहुत आगे जाना चाहती हैं.

वह कहती हैं, "मैं तो यह कहूंगी कि यह पुरस्कार तो बस आगे बढ़ने के लिए एक पायदान है. क्यूंकि मैं तो चाहती हूं कि मैं इस अनुभव से प्रेरणा लेकर एक ऐसी डॉक्टर और वैज्ञानिक बनूं जिससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की मदद कर सकूं."

जूनियर नोबेल पुरस्कार विजेता बनने के बाद अब इंद्रानी को उम्मीद है कि उनके प्रोजेक्ट की मदद से मस्तिष्क को गहरी चोट लगने के बाद बेहतर ढंग से इलाज करने के बारे में भविष्य में और अधिक शोध की संभावनाएं बढेंगी.

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