ब्लॉग: 'क्या भारत, क्या पाक, हम सब रंगभेदी हैं'

  • 10 अप्रैल 2017
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काली, शिवजी महाराज, कृष्ण जी - इन्हें भले कोई कितना भी नीला कर दे, लेकिन हैं तो ये काले. मजनू की लैला भी काली.

रज़िया सुल्तान का क़िस्सा छिड़े और उसके हब्शी ग़ुलाम याकूत का ज़िक्र न हो ये कैसे मुमकिन है.

कारी बदरिया देख के हम खुश हो जाते हैं और भीगने से पहले ही भीग जाते हैं.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
गांधी के देश में रंग को लेकर हिंसा क्यों

काली ज़ुल्फ़ें, कारे नैन, कारी कटारा भवें देखी नहीं और दिल चपरकट्टू हुआ नहीं.

नज़र न लग जाए काला टीका लगा लो.

जहां तक मुसलमानों का मामला है तो अच्छे मुअज़्जिन की कसौटी ये है कि उसकी अज़ान सुनके रसूलअल्लाह के सहाबी हज़रत बिलाल हब्शी की याद आ जाए.

वो अलग बात है कि अरबों ने हब्शियों को ग़ुलाम बना-बना के हिंदुस्तान तक बेच डाला.

गांधीजी का सत्याग्रह

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गांधीजी ने सत्याग्रह का पहला तज़ुर्बा दक्षिणी अफ़्रीका की गोरी मार से हलकान कालों के साथ मिलकर ही तो किया.

कालों की जमात अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस में गांधीजी का क्या मकाम है इसकी गवाही नेल्सन मंडेला कई बार दे चुके.

और नेल्सन मंडेला की भारत में क्या क़द्र है इसका सबूत भारत में नई दिल्ली का नेल्सन मंडेला मार्ग है.

गांधी की राह पर मंडेला के साथ चार कदम

जाने कितनों को याद है कि लालचिट्टे जवाहरलाल नेहरू ने घाना को आज़ादी दिलानेवाले काले क्वा मेनेक्रोमा को अपना भाई बना रखा था.

मगर मेरे इन सभी उदाहरणों का कोई फ़ायदा नहीं क्योंकि हिंदू-मुसलमान झगड़े से बिल्कुल अलग हम सब जातिवादी हैं, रेसिस्ट हैं.

ग्रेटर नोएडा - अफ्रीकी छात्र दहशत में, स्थानीय लोग गुस्से में

नस्लभेदी स्वभाव

काला कलोटा बैंगन लोटा - ये इस उपमहाद्वीप के हर बच्चे को होश संभालते ही रट जाता है.

जब यही बच्चा बड़ा होता है तो उसके लिए चांद-सी बहू तलाश की जाती है.

उसकी साँवली बहन की क़िस्मत को सामने नहीं तो पीठ पीछे कोसा जाता है.

जो जितना काला, उसकी बोली उतनी ही कम. जो जितनी गोरी उसकी बोली उतनी ही ज़्यादा.

हम कभी क्लास में बैठ के ये थियरी चैलेंज नहीं करते कि मनुष्य की जन्मभूमि अफ़्रीका है.

'हम सब काले थे'

एक लाख वर्ष पहले तक सबका रंग काला था.

जैसे-जैसे इनसानी नस्ल फैलती चली गई, उसका रंग भी आबोहवा, खान-पान और इलाके के हिसाब से बदलता चला गया.

हम ये सुनते ज़रूर हैं कि सब इनसान बराबर हैं, भेदभाव सिर्फ़ नफ़रत को जन्म देता है. मगर अंदर से हम सबको यक़ीन है कि ये सब बस कहने-सुनने की बातें हैं.

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Image caption ग्रेटर नोएडा में अफ्रीकी छात्र

कोई देवता, कोई अवतार, पैग़ंबर, कोई ऐतिहासिक कहानी, कोई बॉलीवुड गाना हमारी सोच नहीं बदल सका.

कभी किसी से सुना - चल हट गोरे भुजंग, वर्ना मुंह पे सफ़ेदा पुतवा करके गधे पर बिठा दूंगा.

इसके बाद जब ये ख़बर आती है कि पिछले वर्ष दिल्ली में किसी अफ़्रीकी छात्र को मार-मार कर मार दिया गया और अब से चंद दिन पहले एक दर्जन अफ़्रीकी स्टूडेंट्स ज़ख़्मी हो गए - तो कम से कम मुझे तो कोई आश्चर्य नहीं होता.

जो हम अंदर से हैं वो कभी न कभी बाहर आता ही है न.

इसमें बुरा क्या और अच्छा क्या. हम ऐसे हैं तो हैं.

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