बदले की भावना ऐसे बचाती है आपको

  • 29 अप्रैल 2017
इमेज कॉपीरइट Getty Images

आपने अपनी ज़िंदगी में कई बार बदले की भावना से काम लिया होगा. कभी शतरंज या क्रिकेट में हारे तो अगले मैच में बदला लेने की कोशिश की. किसी ने आप को बुरा-भला कहा, तो आपने बदला लेने की सोची होगी. किसी ने आपको नुक़सान पहुंचाया, तो आपके ज़हन में बदले का ख़याल आया होगा.

बदले की भावना का तसव्वुर खट्टा भी है और मीठा भी. ग्रीक कवि होमर के महाकाव्य द इलियड में ट्रॉय की पराजय की कहानी तो आपने सुनी होगी. जब ट्रॉय का राजकुमार पेरिस, ग्रीक राजा मेनेलॉस की पत्नी हेलेन को भगा ले जाता है, तो मेलेनॉस इस बेइज़्ज़ती को बर्दाश्त नहीं कर पाता. वो ट्रॉय से बदला लेने के लिए कई राज्यों की फौज इकट्ठा करता है और ट्रॉय पर हमला कर देता है. इस जंग में हज़ारों लोग मारे जाते हैं.

इस साल दुनिया को परेशान करने वाले 12 सवाल

दुनिया की सबसे ख़तरनाक़ कब्रगाह!

हमारे देश में भी जब रावण, भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण कर लेता है, तो राम और उनके भाई लक्ष्मण इसका बदला लेने के लिए रावण की लंका पर हमला बोलते हैं. महाभारत में भी पांडव, अपनी पत्नी द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए अपने चचेरे भाइयों कौरवों से महाभारत की लडा़ई लड़ते हैं.

इंसान में बदले की भावना तब से है, जब से हम इस धरती पर रह रहे हैं. हमारे देश के क़िस्से-कहानी हों, या, पश्चिमी साहित्य, बदले की कहानियों से भरे पड़े हैं. फिर चाहे वो शेक्सपीयर का ड्रामा हैमलेट हो या ग्रीक उपन्यास ओरेस्टिया ट्रायलॉजी.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

ऐसे लोग बिरले ही मिलेंगे, जो अपने साथ गलत होने पर बदले की भावना से न भर गए हों. बदले की भावना जोर मारते ही ये लगता है कि बदला लेने से आपको जो नुक़सान हुआ है, उसकी भरपाई हो जाएगी.

कहां से आती है बदले की भावना?

पर आजकल रिसर्चर इस सवाल का जवाब तलाश रहे हैं कि आखिर बदले की भावना हमारे अंदर आती कैसे है? बहुत कोशिशों के बावजूद इस सवाल का कोई ठोस जवाब तो नहीं मिला. हां कुछ संकेत ज़रूर मिले हैं. इनके नतीजे में ये कहा जा रहा है कि बदले की भावना के कुछ फ़ायदे भी होते हैं.

अमरीका की मयामी यूनिवर्सिटी के माइकल मैक्कुलो इस मुद्दे पर काफ़ी दिनों से तजुर्बे कर रहे हैं. माइकल कहते हैं कि बदले की भावना हर इंसानी समाज में देखने को मिलती है. लोग ग़ुस्से से पागल होकर दूसरों को नुक़सान पहुंचाने का ख़याल अपने ज़हन में लाते हैं.

बहुत कुछ बताती है जिस्म की ख़ुशबू

अगर ज़ीरो न होता तो क्या क्या ना होता

माइकल का रिसर्च बताता है कि दुनिया में बीस फ़ीसद हत्याओं के पीछे बदले की भावना होती है. स्कूलों में होने वाली गोलीबारी में साठ फ़ीसद के पीछे बदले की भावना होती है. कई बार हमारी राजनीति पर भी बदले की भावना का सीधा असर देखने को मिलता है. जैसे अमरीका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत को अमरीकी गोरे कामगारों का बदला बताया जाता है. इन्हें लग रहा था कि ओबामा के राज में इन्हें तरक़्क़ी के फ़ायदे नहीं मिले.

बदले की भावना मन में आने के पीछे कई बार शराब, तो कई बार अपमान और अक्सर ख़ुदग़र्ज़ी बड़ी वजह होती है. हिंसक बर्ताव और बदले की भावना को अलग करके नहीं देखा जा सकता. अमरीका की वर्जीनिया कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी के डेविड चेस्टर पहले लोगों में हिंसक बर्ताव के बारे में रिसर्च कर रहे थे.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन अपने ग़ुस्से के लिए भी मशहूर थे

लेकिन जल्द ही उन्हें समझ में आ गया कि हिंसक घटना से पहले बहुत कुछ होता है. अक्सर हिंसा का ख़ाका ज़हन में पहले से खिंचता है. इंसान जज़्बाती होकर काम करते हैं. किसी का बर्ताव बुरा लगने पर भी लोग हिंसक हो उठते हैं. बेइज़्ज़ती होने की सूरत में बदले की भावना प्रबल हो जाती है.

डेविड चेस्टर ने अपने सहयोगी नैथ डिवाल के साथ मिलकर एक तजुर्बा किया. दोनों ने पाया कि जब किसी आदमी को समाज से अलग-थलग कर दिया जाता है, अपमानित किया जाता है, तो वो बहुत तकलीफ़ महसूस करता है. चेस्टर और डिवाल ने पाया कि ऐसे लोगों के दिमाग का वो हिस्सा काफ़ी एक्टिव था, जहां हम दर्द महसूस करते हैं.

ख़ारिज किए जाने की तकलीफ़

इसके बाद एक और तजुर्बे में डेविड और नैथन ने पाया कि ये जज़्बाती तकलीफ़ अक्सर लुत्फ़ के भाव से जुड़ी होती है. यानी जब कोई आपको ख़ारिज करता है, तो पहले तो आपको तकलीफ़ होती है. लेकिन जैसे ही आप इस बेइज़्ज़ती का बदला लेने का मौक़ा पाते हैं, तो आपका ज़हन लुत्फ़ के जज़्बात से भर जाता है. उकसाने पर जब लोग आक्रामक होते हैं, तो असल में वो बदले की भावना के लुत्फ़ से भरे होते हैं. इसीलिए तो कहा जाता है कि बदले का स्वाद बेहद मीठा होता है.

डेविड और नैथन ने एक और तजुर्बे में पाया कि बदला लेकर लोग ख़ुशी महसूस करते हैं. बल्कि कई बार तो ख़ुशी पाने की उम्मीद में ही बदला लेते हैं. हालांकि जानकार इन बातों को ज़्यादा गंभीरता से लेने से गुरेज़ करने की सलाह देते हैं.

बेशक़ीमती है आपका पुराना फ़ोन

सोशल नेटवर्क बन रहा है सेक्शुअल नेटवर्क

असल में अब तक इस बात का कोई अध्ययन नहीं किया गया है कि बदला लेने के कुछ हफ़्तों या महीनों के बाद इंसान कैसा महसूस करता है. जो रिसर्च हुए हैं, उनके मुताबिक़ बदला लेने वाले को फ़ौरी लुत्फ़ तो आता है. मगर ये लुत्फ़ वो लंबे वक़्त तक नहीं महसूस कर पाता. डेविड चेस्टर कहते हैं कि कई लोगों को तो बदले की भावना से लुत्फ़ लेने की लत भी पड़ जाती है. अगर वो बदला नहीं ले पाते तो उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें नशे के लिए ज़रूरी चीज़ नहीं मिली.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

यही वजह है कि बहुत से लोग बदले के लिए बेताब रहते हैं. जैसे कि फ्रेंच फुटबॉलर ज़िनेदिन ज़िदान, जिन्होंने 2006 के फुटबॉल वर्ल्ड कप मे मैक्रो मातेराज़ी नाम के खिलाड़ी को सिर से चोट पहुंचाई थी. इसी तरह पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के बारे में कहा जाता है कि वो सियासी विरोधियों से बदला लेने में बहुत लुत्फ़ हासिल करते थे.

सवाल ये है कि जब बदले की भावना इंसान के लिए नुक़सानदेह है तो ये सदियों से हमारे अंदर भरी हुई क्यों है? अब तक इसका ख़ात्मा क्यों नहीं हुआ?

अमरीकी जानकार माइकल मैक्कुलो कहते हैं कि बदले की भावना होने के फ़ायदे भी हैं. हो सकता है कि बहुत से लोग ये कहें कि बदले की भावना से आपके रिश्ते बिगड़ जाते हैं. लेकिन इंसानों में बदले की भावना होने के फ़ायदे हैं. ये हमें बहुत से बुरे काम करने से रोकती भी है. इस तरह ये हमारे अस्तित्व के लिए ज़रूरी हो जाती है.

जैसे कि किसी जेल में जब कोई क़ैदी एक गैंग का शिकार होता है, तो उसके अंदर बदले की भावना आती है. फिर वो इसके ख़तरों का आकलन करता है. और ख़ुद को बदला लेने से रोकता है. ऐसा करने से वो अपनी जान उस गैंग से बचाने में कामयाब होता है. वो अपने लिए मुफ़ीद वक़्त का इंतज़ार करता है.

ये आपको बचाता भी है

बदले की भावना के फ़ायदे को लियोनार्दो डी कैप्रियो की फ़िल्म द रेवेनांट में बख़ूबी फ़िल्माया गया था. इसमें लियोनार्दो ने ऐसे शख़्स का किरदार निभाया है जो अपने बेटे की हत्या का बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है. उसकी हड्डियां टूटी होती है, ज़ख़्म गहरे होते हैं. फिर भी वो लंबा और मुश्किल सफ़र तय करके उस शख़्स को पकड़ता है जिसने उसके बेटे की हत्या की होती है.

कई बार बदले का ख़तरा भी आपको बचाता है. माइकल मैक्कुलो कहते है कि अगर सामने वाले को ये एहसास होता है कि आप ज़ोरदार पलटवार करेंगे, तो वो आपने भिड़ने से बचेगा. बदले की भावना हमारे अंदर ठीक उसी तरह है, जैसे कि भूख. जैसे ही हमें खाना मिलता है, हमारी भूख शांत हो जाती है. इसी तरह बदला लेकर हमारा हिंसक बर्ताव भी शांत होता है.

यानी अगर बदले की भावना का मुख्य मक़सद, किसी नुक़सान से बचाना है, तो ये हमारे लिए बहुत फ़ायदेमंद है. हालांकि माइकल मैक्कुलो कहते हैं कि इसका ये मतलब नहीं कि लोगों को सब काम छोड़कर बदला लेने पर उतारू हो जाना चाहिए.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

वैसे कहा ये जाता है कि महिलाओं के मुक़ाबले मर्दों को बदला लेने में ज़्यादा लुत्फ़ आता है. मर्दों को ख़ारिज किए जाने पर बहुत तकलीफ़ होती है. इसलिए वो जल्दी ही बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं. वैसे सभी लोग बदले की भावना से हिंसा ही करें, ये ज़रूरी नहीं. कई लोग ग़ुस्से पर क़ाबू पाने में कामयाब होते हैं.

हम अपने ग़ुस्से और बदले की भावना पर कोशिश करने से क़ाबू पा सकते हैं. इसके लिए अपने दिमाग़ को ट्रेनिंग देनी होगी. उसे बदले की भावना से काम करने के नुक़सान समझाने होंगे.

तो, अगली बार जब आपके ज़हन में बदले का ख़याल आए, तो इसके नफ़े-नुक़सान को पहले तोल-मोल लें.

(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)