वॉशिंगटन हिलाने के बजाय ख़ुद ही हिल गए ट्रंप!

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गर्मी के मौसम में मैं अगर अलाव की आग के आस-पास होनेवाली गपशप की बात करूं तो आप सिरफिरा कहेंगे.

लेकिन ट्रंप साहब के 100 दिन क्या पूरे होने को आए, अमरीका को 1933 की अलाव की आग वाली बातचीत यानी "फ़ायरसाइड चैट" के नाम से मशहूर फ़्रैंकलिन रूज़वेल्ट के भाषणों की बड़ी याद आ रही है.

रूज़वेल्ट ने जब व्हाइट हाउस में पांव रखा तो अमरीका भयंकर मंदी से जूझ रहा था. लोगों का बैंकों से भरोसा उठ चुका था और जैसी क़तारें आपने भारत में नोटबंदी के समय देखी होंगी या भुगती होंगी कुछ वैसी ही कतारें थीं यहां पैसा निकालने वालों की.

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रूज़वेल्ट ने कुर्सी संभालने के दो दिनों के अंदर सभी बैंकों को बंद कर दिया, पांचवें दिन कांग्रेस के साथ मिलकर इमरजेंसी बैंकिंग क़ानून पास किया और पहली रविवार को रात 10 बजे रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित किया जिसे छह करोड़ लोगों ने सुना.

उस समय के इतिहासकार कहते हैं कि उस भाषण ने एक तरह से जनता का विश्वास जीत लिया.

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बैंकों में लोग वापस पैसा जमा करने लगे और फिर रूज़वेल्ट ने वैसे 30 और भाषण दिए जो "फ़ायरसाइड चैट" के नाम से मशहूर हुए और सबको एक से बढ़कर एक टीआरपी मिली.

और 100 दिनों के अंदर ही जो कामयाबियां उन्होंने हासिल कीं, कहते हैं तभी से हर राष्ट्रपति के पहले 100 दिन का लेखा-जोखा हासिल करने की परंपरा चल पड़ी.

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चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप साहब भी पहले दिन और पहले 100 दिन में ये कर दूंगा, वो कर दूंगा वाले नारे देते थे, लेकिन जब 100 दिन पूरे होने को आए तो इस परंपरा को कोसने लगे.

सही भी है. कहां तो साहब आते ही वॉशिंगटन को हिलाने की बात कर रहे थे अब जैसे ख़ुद ही हिले हुए हैं.

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व्हाइट हाउस में कौन कमरा कहां है ये भी पता नहीं चला था कि लाखों महिलाओं ने वॉशिंगटन में जमा होकर उनके ख़िलाफ़ ऐसी आवाज़ बुलंद की जो अमरीका के लिए एक रेकॉर्ड था.

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किसी के पोस्टर में उनके छोटे हाथों पर टिप्पणी थी तो कोई उन्हें महिलाओं के शरीर से अपना हाथ दूर रखने की चेतावनी दे रहा था.

लेकिन ट्रंप साहब को सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा इस बात पर आया कि कइयों ने कहा कि महिलाओं की भीड़ उनकी ताजपोशी के दिन की भीड़ से भी ज़्यादा थी.

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उन्होंने सात मुसलमान-बहुल देशों से आने वालों पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन बेदर्द अदालतों ने ट्रंप के अरमानों को लाल झंडी दिखा दी.

रूस के साथ उनके और उनकी टीम के संबंधों को लेकर भी सवाल उठने लगे. सबसे पहले धराशायी हुए उनके बेहद करीबी समझे जाने वाले उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल फ़्लिन.

कुछ ही हफ़्तों बाद एफ़बीआई के डायरेक्टर ने कह दिया कि वो ट्रंप और रूस के संबंधों की जांच कर रहे हैं.

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ओबामाकेयर को उखाड़ फेंकने का वादा कर चुके ट्रंप को कांग्रेस में भी झटका ही लगा. उनकी अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के सभी सांसदों का वोट भी उन्हें नहीं मिल पाया.

मेक्सिको की सीमा पर दीवार बनाने और उसका पैसा मेक्सिको से वसूलने का ख़्वाब भी फ़िलहाल हवा में ही हिचकोले खा रहा है.

कभी ओबामा पर अपनी खीझ उतारी, कभी अपनी ही ख़ुफ़िया एजेंसियों की काबिलियत पर सवाल उठाए तो कभी कांग्रेस को ही कोसा.

अब ग़लती तो वॉशिंगटन की है. जब ट्रंप साहब अपने वादों को पूरा करने की कोशिश करते हैं तो कोई उनकी चलने नहीं देता और दूसरी तरफ़ 100 दिनों में क्या हासिल किया ये भी पूछता है.

यही तो वजह है कि जब भी मौका मिलता है ट्रंप साहब व्हाइट हाउस छोड़कर अपने फ़्लोरिडा वाले ऐशगाह पहुंच जाते हैं. 100 दिन की ऐसी-तैसी, अभी तो चार साल पड़े हैं.

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