ब्लॉग: अच्छे मुसलमान ना सही, अच्छे इंसान ही बन जाते तो...

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Image caption मशाल ख़ान की हत्या एक कथित सोशल मीडिया पोस्ट के चलते उनके साथियों ने ही कर दी.

अगर, अगर, अगर.

अगर सभी गुस्ताख़ ब्लॉगरों को फांसी दे दी जाती तो ऐसा न होता.

अगर मुमताज़ कादरी को फांसी न दी जाती तो ऐसा न होता. अगर मदरसे न होते तो ऐसा कभी नहीं होता.

अगर हम इस्लाम की तालीम पर अमल करते तो ऐसा कभी नहीं होता. अगर हम अच्छे मुसलमान ना सही, अच्छे इंसान ही बन जाते तो ऐसा कभी नहीं होता.

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हम जानवर हैं, जानवर. सफ़ेद काग़ज़ सामने रखकर कलम उठाया तो काग़ज़ कफ़न जैसा लगा. दिल से आवाज़ आई चलो शुरू हो जाओ कफ़नफरोशी के धंधे पर. पर फिर ख़्याल आया कफ़न पर कलमा-ए-शहादत (मुस्लिम धार्मिक विश्वास की गवाही देने संबंधी क़ुरान की आयात) दिया जाता है.

जो गवाही मर्दान में दी गई उसके लिए ईमान भरे और मोबाइल फ़ोनों के साथ सैकड़ों युवा मौजूद थे.

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अगर सरकार इन युवाओं को इस्लामी शिक्षा देने के बाद ख़ुद उस पर अमल न करे तो ये लोग क्या करें?

अगर राज्य की सबसे शक्तिशाली संस्था यह कहने लगे कि वैचारिक दुश्मनों से बचने के लिए राज्य के पास एकमात्र तरीका यह है कि उन पर 'पैगंबर मोहम्मद की शान में गुस्ताख़ी' का आरोप लगा दो तो कोई मुसलमान चुपचाप घर नहीं बैठ सकता.

क्या हम अपने बाहरी दुश्मनों से चल रही सारी युद्ध जीत चुके हैं कि हमने एक ऐसी नई जंग छेड़ ली है जो घर घर में होगी.

वो लोग जिन्हें ईशनिंदा का आरोप लगाकर मार दिया गया

सरकारों के पास अपने विरोधियों को चुप करने के लिए पहले से ही कई तरीके मौजूद हैं, गमशुदगियाँ, कैद और बंद, आर्थिक शोषण, लेकिन अब सरकार तय कर चुकी है कि जो कविता पसंद न आए, फ़ेसबुक पर कोई अपडेट पसंद न आए तो पहले लोगों की भावनाएं भड़कायी जाएं और फिर उन्हें अपने विरोधियों पर छोड़ दिया जाए.

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Image caption मशाल ख़ान इसी कमरे में रहते थे. दीवार पर कार्ल मार्क्स और चे ग्वेरा की तस्वीर लगी है

पाकिस्तान में मस्जिदें जितनी आबाद हैं, उतनी पहले कभी नहीं थीं. इस्लामी शिक्षा का बोलबाला है, लेकिन क्या पाकिस्तान का विचार यही है कि पैगंबर मोहम्मद पर भरोसा करने वाले हर व्यक्ति के दिल में संदेह डाला जाए कि उसके साथ बगल में खड़ा नमाजी कहीं पैगंबर की शान में गुस्ताख़ी करने वाला तो नहीं है.

अगर समस्या मदरसों और शैक्षणिक संस्थाओं तक सीमित होता तो आप ऑपरेशन पर ऑपरेशन करते जाते लेकिन मर्दान विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में क्या पढ़ाया जा रहा था?

तो क्या देश की समस्या अशिक्षा और अज्ञानता ही है जैसा कि देश के बड़े बुर्जुग हमें सालों से बताते आ रहे हैं. ऐसे में सलाम है उन करोड़ों बच्चों को, जिन्होंने कभी किसी क्लास रूम में क़दम नहीं रखा, शायद वे जाहिल बच्चे ही अब देश का भविष्य हैं.

अगर मनुष्य और पशुओं की बात ही करनी है तो थोड़ी देर के लिए समाचार देखना छोड़ कर चैनल बदलें, एनिमल प्लांट चैनल पर जानवरों को जानवरों का शिकार करता देखें. वे अपना पेट भरने के लिए दूसरे जानवर को मारते हैं या अपने बच्चों की जान की रक्षा के लिए.

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Image caption मशाल ख़ान के पिता इक़बाल ख़ान

क्या कभी किसी जानवर ने अपने दुश्मन को मार कर उसकी लाश पर पत्थर मारे हों या उसके शव की तस्वीरें खींची हैं ताकि बाद में उस का मज़ा फिर से ले सके? ऐसा जानवर अभी तक खोजा नहीं गया है.

अगर हम अपने दिल पर हाथ रख कर कलमा-ए-शहादत पढ़ें और सोचें कि अगर आप माँ या पिता होते, अगर सुबह अपने इकलौते बच्चे को विश्वविद्यालय में पत्रकारिता शिक्षा के लिए भेजें, बेटा वापस न आए और उसका शव वापस आने से पहले उसका वायरल वीडियो आ जाए, जिसमें उसके हमउम्र, उसके साथी, शायद वही कर रहे हैं जो मशाल के साथ हुआ तो आप क्या करेंगे?

अल्लाह न करे किसी माता-पिता को ये समय देखना पड़े, लेकिन जिन पर आ गया है वह सारी उम्र कहते फिरेंगे कि 'लेकिन मैं तो पैदा होते ही उसके कान में अज़ान दी थी, जब तूतली भाषा में बोलने लगा तो मैं सबसे पहले उसे कलमा शहादत सिखाया था.'

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Image caption मशाल ख़ान के परिजन शव को अंत्येष्टि के लिए ले जाते हुए

'लेकिन जब वो पांच साल का हुआ तो अपने साथ शुक्रवार की नमाज के लिए मस्जिद ले जाता था जहां यह इधर-उधर देखकर मासूमियत से सजदे में जाता था कि साथ वाले नमाज़ी मुस्कुरा देते थे.'

'मेरे बेटे ने तो कभी अपने से बड़े के सामने उंची आवाज़ में बात नहीं की वह दुनिया के सबसे पवित्र इंसान पैगंबर मोहम्मद की शान में गुस्ताख़ी करने के बारे में सोच भी कैसे सकता है. लेकिन अगर, अगर, अगर वह ऐसा करता तो अपने हाथों से उसका...'

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