डोनल्ड ट्रंप- 100 दिनों के कार्यकाल में कितने वादे पूरे किए?

  • 26 अप्रैल 2017
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एक राष्ट्रपति की कामयाबी का उनके 'शुरुआती सौ दिनों' के जरिए आकलन करना बहुत हद तक एक किताबी बात है.

अगर इंसानों की 12 उंगलियां होतीं तो शायद हम एक राष्ट्रपति का आकलन उनके शुरुआती 144 दिनों के आधार पर करते.

अगर पृथ्वी के घूमने की रफ़्तार थोड़ी धीमी होती तो राष्ट्रपतियों के पास उपलब्धियां हासिल करने का भी ज्यादा वक्त होता!

लेकिन फिर भी 100 दिन का वक्त इतना अरसा तो होता है कि मोटे तौर पर ये समझा जा सके कि राष्ट्रपति किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

ये भी कि चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करने की दिशा में कितनी प्रगति हुई है.

राष्ट्रपति के तौर पर डोनल्ड ट्रंप के कार्यकाल के शुरुआती 100 दिन चाहे जैसे रहे हों, लेकिन ये बोरियत भरे या सुस्त रफ्तार वाले नहीं थे.

लेकिन ये जानना ज़रूरी है कि इस दौरान कितना वक्त बयानबाजी और आवेश के नाम था और वास्तविक कामकाज कितना हुआ?

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मेक्सिको सीमा पर दीवार

शुरुआत उस दीवार के जिक्र से जो राष्ट्रपति के चुनाव अभियान का सबसे पुराना और अहम वादा था.

अपने चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप अमरीका-मेक्सिको की सीमा पर दीवार बनाने की योजना का लगातार जिक्र करते थे. जब वो कहते थे कि इस दीवार का खर्च मेक्सिको वहन करेगा तब उनकी रैलियों में जुटने वाले लोग सहमति जाहिर करते थे.

लेकिन बीते हफ्ते राष्ट्रपति ने जो ट्वीट किया, वो उस निश्चितता से अलग भाषा बयान कर रहा था.

ट्रंप ने ट्विटर पर लिखा, "सीमा पर निहायत जरूरी दीवार के लिए मेक्सिको बाद की किसी तारीख में किसी रूप में भुगतान करेगा ताकि काम जल्दी शुरू हो सके."

ये ट्रंप के वादों के 140 या उससे कम शब्दों में राजनीतिक हकीकत से रूबरू होने का मामला है. चुनाव अभियान के दौरान बयानबाजी आसान है लेकिन वाशिंगटन में वादों को अमल में लाना कहीं जटिल काम है.

ट्रंप प्रशासन ने दीवार का काम शुरू करने के लिए धन की व्यवस्था करने का वादा किया है लेकिन ये स्पष्ट है कि दीवार को हकीकत का रूप देने के लिए कांग्रेस को अरबों डालर की जरूरत होगी.

इसे लेकर राष्ट्रपति और सांसदों के बीच तनातनी हो सकती है. कई रिपब्लिकन प्रतिनिधि खासकर अमरीका-मेक्सिको सीमा का प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्रपति ट्रंप की पसंदीदा परियोजना के लिए रकम मुहैया कराने के इच्छुक नहीं हैं.

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सुप्रीम कोर्ट में जज की नियुक्ति

डोनल्ड ट्रंप ने चुनाव अभियान के दौरान जो सूची जारी की थी, उसमें से बेंच की खाली सीट के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज के चयन का वादा किया था. नील गोरसच को नामित करके उन्होंने ऐसा ही किया.

गोरसच के शपथ समारोह में ट्रंप ने कहा, "मैंने हमेशा सुना है कि अमरीका के राष्ट्रपति जो सबसे अहम काम करते हैं, वो है लोगों की नियुक्ति. "

उन्होंने कहा, "मैं कह सकता हूं कि ये एक महान सम्मान है. और मैंने ये पहले 100 दिनों में कर दिया है. ये और भी अच्छा है. क्या आपको लगता है कि ये आसान है?"

गोरसच के लिए अनुमोदन लेने का काम निसंदेह आसान नहीं था. एकजुट डेमोक्रेटिक विपक्ष के मुकाबले सीनेट में रिपब्लिकन नेता मिच मैक्कॉनल ने सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति पर मुहर के लिए साधारण बहुमत को मंजूरी देने की पुरानी परपाटी को तोड़ दिया.

एक बार ये होने के बाद सीनेट में रिपब्लिकन बहुमत के लिए अपनी मर्जी लागू करना आसान हो गया. गोरसच ने जज के रूप में शपथ ले ली.

ट्रंप को सिर्फ एक कागज पर नाम पर लिखना था और उसके बाद उन्हें सीनेट में मौजूद रिपब्लिकन पार्टी के प्रतिनिधियों पर भरोसा दिखाना था. राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप ने जो कामकाज निर्धारित किए हैं, उन्होंने उसमें से एक अहम मुद्दे को चुना.

उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान उखड़े रहे रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं को ये बताते हुए संतुष्ट करने की कोशिश की कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट को एक भरोसेमंद रूढ़िवादी जज मिलेगा.

वो अब इस उम्मीद में राष्ट्रपति के साथ खड़े रह सकते हैं कि आने वाले दिनों में गोरसच की तरह की और नियुक्तियां हो सकती हैं. राष्ट्रपति ने निश्चित तौर पर अपना वादा पूरा किया.

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हेल्थकेयर पर फ़िलहाल पीछे हटे

"कोई नहीं जानता था कि हेल्थकेयर का मुद्दा इतना पेचीदा हो सकता है."

फरवरी में आए राष्ट्रपति के इस बयान से साफ हो गया कि स्वास्थ्य सुधारों को लेकर उनकी अपनी पार्टी में ही सहमति बनाना मुश्किल है.

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान डेमोक्रेटिक प्रशासन के हेल्थेकेयर कानून ओबामा केयर को अपने कार्यकाल के पहले ही दिन रद्द करने का वादा किया था.

लेकिन अपनी कोशिश में नाकाम होने पर कार्यकाल के 64वें दिन ट्रंप ने अपनी टाइमलाइन से पीछे हटते हुए कहा, "मैंने ये कभी नहीं कहा था कि 64 दिन के अंदर इसे रद्द करते हुए नया कानून ले आएंगे. मेरे पास लंबा वक्त है. मैं एक उम्दा हेल्थकेयर विधेयक और योजना चाहता हूं और हम ऐसा करेंगे. ये होगा और इसमें बहुत देर नहीं लगेगी."

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भविष्य में क्या होगा ये कहा नहीं जा सकता है लेकिन फिलहाल वास्तविकता ये है कि हेल्थकेयर सुधार ट्रंप के पहले 100 दिन के कार्यकाल के दौरान पहला प्रमुख विधायी प्रयास था और इसके जरिए ये साबित हुआ कि रिपब्लकिन पार्टी में दरार है और ये इसके लिए एकीकृत एजेंडा पर आगे बढ़ना मुश्किल है.

ये वादा पूरा नहीं हो सका.

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प्रवासन

आप्रवासन के मोर्चे पर वादे पूरे करने के मामले में ट्रंप का रिकॉर्ड मिला-जुला है. ट्रंप प्रशासन ने इस मोर्चे पर कोशिश करने में ढील नहीं दिखाई है.

ट्रंप प्रशासन ने अमरीका प्रवासी कार्यक्रम को सीमित करने और मुस्लिम बहुल कुछ देशों के लोगों के अमरीका आने पर फ़िलहाल रोक लगाने का फैसला किया लेकिन कोर्ट के जज़ों ने इन आदेशों पर रोक लगा दी.

ट्रंप ने एच-1बी वीज़ा समेत आप्रवासन कार्यक्रम की समीक्षा का आदेश दिया और बॉर्डर पेट्रोल एजेंट और आप्रवासन कोर्ट के जज़ों की नियुक्ति का एलान किया.

वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद डेढ़ महीने के दौरान आप्रवासन से जुड़ी गिरफ्तारियां 32.6 फीसदी बढ़ गईं. इनमें से ज्यादातर ऐसे लोग थे जिनका पहले आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था. इस दौरान सीमा पर गिरफ्तारियां कम हुई हैं.

अपने चुनाव अभियान के दौरान राष्ट्रपति ने आप्रवासन के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाने की बात की थी. हालिया वर्षों में बिना वैध दस्तावेजों के अमरीका आने वाले प्रवासियों की संख्या में कमी आई है. ट्रंप इस मोर्चे पर अपनी कही बातों पर अमल करने की कोशिश रहे हैं.

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विदेश नीति

चुनाव अभियान के दौरान विदेश नीति को लेकर ट्रंप का नजरिया विरोधाभासी और विवादास्पद प्रस्तावों से भरा था.

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर ट्रंप ने चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट, ईरान और चीन पर सख्त रुख अपनाने की बात की थी.

इसराइल के साथ गठजोड़ की पुष्टि और रूस के साथ रिश्ते बेहतर करने की भी बात कही थी.

उन्होंने हिरासत में रखे गए लोगों के उत्पीड़न पर लगी रोक हटाने, अमरीकी सेना को कार्रवाई के लिए ज्यादा अधिकार देने की बात की. इनमें संदिग्ध चरमपंथियों के परिवारों को निशाना बनाना भी शामिल था.

इन सब के ऊपर उन्होंने अमरीका के हितों को सर्वोपरि रखने और उनके मुताबिक बोझ बने अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों से हटने की भी बात कही थी.

वादे के मुताबिक उन्होंने ट्रांस पैसिफिक साझेदारी से अमरीका को बाहर किया है और नॉर्थ अमरीका फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की समीक्षा की प्रक्रिया शुरू की है.

ट्रंप ने जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल और इटली के पाउलो जेंटीलोनी जैसे विदेशी नेताओं से कहा कि वो चाहते हैं कि वे अपने सैन्य खर्च में इजाफा करें. दूसरी तरफ उन्होंने हाल में नैटो की अहमियत को स्वीकार किया है.

चीन को लेकर उन्होंने नरम रुख अपनाया है. सीरिया के अपने ही लोगों पर रासायनिक हथियार इस्तेमाल करने के बाद ट्रंप प्रशासन ने सीरियाई सेना पर मिसाइल हमला किया.

ये वो कार्रवाई है जिसे उम्मीदवार के तौर पर ट्रंप ने अनुपयोगी बताते हुए खारिज किया था.

साल 2013 में जब बराक ओबामा ने सीरिया में दखल की बात की थी तब रियलिटी टीवी स्टार के तौर पर ट्रंप ने इसकी निंदा की थी.

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आधारभूत ढांचा, टैक्स और चाइल्डकेयर

चुनाव से कुछ हफ्ते पहले 22 अक्टूबर को ट्रंप ने पेनसिल्वेनिया में दिए भाषण में 'अमरीका को दोबारा महान बनाने के लिए 100 दिन की योजना' रखी. उन्होंने इसे अमरीकी वोटरों के साथ करार बताया.

इनमें मध्य वर्ग के लिए टैक्स रिलीफ एंड सिम्पलिफिकेशन एक्ट, वहन किए जाने लायक चाइल्ड केयर और बुजुर्गों की देखभाल का अधिनियम, ओबामाकेयर एक्ट को खत्म करना और अमेरिकन एनर्जी एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर एक्ट शामिल था.

ओबामाकेयर को खत्म करने के प्रयास के अलावा बाकी तमाम वादों पर कोई अमल नहीं हुआ है.

ट्रंप का कहना है कि इस हफ्ते टैक्स योजना आने वाली है लेकिन जैसा कि हेल्थकेयर के साथ हुआ एक विस्तृत योजना विरोधियों के लिए आसान निशाना बन सकती है.

व्हाइट हाउस का जोर देकर कहना है कि हैरी ट्रूमैन के बाद से इस वक्त तक ट्रंप ने किसी भी राष्ट्रपति के मुकाबले ज्यादा कानूनों पर दस्तख्त किए हैं.

अगर उन पर गौर करें तो वो हैं वेटरन्स मेडिकल क्लीनिक, म्यूजियम बोर्ड के लिए नियुक्तियां और 1991 के खाड़ी युद्ध के लिए स्मारक बनाना. इनमें से ज्यादातर अभी प्रभाव में नहीं आए हैं.

इस मोर्चे पर ट्रंप को अपनी वास्तविक ताकत अभी दिखानी है.

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बदले हुए तेवर

ट्रंप पारंपरिक राष्ट्रपति नहीं हैं. ऐसे में शायद उनके कार्यकाल के शुरुआती कुछ महीनों का उनकी नीतिगत उपलब्धियों और नाकामियों को लेकर पारंपरिक तरह से आकलन करना निष्पक्ष नहीं होगा.

ज्यादातर मतदाताओं ने दीवार, हेल्थकेयर और टैक्स जैसे वादों के आधार पर उनका समर्थन नहीं किया था. ट्रंप को उनके रुख और राजनीतिक तंत्र को हिला देने के वादे के लिए समर्थन मिला.

अगर आकलन इसे लेकर हो कि राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप ने राजनीति में किस कदर बदलाव पैदा किया है तो वो साफ तौर पर विजेता बनकर उभरे हैं.

अपने विवादित ट्वीट् और बयानों को लेकर वो राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली बहसों में छाए रहते हैं. उनके फैसले पारंपरिक राजनीतिक नियमों को चुनौती देते हैं.

उन्होंने विदेशी नेताओं को भाषण दिए हैं. प्रमुख कंपनियों को धौंस दिखाई है और आलोचना करने वाली मीडिया पर बरसते रहे हैं.

ट्रंप ने अपने वादे के मुताबिक प्रशासनिक अधिकारियों के सेवामुक्त होने के बाद लॉबी करने से रोकने के लिए कदम उठाए हैं.

दूसरी तरफ उन्होंने अपने व्यापक व्यापारिक साम्राज्य से जुड़े हितों के टकराव को रोकने का वादा किया था लेकिन उस मोर्चे पर सब कुछ धुंधला सा है.

हालांकि अब तक उनके समर्थक खुश नज़र आते हैं. हाल में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक नवंबर में ट्रंप को वोट देने वाले लोगों में से 96 फीसदी उनके साथ हैं.

उन्हें लगता है कि राष्ट्रपति ने जो करने का वादा किया था, उस पर अमल कर रहे रहे हैं भले ही वो उसे कानूनी जामा न पहना सके हों.

अगर अर्थव्यवस्था पटरी पर रही और बेरोजगारी कम रही तो वो लंबे समय तक उनके साथ खड़े रहेंगे.

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