'हबीब' को बचाने के लिए 'कुलभूषण' को सज़ा-ए-मौत!

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Image caption पाकिस्तानी अगवा फ़ौजी हबीब ज़हीर और कुलभूषण जाधव

तारीख़ और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में दिलचस्प और अजीबो-ओ-ग़रीब वाक़यातों की कोई कमी नहीं, लेकिन ऐसे इत्तेफ़ाक़ कम ही होते होंगे जिनको देखकर ऐसा लगे कि जैसे पहले इनकी स्क्रिप्ट लिखी गई होगी फिर ये वाक़यात पेश किए गए होंगे.

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घड़ी को कोई एक साल पहले ले जाइए- 3 मार्च 2016 को पाकिस्तान एलान करता है कि उसने एक काउंटर इंटेलिजेंस ऑपरेशन में भारतीय नेवी के एक सेवा अधिकारी कुलभूषण जाधव उर्फ़ हुसैन मुबारक पटेल को बलूचिस्तान में मशुखेल के इलाक़े से गिरफ़्तार किया है. पूरा भारतीय मीडिया इस को फ़र्ज़ी मामला बताकर ख़ारिज करता है.

एक भारतीय अख़बार के मुताबिक़ कुलभूषण जाधव ईरान के चाबहार पोर्ट पर कार्गो का व्यवसाय कर रहे थे और उन्हें जाल में फंसाकर बलूचिस्तान लाया गया और वहां उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. भारत सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी पर कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी जिसका मक़सद यही लगता है कि कुलभूषण चर्चा में ना आएं.

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अब घड़ी की तारीख़ एक साल आगे ले लाएं- 8 अप्रैल 2017 को पाकिस्तान मीडिया में ये ख़बर आती है कि मुहम्मद हबीब ज़हीर नाम के एक रिटायर्ड सेना अधिकारी को नेपाल से अगवा कर लिया गया है जहां वो एक ग़ैर मुल्क़ी कंपनी में नौकरी हासिल करने के लिए इंटरव्यू देने गए थे.

इस पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया अलग होती है. वो ये कहता है कि हबीब ज़हीर को ट्रैप किया गया है, लेकिन साथ ही मीडिया को उसकी चर्चा से दूर रखने के लिए एक और काम भी करता है और वो कुलभूषण जाधव को ट्रायल के बाद मौत की सज़ा का एलान करता है. जिस तेज़ी से ये ऐलान किया गया उससे यही लगता है कि वो पाकिस्तानी हबीब बनाम भारतीय कुलभूषण के समीकरण से बचना चाहता है.

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कूटनीति के क्षेत्र में इसे किस नज़र से देखा जा रहा है इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन मीडिया में ख़बरों में बने रहने के मक़सद में ये कामयाब नज़र आ रहा है. जब से कुलभूषण को सज़ा-ए-मौत का एलान हुआ है पाकिस्तानी मीडिया उसी का राग अलाप रहा है.

कराची से निकलने वाले उर्दू अख़बार ने कुलभूषण जाधव से जुड़े पाकिस्तानी एलान को हबीब ज़हीर के अगवा होने के बाद की भारतीय योजना की नाकामी क़रार दिया.

अख़बार उम्मत ने 14 अप्रैल को लिखा '' पिछले साल कुलभूषण की गिरफ़्तारी दुनिया के सामने आने के बाद से सरकार को इस तरह की जानकारी मिल रही थी कि भारत जवाबी कार्रवाई के तौर पर सीमा रेखा या किसी और जगह से किसी सेवारत फ़ौजी को अगवा करने के मंसूबे बना रहा है ताकि उस फ़ौजी को जासूस बनाकर कुलभूषण के मामले का विरोध किया जा सके.''

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जैश-ए-मुहम्मद के सरगना मसूद अज़हर की कई मैगज़ीन से जुड़े पत्रकार नवीद मसूद हाशमी ने डेली औसाफ़ में अपने कॉलम में कुलभूषण की आड़ में पाकिस्तान के उदार तबके की आलोचना की है और उनकी सज़ा-ए-मौत को उस तबके के लिए एक झटका बताते हुए लिखा.

''कुलभूषण जाधव सिर्फ एक इंसान नहीं बल्कि पूरी एक मानसिकता का नाम है, एक मानसिकता जो पाकिस्तान की संसद से लेकर टीवी चैनलों के स्टूडियो तक मौजूद है. एक ऐसी मानसिकता जो कश्मीरी मुजाहिदीन के ख़िलाफ़ दिल्ली सरकार की खुलकर हिमायत करती है, एक ऐसी मानसिकता कि जिसका शाहीन पहाड़ों के बजाए मुंबई की फिल्म नगरी में बसेरा करता है.''

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अख़बार नवाए वक़्त के कॉलमिस्ट नुसरत जावेद इस पूरे मामले को एक अलग नज़रिए से देख रहे हैं. उनका कहना है कि कुलभूषण की सज़ा के मामले के ज़रिए मीडिया में जितनी भी उत्तेजना पैदा की जाए इसकी हैसियत दोनों मुल्क़ों के बीच होने वाली संभावित बातचीत में खींचतान से ज़्यादा नहीं है.

नवाए वक़्त में नुसरत लिखते हैं, ''कुलभूषण की गिरफ़्तारी ने हमें अपना केस मज़बूत बनाने में अहम किरदार अदा किया है कि भारतीय जासूसी संगठन कराची और बलूचिस्तान में आतंक फैलाने में लगे हैं. भारत अगर पाकिस्तान के साथ दुश्मनी ख़त्म करना चाहता है तो उसे ऐसी आतंकी गतिविधियों से बाज़ आना होगा.''

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इससे पहले भी 12 अप्रैल को छपने वाले एक कॉलम में नुसरत जावेद कुलभूषण जाधव के मुद्दे पर सावधानी बरतने की ज़रूरत पर ज़ोर दे चुके हैं.

''जासूसी दुनिया के मामले बहुत पेचीदा और गंभीर होते हैं. कुलभूषण की गिरफ़्तारी और किरदार को पाकिस्तानी रियासत की अलग-अलग संस्थाओं के बीच ग़लतफ़हमी फैलाने के लिए इस्तेमाल से बचाना हमारे क़ौमी फ़ायदे की सुरक्षा के लिए बेहद ज़रुरी है. नंबर लेने के लिए हमारे पास पनामा जैसे कई मामले तो मौजूद हैं, इन पर टिके रहिए.''

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