नाइजीरिया में रहने वाले भारतीय कितने डरे हैं?

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कई मामलों में नाइजीरिया बहुत ही सौभाग्यशाली देश है. खेती के लिए सपाट उपजाऊ मैदान, पर्याप्त पानी, खनिजों का खजाना और कच्चे तेल के साथ प्राकृतिक आपदा से बिल्कुल सुरक्षित.

कई मामलों में इस ज़मीन को लोगों के लिए वरदान कहा जा सकता है. लेकिन असली नाइज़ीरिया बहुत, अतिवाद की धरती है, सामाजिक आर्थिक विभाजन कल्पना से भी ज़्यादा है.

एक तरफ आपको पोर्शे, फ़ेरारी और मेबाख चलाते हुए करोड़पति मिल जाएंगे जबकि दूसरी तरफ दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते हज़ारों लोग भी मिल जाएंगे.

अगर इसके आर्थिक हालात पर नज़र डालें तो यहां तेल के कुओं से पैदा होने वाली दौलत और आर्थिक तरक्की के साथ साथ भ्रष्टाचार के कारण राजस्व में नुकसान की एक बड़ी समस्या है.

इसकी वजह से कुछ चंद लोगों को फायदा पहुंचा है और इसने एक अति धनी तबका 'ओगा' को पैदा किया है.

अफ्रीकियों पर हमले नस्लवाद नहीं तो और क्या?

'नाइजीरिया के लोगों को भारत से भगा दो'

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'ओगा' लोग हवेलियों में रहते हैं और नौकर रखते हैं. उनकी लाइफ़स्टाईल दुनिया के किसी भी हिस्से की बढ़िया से बढ़िया लाइफ़स्टाईल से किसी मामले में कम नहीं है.

ओगा लोगों के बाद अत्याधुनिक दक्षता और अत्यधित वेतन वाले लोग आते हैं जो पूरी दुनिया से यहां तेल उद्योग को चलाने और नाइजीरिया को अफ़्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाली पहचान को बनाए रखने के लक्ष्य को बनाए रखने में मदद देने आते हैं.

लेकिन सभी विदेशी कामगार इन धनिकों की नहीं, बल्कि निम्न मध्यवर्ग की श्रेणी में आते हैं.

मैं एक भारतीय हूं, सम्पन्न विदेशी कामगारों का एक हिस्सा, लेकिन भारतीय समुदाय नाइजीरिया में सबसे अनोखा है.

अधिकांश यहां सालों पहले टीचर के रूप आए थे और इसलिए जनता में बहुत सम्मानित हैं.

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ये सम्मानित हैं....लेकिन धनी नहीं!

यहां आम तौर पर भारतीय रेलवे या टेक्सटाइल मिलों में काम करने के लिए मज़दूर के रूप में आते हैं क्योंकि वो दक्ष होते हैं और अपने देश के मुक़ाबले अधिक कमाई होती है.

इसकी वजह से अप्रवासी भारतीयों का समुदाय काफी बड़ा हो चुका है, जिसका मध्यवर्ग में भी प्रसार हुआ है और यही उन्हें ख़तरों के प्रति संवेदनशील बनाता है.

इनका रंग भी एक समस्या है. नाइजीरिया में अगर आप काले नहीं है तो श्वेत हैं यानि कि आप अपहरण और फिरौती का निशाना हो सकते हैं.

एक अप्रवासी कामगार के रूप में, हर कोई लगातार चौकन्ना रहता है, बाहर कम निकलना होता है, स्थानीय परिवहन से सफर का इस्तेमाल कभी कभार होता है और जब भी ऐसा हो तो बहुत चौकन्ना होकर.

सुनसान इलाक़े में निकलने के लिए तो बिल्कुल ना है. केवल एक राहत है, स्थानीय लोगों और सहकर्मियों का दोस्ताना व्यवहार.

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अधिकांश नाइजीरिया भारत की तरह ही है, जहां जगह जगह जनजातीय समूह हैं. सबसे बड़े धर्म इस्लाम और ईसाइयत है, स्थानीय लोगों की संस्कृतियां अलग अलग हैं.

स्थानीय लोग मूलतः बहुत दोस्ताना और आसानी से घुलमिल जाने वाले हैं, वे आसानी से विदेशियों को स्वीकार लेते हैं और ढाल लेते हैं.

वे भावनात्मक रूप से भारत से जुड़े होते हैं क्योंकि उन्हें अपने स्कूलों में कम से कम एक भारतीय टीचर की याद होगी.

ये भी एक तथ्य है कि भारत नाइजीरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है.

बॉलीवुड की लोकप्रियता भी स्थानीय लोगों को भारत के बारे में उत्सुक बनाती है. धर्मेंद्र को अभी भी याद किया जाता है और शाहरुख की नक़ल की जाती है. महिलाएं भारतीय परिधानों और बालों का स्टाइल पसंद करती हैं.

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अधिकांश लोग बॉलीवुड स्टार्स की तरह दिखने की कोशिश करते हैं.

भारत में दिलचस्पी के कारण भारत में राजनीतिक व्यस्था में हालिया बदलाव पर क़रीबी से नज़र रखी जाती है; बीफ़ बैन, उत्तर प्रदेश के नए मुख्मंत्री ऐसे मुद्दे होते हैं जो बहुत उत्सुकता पैदा करते हैं और बहस को दावत देते हैं.

आबादी का एक बड़े हिस्से के मन में सवाल है कि भारत में मुस्लिमों के साथ कैसा व्यवहार होता है, ये सभी कुछ मायने रखता है.

एक ऐसी जगह जहां क़ानून आपको सुरक्षा नहीं दे सकता वहां स्थानीय लोग आपको राहत देते हैं.

ऐसे में अगर कोई राजनीतिक और सामाजिक व्यवहार में बदलावों पर पूरा जोर लगाकर सफाई देता है तो शायद ही कोई इससे सहमत होत है.

और जब यूपी में नाइजीरियाई लोगों को पीटे जाने जैसी घटना सामने आती है तो जितना भरोसा अर्जित किया गया है, वो पूरी तरह धराशाई हो जाता है.

सवाल और तीखे पूछे जाने लगते हैं, अधिकांश लोग पूछते हैं कि कल्पना करें अगर आपको विदेशी होने के नाते वैसी स्थिति का सामना करना पड़े?

हालात अब और असुविधाजनक हो गए हैं. मुझे कुछ शर्मसार करने वाले सवाल याद हैं, जिनका शायद ही मेरे पास जवाब था.

भारत के दक्षिण और उत्तर में काले लोगों की पिटाई का जवाब आसान नहीं है.

आखिरकार, अगर हम बाकी भूल भी जाएं तब भी इसका जवाब क्या होगा कि हम महात्मा गांधी के देश से आते हैं. एक ऐसे लोकतंत्र से जहां क़ानून का राज है?

ये सब उन लोगों के भरोसे को नुकसान पहुंचाता है, जिनपर काफी संख्या में अप्रवासी भरोसा करते हैं.

भारतीय समुदाय ने जिस दशकों में जिस सम्मान और भरोसे को बनाया, उसे ये नुकसान पहुंचाता है.

भारत में लोगों की हरक़तों के कारण अब ये सब सवालों के घेरे में है और अब खुद से सवाल करिए, एक देश के रूप में हम कहां पहुंच गए हैं?

हो सकता है कि वापस अपने देश में एक नया भारत आपका इंतज़ार कर रहा है.

लेकिन जबतक आप नाइजीरिया में हैं और आपको मॉल से कुछ ज़रूरी सामान लेना है तो आपको बेहद चौकन्ना रहना होगा, धीरे चलना होगा और किसी भी झगड़े से बच के रहना होगा क्योंकि यही साधारण लोग जो बहुत मिलनसार हैं, बेंगलुरु और नोएडा की घटना के प्रभाव में आपको निशाना बना सकते हैं.

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