क्या अमरीका फिर अफ़ग़ानिस्तान में फंसने जा रहा है?

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Image caption अमरीकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस की ऐसे समय क़ाबुल यात्रा हो रही है जब देश में सेना प्रमुख और रक्षा मंत्री को हटा दिया गया है

अमरीकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस ने जब बीते सोमवार को क़ाबुल के लिए उड़ान भरी तो वो खुले दरवाजे वाले कार्गो विमान में दिखाई दिए.

यह बहुत ही ग्लैमरस छवि थी लेकिन शायद वो बहुत ही मुश्किल समय में वहां के लिए रवाना हो रहे थे.

बीते शुक्रवार को अफ़ग़ानिस्तान के 16 सालों के संघर्ष में तालिबान ने सबसे बड़ा हमला किया था.

इसके बाद सोमवार को देश के रक्षा मंत्री अब्दुल्लाह हबीबी और सैन्य प्रमुख क़दम शाह शाहिम ने अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया.

मज़ार-ए-शरीफ के बाहर सैन्य अड्डे पर हमले को सबसे ज्यादा खूनख़राबे वाला माना जा रहा है.

जब मुझे इस सैन्य बेस को दिखाया गया तो उसका संदेश था कि हालांकि ग़लती हुई थी, लेकिन तालिबान ने बहुत बारीक चाल चली थी.

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Image caption शुक्रवार को मज़ार-ए-शरीफ़ में जुमे की नमाज़ के बाद तालिबान लड़ाकों ने हमला बोला था

तालिबान की चाल

तालिबान लड़ाके अफ़ग़ान सेना जैसी हूबहू रंगी फ़ोर्ड रेंजर गाड़ियों में वहां पहुंचे थे. उनके पास पूरी वर्दी थी और उनके दस्तावेज़ भी दुरुस्त थे.

उनकी एक टीम में खून से लथपथ, सिर पर पट्टी बांधे एक घायल के वेश में लड़ाका था जिसके हाथ में ड्रिप भी लगी थी.

लेकिन इन चालों के बावजूद जितना ख़ूनख़राबा हुआ, वो नहीं होना चाहिए था.

माना जा रहा है कि तालिबान के 10 लड़ाकों ने 170 अफ़ग़ानी सुरक्षाकर्मियों को मारा. सेना के आत्मविश्वास के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए यह बहुत बड़ा झटका था.

इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि शीर्ष दो पदाधिकारियों का इस्तीफ़ा, सेना के नेतृत्व को हिला देने वाली बस शुरुआत है.

सैन्य बेस के इंचार्ज मेजर कतावज़ाई समेत चार कोर कमांडरों को निलंबित कर दिया गया है.

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Image caption सेना की कैंटीन में हुआ नुकसान बताता है कि हमला कितना तगड़ा था

नेतृत्वविहीन सेना

इस बीच आठ और सैन्य अधिकारियों की जांच हो रही है. उन पर कथित तौर पर संदेह है कि उन्होंने बेस के अंदर से तालिबान लड़ाकों की मदद की थी.

इसने एक बेहद ख़तरनाक़ समय पर अफ़ग़ान सेना को दिशाहीन बना दिया है.

वर्तमान में देश के एक तिहाई हिस्से पर तालिबान का कब्ज़ा है और आम तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में जब ठंड का समय बीत जाता है हिंसा में बढ़ोत्तरी होती है, जिसे 'फ़ाइटिंग सीज़न' कहा जाता है.

हालांकि आधिकारिक रूप से वसंत का आक्रामक अभियान इस साल अभी तक शुरू नहीं हुआ है.

पिछले महीने तालिबान ने दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के हेलमंड प्रांत के सैंगिन ज़िले को अपने नियंत्रण में ले लिया था, जो कि एक अहम रणनीतिक बढ़त है.

अमरीकी मिशन के बारे में सार्वजनिक बयान लगातार इस्लामिक स्टेट और अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद अन्य अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठनों से निपटने की कोशिशों पर केंद्रित होते जा रहे हैं.

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अमरीकी मदद

लेकिन सच्चाई ये है कि अमरीका ये मानता है कि अफ़ग़ानिस्तानी सरकार को मुख्य ख़तरा तालिबान से है और यहां अमरीकी कार्रवाई मुख्य रूप से तालिबान के ख़िलाफ़ केंद्रित है.

देश से जब नैटो मिशन गया उसके बाद ढाई सालों में तालिबान ने काफ़ी सफलता हासिल की है.

और इसकी वजह से अफ़ग़ानिस्तान के अधिकारियों और अमरीका के शीर्ष अधिकारियों में ये बात चलने लगी है कि अमरीका को ट्रेनिंग और मदद के मिशन पर ज़ोर देना चाहिए.

सुझाव ये भी है कि यहां कुछ हज़ार और सिपाहियों की ज़रूरत है.

निश्चित रूप से काबुल में अमरीकी रक्षा मंत्री की अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति और अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाक़ात के विषयों में ये भी शामिल रहा होगा.

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मतभेदों से ग्रस्त सरकार

लेकिन अधिकांश सैन्य विश्लेषकों को इस बात पर संदेह है कि इससे हवा का रुख बदलेगा. पिछले साल सरकारी फ़ौज के रिकॉर्ड 6,800 जवान मारे गए थे.

पिछले 16 में, जब अमरीकी सेना यहां थी, उसके मुक़ाबले ये संख्या तीन गुनी ज़्यादा है. इसके अलावा हज़ारों जवान घायल होकर सेना से चले गए या छोड़ गए.

ये बात एक बार अफ़ग़ान सुरक्षा बलों की उस समस्या की ओर इशारा करती है.

अपर्याप्त ट्रेनिंग और भर्ती होने वालों की ओर से प्रतिबद्धता की कमी होना, विपरीत परिस्थितियां, अफ़सरों में भ्रष्टाचार और हवाई सपोर्ट की बहुत बुरी स्थिति.

अफ़ग़ानिस्तान के चीफ़ एक्ज़ेक्यूटिव अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह के कार्यालय ने नए रक्षा मंत्री की नियुक्ति की घोषणा की है. उनका नाम है तारिक़ शाह बहरानी.

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अफ़ग़ानिस्तान में चुनौतियां

हालांकि संसद इस पर मुहर लगाएगी, ये अलग मामला है. राष्ट्रीय एकता सरकार मुश्किल से ही अपने काम को अंजाम दे पाती है.

पिछले तीन सालों में इसमें काफ़ी दरार और खुले तौर पर असहमतियां सामने आई हैं.

अगर तालिबान को सफलता पूर्वक पीछे धकेलना है और सेना संकट के दौर से हो तो सरकार के शीर्ष नेतृत्व में एकता होनी ज़रूरी है.

अब वर्तमान प्रशासन ये कर पाता है या नहीं, ये दूसरा मामला है.

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