नज़रिया: पाकिस्तान के हर मर्ज़ की दवा खाड़ी देशों में है

  • 20 अप्रैल 2017
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Image caption जनरल मुशर्रफ सऊदी रक्षा मंत्री और क्राउन प्रिंस सुल्तान बिन अब्दुल अजीज और नवाज शरीफ छह मई 1999 को एक डिफेंस वार्ता में

1960 के दशक तक एक आम पाकिस्तानी के दिमाग़ में सऊदी अरब की कल्पना इस्लाम के पवित्र स्थानों की रखवाली करने वाले देश के रूप में थी.

लोग सऊदी अरब की राजधानी रियाद को उतना नहीं जानते थे. वो तो बस मक्का और मदीना को ही जानते रहे थे.

संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, कुवैत और बहरीन जैसे नामों से उस ज़माने का कोई पढ़ा लिखा पाकिस्तानी परिचित भी रहा हो मगर ईरान और तुर्की के साथ तो सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों की खूब चर्चा रहती थी.

जब 1970 के दशक में खाड़ी देशों में पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई तो पाकिस्तान से कामगार उन देशों में रोजगार पाने लगे. इतना ही नहीं पकिस्तान ने खाड़ी के देशों की सेनाओं के प्रशिक्षण में भी अहम भूमिका निभानी शुरू की तो इन देशों से पाकिस्तान के रिश्तों में भी बदलाव आने लगा.

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Image caption अरब इसराइल युद्ध के बाद शाह फैसल और फिर शाह ख़ालिद से भुट्टो की नजदीकी से पश्चिमी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को एक जबरदस्त वित्तीय मदद मिली थी

पाकिस्तानी राजनीति

अक्टूबर 1973 में अरब और इसराइल के बीच हुए युद्ध के बाद शाह फैसल और फिर शाह ख़ालिद से ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की निकटता बढ़ने लगी. बांग्लादेश के अलग हो जाने की वजह से पाकिस्तान का खाड़ी के देशों के साथ सम्बन्ध उसे आर्थिक रूप से मज़बूती देने लगा.

पाकिस्तानी राजनीति में पहली बार सऊदी अरब से विशेष संबंध के महत्व तब सामने आए जब मार्च 1977 के आम चुनाव में धांधली के आरोपों के कारण नौ विपक्षी दलों ने एक साझा मोर्चा बना लिया और भुट्टो के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया.

राजनीतिक पक्षों के बीच तनाव इतना ज़्यादा बढ़ गया तब इस्लामाबाद में सऊदी अरब के राजदूत रियाजुल ख़तीब की 'शटल डिप्लोमासी' ने काम दिखाना शुरू कर दिया.

पकिस्तान का विपक्षी गठजोड़ भुट्टो से बातचीत पर सहमत हो गया लेकिन इसका फल ज़िया उल हक़ ने लपक लिया.

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Image caption ज़िया उल हक़ के साथ सऊदी अरब के हुक्मरानों की खूब जमती रही

'इस्लामी मैट्रिक्स'

ज़िया उल हक ने पाकिस्तान के इस्लामीकरण की योजना बनाई तो वो सऊदी अरब के हुक्मरानों के पसंदीदा बनते चले गए.

दीवानी और आपराधिक कानूनों को 'इस्लामी मैट्रिक्स' में ढालने का काम करने में सऊदी सरकार और उलेमाओं ने ज़िया उल हक़ की भरपूर मदद की. वही इस्लामी क़ानून जो सऊदी अरब में लागू थे, पाकिस्तान में भी लागू हो गए.

सऊदी अरब भुट्टो को फांसी देने का विरोधी था लेकिन फांसी फिर भी हुई. लेकिन ज़िया उल हक़ के साथ सऊदी अरब के हुक्मरानों की खूब जमती रही.

वो इसलिए क्योंकि सऊदी अरब पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में बहुत रुचि लेने लग चुका था. इसी बीच भुट्टो की फांसी के आठ महीनों के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत रूस की सेनाओं ने आक्रमण कर दिया और सारा नक्शा ही बदल गया.

अफ़ग़ान मुजाहिदीन के प्रशिक्षण और उन्हें रूस के खिलाफ तैयार करने के लिए पकिस्तान को प्रत्येक अमेरिकी डॉलर के बदले सऊदी अरब ने भी एक डॉलर दान देना शुरू कर दिया.

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Image caption भुट्टो साहब के सऊदी शाही परिवार के विशेष संबंध थे, लेकिन बेनज़ीर भुट्टो के प्रधानमंत्री होना वैसी गर्मजोशी पैदा न कर पाया. इसका विकल्प संयुक्त अरब अमीरात के रूप में मौजूद था

भुट्टो परिवार

तो फिर सोवियत रूस की वाम विचारधारा से लड़ने के लिए पाकिस्तान में मस्जिदों और मदरसों का जाल बिछाया गया. इस काम को अंजाम देने के लिए अमरीका और सऊदी अरब ने पैसों की कमी नहीं होने दी.

इस दौरान ईरान में भी शिया क्रांति हो चुकी थी. इसलिए पाकिस्तानी प्रतिष्ठान ईरान के साथ अपने भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों से भी अलग होने लगे.

पकिस्तान की दोस्ती का 'पेंडुलम' पूरी तरह सऊदी अरब की तरफ ही झुकता चला गया और पाकिस्तानी विचारधारा में सऊदी अरब का वैचारिक प्रभाव भी बढ़ने लगा. दोनों देश एक जैसे सिद्धांत पर चलते हुए दिखने लगे.

हालांकि ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के साथ सऊदी शाही परिवार के विशेष संबंध रहे थे लेकिन उनकी बेटी बेनज़ीर भुट्टो का प्रधानमंत्री बनना दोनों देशों में वैसी गर्मजोशी पैदा न कर पाया था.

मगर बेनज़ीर के लिए सऊदी अरब के साथ संबंधों का विकल्प संयुक्त अरब अमीरात के रूप में मौजूद था.

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Image caption मुशर्रफ शाह अब्दुल अजीज के साथ सात दिसंबर 2005 को ओआईसी की बैठक के मौके पर

दुबई दूसरी राजधानी

संयुक्त अरब अमीरात की कंपनियों ने बेनज़ीर भुट्टो के कार्यकाल में विभिन्न सेवाओं और उद्योग के क्षेत्र में निवेश करना शुरू कर दिया. इनमें खासतौर पर दूरसंचार, बैंकिंग क्षेत्र प्रमुख रहे.

सत्ता से अपदस्थ होने के बाद दुबई ही बेनज़ीर भुट्टो का घर बना और आज भी ऐसा लगता है कि कराची के साथ दुबई ही सिंध की दूसरी राजधानी है.

इस पूरे समय में पाकिस्तान से बाहर अगर पाकिस्तानियों ने सबसे ज़्यादा संपत्ति किसी देश में खरीद तो वह है संयुक्त अरब अमीरात.

सऊदी अरब के बाद संयुक्त अरब अमीरात खाड़ी का दूसरा ऐसा देश है जहां सबसे ज़्यादा पाकिस्तानी हैं. पाकिस्तान को हर साल जो अप्रवासी विदेशी मुद्रा भेजते हैं उसका आधा उन्हीं दो देशों से आता है.

इसलिए पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में अमीरात की भूमिका भी खासा बढ़ने लगी.

परवेज़ मुशर्रफ़ और बेनज़ीर भुट्टो के बीच 'एनआरओ' आधारित समझौता यानी 'नेशनल रीकंसिलिएशन ऑर्डिनेंस' भी संयुक्त अरब अमीरात में ही तय हुआ था.

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Image caption नवाज शरीफ और शाहबाज शरीफ चार दिसंबर 1999 को कराची की एक अदालत के समक्ष

मुशर्रफ की दोस्ती

जब जनरल मुशर्रफ पद से हटे तब उन्हें पकिस्तान से सुरक्षित निकलने की ज़मानत देने वाले देशों में अमेरिका और ब्रिटेन के साथ संयुक्त अरब अमीरात भी था.

मुशर्रफ का एक घर अगर लंदन में है तो एक दुबई में. और, पाकिस्तान में तो ख़ैर उनका घर है ही.

कुछ महीने पहले मुशर्रफ ने एक पाकिस्तानी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में स्वीकार किया कि उन्होंने लंदन और दुबई में रिटायरमेंट के बाद जो घर खरीदे उसकी रक़म उनके 'प्यारे दोस्त' सऊदी अरब के तत्कालीन बादशाह शाह अब्दुल्ला ने प्रदान की थी.

जनरल मुशर्रफ ने अपने इंटरव्यू में यहाँ तक कहा था कि सऊदी अरब के बादशाह और उनके बीच इतनी 'बेतक़ल्लुफी' यानी यारी थी कि अगर शाह अब्दुल्ला कभी धूम्रपान का 'शौक़' फरमाते थे तो केवल मुशर्रफ के साथ ही.

उन्हीं शाह अब्दुल्ला से उपकृत प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी हैं जिन्हें बादशाह ने 'अपने दोस्त परवेज मुशर्रफ' के चंगुल से 10 दिसंबर 2000 की रात को बचाया था.

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कारगिल को अंजाम

सऊदी अरब ने नवाज़ शरीफ को शाही विमान के ज़रिए जेद्दाह बुलाया और वहां के शाही महल में बरसों रखा भी.

इससे पहले भी जब पाकिस्तान ने मई 1998 में परमाणु परीक्षण किया तो सऊदी अरब ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों का बोझ बंटाने में 'अपने दोस्त' नवाज शरीफ की अच्छी खासी मदद भी की थी.

इससे अगले ही साल जब जनरल मुशर्रफ ने करगिल को अंजाम दिया तो उस मुसीबत से निकलने में भी सऊदी अरब ने उनकी भरपूर मदद की.

जब प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अमरीकी राष्ट्रपति क्लिंटन से मिलने चार जुलाई 1999 को वॉशिंगटन पहुंचे तो सउदी राजदूत शहज़ादा बुंदर बिन सुल्तान ने उन्हें 'ब्लेयर हाउस' तक छोड़ा था.

नवाज शरीफ की क्लिंटन से हुई आधिकारिक बैठक से पहले ही सऊदी अरब ने पाकिस्तान की वकालत की थी और राष्ट्रपति क्लिंटन का दिल पाकिस्तान के लिए नरम किया.

फिर भी शाह अब्दुल्लाह के 'एक दोस्त' परवेज़ मुशर्रफ ने 12 अक्टूबर को उनके 'दूसरे दोस्त' नवाज़ शरीफ का बोरिया बिस्तर गोल कर दिया.

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Image caption पाकिस्तान हालांकि यमन युद्ध में प्रभावी भूमिका अदा नहीं कर रहा लेकिन जनरल राहील शरीफ 34 सदस्यीय मुसलमान सैन्य गठबंधन का हिस्सा जरूर हैं

पाकिस्तान में सत्ता

मगर, सऊदी अरब के लिए पकिस्तान के इस आंतरिक परिवर्तन का कोई ख़ास असर नहीं पड़ा क्योंकि पाकिस्तान में जो भी सत्ता संभालेगा वो पहले तो रियाद ही जाएगा.

समय बीतने के साथ पकिस्तान-अरब भाई-भाई में तीसरा खाड़ी देश कतर भी शामिल हो गया.

जब सवा साल पहले 16 अरब डॉलर के तेल के आयात का समझौता हुआ तो आम धारणा यही थी कि क़तर से पकिस्तान का सिर्फ आर्थिक सम्बन्ध ही है.

पर भला हो पनामा लीक्स के मामले का जिससे गर्दन छुड़ाने की कोशिश में शरीफ परिवार को कहना पड़ा कि पाकिस्तान के सिर्फ सऊदी अरब से ही नहीं बल्कि क़तर के शाही परिवार से भी सगे भाइयों जैसे संबंध हैं.

सऊदी अरब ने तो नवाज शरीफ को तीसरी बार सत्ता संभालने पर डेढ़ अरब डॉलर की सलामी दी थी लेकिन क़तर के शाही परिवार तो शरीफ परिवार के व्यापार भागीदार भी निकल आया और वह भी आज से नहीं 30, 35 साल पहले से.

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शरीफ परिवार

जब शरीफ बंधुओं के पिता ने क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री शेख हम्माद बिन जासम (द्वितीय) के पिता को 12 लाख दिरहम कच्ची रसीद पर निवेश के लिए दिए तो इसके बदले शेख हमद ने लंदन में शरीफ परिवार को चार फ्लैट दे दिए.

रहा इस लेनदेन के रिकॉर्ड का सवाल तो पाकिस्तान की अदालत को क़तर के राजकुमार ने पत्र लिखकर यह बताया कि जनरल मुशर्रफ ने जब तख्ता पलट किया था तो उसके परिणामस्वरूप शरीफ परिवार के 40 सालों का व्यावसायिक रिकॉर्ड भी बर्बाद हो गया था.

अब बस इस पत्र पर ही संतोष किया जो क़तर के राजकुमार ने पकिस्तान की अदालत को लिखा है.

(इस पत्र पर मुझे वह सादे कागज याद आ गए जो बच्चे ड्रॉइंग टीचर को ये कहते हुए थमाया करते थे कि 'सर यह चित्र देखें, गाय घास चर रही है.' शिक्षक ने पूछा इसमें घास कहाँ है बेटा? तो बच्चे ने कहा कि वह तो गाय चर गई सर!! और गाय कहां है बेटा? वह तो घास चरने चली गई सर)

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सऊदी सैन्य प्रतिष्ठान

आज तस्वीर यूं है कि पाकिस्तानी सेना और सऊदी सैन्य प्रतिष्ठान के सीधे संबंध हैं.

पाकिस्तान हालांकि यमन युद्ध में प्रभावी भूमिका अदा नहीं कर रहा लेकिन पाकिस्तान के रिटायर्ड आर्मी चीफ राहील शरीफ 34 मुस्लिम देशों के बीच सैन्य गठबंधन का हिस्सा जरूर हैं.

संयुक्त अरब अमीरात और नवाज शरीफ सरकार के बीच संबंधों में उतनी गर्मजोशी नहीं रही है, लेकिन ज़रदारी परिवार और अमीराती शाही परिवारों के बीच पहले जैसी ही गर्मजोशी है.

हालांकि खाड़ी के देशों में पाकिस्तानी श्रमिकों के साथ कोई ख़ास व्यवहार नहीं किया जाता है लेकिन पाकिस्तान में पाए जाने वाला पक्षी 'तलोर' पाकिस्तान और खाड़ी के देशों के बीच संबंधों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है.

क्योंकि कहा जाता है कि जब पकिस्तान में जनरल अयूब ख़ान राष्ट्रपति थे तो उनके दौर में पहले 'तलोर' आया और फिर अरब शेख उसके पीछे खिंचे चले आए.

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शांति बहाली

यूँ कतरा-कतरा क़तर बनता चला गया. खाड़ी देश पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में न केवल सीधे तौर पर रुचि रखते हैं बल्कि वो धार्मिक संगठनों का भी अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करते हैं.

पिछले 40 साल के दौरान पाकिस्तान और खाड़ी देशों की निकटता की वजह से पाकिस्तान में सामाजिक और राजनीतिक रूप से काफी परिवर्तन आया है.

सामान्य स्तर पर सबसे स्पष्ट परिवर्तन तो 'खुदा-हफ़ीज़' का 'अल्लाह हाफ़िज़' के रूप में बदल जाना है.

1990 के दशक तक शांति बहाली के लिए सेना या अर्धसैनिक बलों द्वारा जो ऑपरेशन चलाए जाते थे उनके नाम 'ऑपरेशन जिब्राल्टर', 'ऑपरेशन सर्चलाइट', आपरेशन फेयर प्ले, आपरेशन 'मिड नाइट जैकाल' हुआ करते थे.

मगर अब इस तरह के ऑपरेशन के मज़हबी नाम होने लगे हैं. जैसे- 'राह-ए-हक़', 'राह-ए-रास्त', 'ज़र्ब-ऐ-आज़ाब' और 'रद्दुल फसाद' होता है.

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चीन और पाकिस्तान के बीच आर्थिक गलियारा काफ़ी अहम है.

राजनीतिक संतुलन

राजनीति में यह बदलाव आया है कि अफगान मुजाहिदीन को एक तराजू में तोलने का मसला हो, आम लोग फ़ौज की अनसुनी करें या फ़ौज आम लोगों की अनसुनी करे, आमदनी से ज़्यादा खर्च को जस्टिफाई करने के किसी शहज़ादे के खत की ज़रूरत हो, किसी को किसी के खिलाफ आंदोलन चलाने से रोकना हो, किसी का समर्थन करना हो तो...

जब मामले पेंच में फंसते हैं तो फिर इन सब का फैसला खाड़ी के देशों में ही होता है. और इस प्रकार सभी एक बार फिर हंसी खुशी रहने लगते हैं.

लेकिन अब एक अंतर पैदा हो रहा है. शुरू के 30 साल पाकिस्तानी में सशक्तिकरण, राजनीतिक संतुलन और मध्यस्थता के लिए अमरीकी भूमिका काफी हुआ करती थी. अगले 30 सालों में खाड़ी देशों ने अमरीका की जगह ले ली और अब चीन का भी समय शुरू हो चुका है.

बच्चे वैसे भी बिना किसी अभिभावक अपने मुद्दों को खुद हल करने में असमर्थ होते हैं. जब बड़े होंगे तब ही बड़े होंगे ना.

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