'अपने साथ हुए रेप की बात इसलिए बताती हूँ'

  • 8 अप्रैल 2017
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एक रेप पीड़िता की कहानी उसी की जुबानी. इस रेप पीड़िता ने बीबीसी थ्री को अपनी बातें बताईं.

आप भी पढ़िए कि एक रेप पीड़िता को कितनी मुश्किल मानसिक हालात का सामना करना पड़ता है .

ज़्यादातर रेप पीड़ितों की तरह मुझ पर भी जिसने यौन हमला किया था उससे मेरे पहले ही अंतरंग रिश्ते थे. उस आदमी के साथ मैं एक रात रुकी थी और ये मेरी उससे मुलाक़ात भी थी.

महीनों बाद वह कोकीन के नशे में मेरे घर पर शाम में पांच बजे आया. उसने कुंडी से दरवाजा खटखटाया. अंदर घुसते ही उसने मुझे बिस्तर पर खींच लिया. उसने धमकी दी कि मैं चिल्लाई तो वह मुझे मार देगा.

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रेप पीड़ितों से अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि तुमने प्रतिकार क्यों नहीं किया. इस सवाल के अंतहीन जवाब हो सकते हैं. मेरे लिए पहला सामान्य जवाब यह था: प्रतिकार करना जोखिम से भरा था.

मैंने अपने गुल्लक से उसके सिर पर मारने के बारे में सोचा था, लेकिन वह डील-डौल में मुझसे दोगुना था. अगर वह काम नहीं करता हो क्या होता? आप उससे भिड़ते या हार मान लेते. क्या उसके बाद और बुरा नहीं होता?

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मैं दो घंटों तक फंसी रही. आख़िर में मैंने नाटक किया मैं ही उसके ऊपर थी और मैंने उसे ख़ुद के पहनने के लिए अंडरवेयर लाने को कहा. उसका ध्यान बंटा तो मैं बच निकली. वह भाग गया और उसने मेरा फ़ोन चुरा लिया इसलिए मेरे पास उसका नंबर नहीं था.

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मैं डर के कारण इसकी रिपोर्ट दर्ज कराने को लेकर अनिच्छुक थी, लेकिन मैं अन्य महिलाओं की रक्षा के लिए आगे आई. दुर्भाग्य से मुझे उस भय का अहसास हुआ. इस मामले की जांच हमले की तरह प्रताड़नापूर्ण थी.

मैं ट्रांसजेंडर हूँ और उस वक़्त बदलाव के शुरुआती वक़्त में थी. मेरे स्तन छोटे थे. मैंने अपने पैरों से बाल हटाना शुरू ही किया था. इसलिए मेरी त्वचा रुखी थी. किसी ने बताया था कि मुझे स्किन की परत हटानी चाहिए.

अगली सुबह मैंने महसूस किया कि वे मुझे लेकर धारणा बना रहे हैं. मुझे लग रहा था कि मैं सचमुच हठी हूं. मैं इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थी कि पूरी रात बाहर नहीं रह सकती. यहां तक कि मैं घर से बाहर भी नहीं जा सकती. मेरा हठ इसलिए भी था क्योंकि मैं दोषी नहीं थी.

जब तक मुझसे पूछताछ हुई थी तब लगा कि मैं पूरी तरह से खुल नहीं सकती. मैं नहीं चाहती थी कि यह बात किसी को बताऊं कि हमलावर के साथ एक रात रुक चुकी थी. ये 2010 की बात थी. मैं इस केस में जितना कर सकती थी उतना किया, लेकिन पुलिस उसे खोज नहीं पाई.

मैंने इस बारे में अपने फ्लैटमेट्स और दोस्तों के सिवा किसी को नहीं बताया. डीएनए के लिए मेरे घर की तलाशी ली गई थी. मैं ढोंग करना चाहती थी कि ऐसा हुआ ही नहीं है.

मैं ख़ुद को समझा रही थी कि उस स्थिति के लिए मैं ज़िम्मेदार हूं. मैं इस शर्मिंदगी के साथ लंबे समय तक रही.

सारी गड़बड़ी इसी से हुई. एक वक़्त मुझे लगा कि मेरे उस अनुभव के कारण सबकुछ प्रभावित हो रहा है. मैं ख़ुद को कैसे देखूं, लोगों पर भरोसा कैसे करूं, मैं अपने पार्टनर के साथ यौन संबंधों में किस कदर सक्षम होऊंगी और सेक्स में मेरे लिए इंजॉय क्या होगा? मुझे पता था कि अपने जख्मों के साथ जीने के मुक़ाबले उसका सामना करने की ज़रूरत है.

मैंने अपने दोस्तों पर भरोसा करना शुरू किया. ये ऐसे लोग थे जिन्हें समान अनुभवों को झेलना पड़ा था. यहां मुझे काफ़ी सांत्वना मिली. हमने इससे मुक़ाबला करने के लिए रणनीतियों को साझा किया.

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यहां से मुझे हिम्मत मिली. उन्होंने कहा कि जो हुआ उसका सामने करने के बजाय मैं भाग रही हूं और इससे मुश्किल कम नहीं होगी. लेकिन मैं तब भी लोगों को बताने में शर्मिंदगी महसूस कर रही थी. मैं नहीं चाहती थी कि कोई मुझे पीड़ित, अश्लील और लापरवाह के रूप में देखे.

हाल ही में मैंने अपने अनुभवों को साझा करना शुरू किया. जब मैंने लोगों से कहना शुरू किया तो और लोगों ने अपने इसी तरह के अनुभवों को साझा किया. मुझे लगा कि यह केवल मेरी समस्या नहीं है. लेकिन ऐसा करने के बाद मुझे थोड़ी राहत भी मिली क्योंकि मैं अकेली नहीं थी.

मुझे लगा कि यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के प्रति समाज का व्यवहार बिल्कुल ठीक नहीं है. हमलोग सामाजिक कलंक के कारण खामोश रहते हैं. हमें इस मामले में खुलकर सामने आना चाहिए और एक-दूसरे को मदद करनी चाहिए.

एक समाज के रूप में इन सब चीज़ों पर खुलकर बात करनी चाहिए ताकि सभी को समझ में आए कि आप कामुक हो सकते हैं और आप बिना शर्म और डर के सेक्स कर सकती हैं, लेकिन रेप सेक्स नहीं है. यह ताक़त का ग़लत इस्तेमाल है. कोई चाहे बुर्का, मिनीस्कर्ट, सूट या पायाजमा पहने, ये रेप की वजह नहीं हो सकते.

मैं अब भी इसके समाधान पर काम कर रही हूं. अब भी वह समय है जब मैं लोगों को अपने क़दम के बारे में बताऊं. एक वह वक़्त था जब मैं ख़ुद को ही दोषी ठहरा रही थी. मैं अब ख़ुद को दोषी नहीं ठहराती. मैं अब सेक्स में रेप को लेकर नहीं डरी रहती. अब सेक्स को मुक्ति के साथ जोड़ती हूं न कि डर के साथ.

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