ब्लॉगः 'बस ज़रा चर्चों का ख़्याल रखिएगा वरना...'

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जिसका डर था वही हुआ. माहौल में गर्मी कुछ ऐसी थी कि बेचारे चेरी ब्लॉसम के पेड़ अपनी कलियों को संभाल नहीं पाए और जाड़ा खत्म होने से पहले ही उन्हें फूल बनने पर मजबूर कर दिया.

और फिर आई वाशिंगटन की पहली बर्फ़बारी और बेचारे फूल बहारों के आने से पहले ही कुम्हला गए.

वैसे भी ये बेचारे पेड़ जापानी मूल के हैं, बरसों से अमरीका में हैं लेकिन शायद वाशिंगटन के मौसम को समझने में थोड़ी जल्दबाज़ी कर गए.

इन दिनों तो जो समझदार हैं, वो खिली हुई धूप में भी निकलते हैं तो इस तैयारी के साथ कि न जाने कब शीतलहरी शुरू हो जाए या कब बादल बरस पड़ें.

यानि लबादा और छतरी दोनों ही साथ होने चाहिए.

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मर्केल से मुलाक़ात

अब पिछले दिनों जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल वाशिंगटन आई थीं. राजा साहब जितना हो सके गर्मजोशी दिखा रहे थे.

इवांका बिटिया को उनके बगल की कुर्सी पर बिठाकर उन्हें फ़ील गुड करवाने की कोशिश भी कर रहे थे.

चुनावी दिनों में यही राजा साहब मुसलमानों को पनाह देने के लिए मर्केल पर ताने मार रहे थे और उन्हें एक नाकाम नेता कह रहे थे.

और मर्केल जब उनके साथ मुलाक़ातों के दौर के बाद मीडिया के सामने आईं तो चेहरे पर कुछ वैसा ही भाव था जैसा सिनेमाहॉल के बाहर रामसे ब्रदर्स की भुतहा फ़िल्मों के पेंट किए हुए पोस्टरों पर हीरोईनों के चेहरों पर होता था-यानि वो डर रही हैं या फ़िल्म देखने आनेवालों पर हंस रही हैं ये पता नहीं चल पाता था.

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जर्मनी पहुंचकर उनका ये कन्फ़्यूज़न शायद और बढ़ ही गया होगा.

पहले दिन तो ट्रंप ने उन्हें लगभग चार अरब डॉलर का बिल भेज दिया कि ये नैटो में जो आप पर अमरीका ने खर्च किया है वो उधार चुकता कीजिए.

और वो इस झटके से उबरतीं उसके पहले ही एक प्रांतीय चुनाव में जीत पर बधाई देने के लिए उन्हें फ़ोन भी कर डाला. अब लगाती रहें इस नए मौसम का अंदाज़ा.

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मोदी को फ़ोन

अपने साहेबजी को भी राजा साहब अपनी जीत के बाद तीन बार फ़ोन कर चुके हैं.

इसके पहले चुनावी दिनों में आई लव हिंदू, आई लव मोदी के नारे लगा चुके हैं.

इन दिनों 'आज फिर तुमपे प्यार आया है' टाइप का मौसम बना हुआ है.

साहेब के चाहनेवालों में इस बात से और ज़्यादा खुशी है कि पड़ोस वाले मियां साहब को राजा साहब बिल्कुल ही पत्ता नहीं डाल रहे.

एक साहब कहने लगे, "देखिए कितनी बड़ी बात है. अमरीका के राष्ट्रपति ने यूपी चुनाव में जीत के लिए मोदीजी को फ़ोन किया. पहले कभी सुना था ऐसा?"

सुर्खियों में कुछ और

मैंने कहा कि बिल्कुल नहीं, 'लेकिन देखिए अमरीकी अख़बारवालों ने हेडलाइन लगा रखी है-भारत में अफ़्रीकी छात्रों पर हमला, यूपी में बूचड़खाने बंद, हज़ारों की रोज़ी-रोटी खतरे में. और भारत में यहां होनेवाले भारतीयों पर हो रहे हमलों का ज़िक्र हो रहा है.'

उनका जवाब था, "बिके हुए बेईमान हैं सारे के सारे अख़बारवाले."

फिर मेरा लिहाज़ करते हुए कहा, "सारे के सारे नहीं लेकिन ज़्यादातर."

दरअसल ग़लती मेरी भी थी. दो प्यार करनेवालों के बीच फालतू में ऐंटी-रोमियो स्कवैड बनने की कोशिश कर रहा था.

लेकिन फिर भी आपकी अगर साहेब से बात हो तो कह दीजिएगा कि वक़्त का तकाज़ा है कि ज़्यादा उतावलापन न दिखाएं.

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मुसलमानों और अफ़्रीकी-अमरीकियों पर हमले तो अमरीका में भी होते हैं.

बस ज़रा गिरजाघरों का ख़्याल रखिएगा वरना ये प्यार का मौसम कहीं तकरार के मौसम में न बदल जाए.

और भी कुछ ग्रह-नक्षत्र भारी पड़ सकते हैं जैसे एच1बी वीज़ा, व्यापार, मेक इन इंडिया वगैरह-वगैरह.

छतरी और लबादा साथ रखने में ही भलाई है. बाकी आपकी मर्ज़ी.

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