जब तुर्की के ताक़तवर एर्दोआन से मिलेंगे मोदी

  • 30 अप्रैल 2017
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तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन 30 अप्रैल को भारत दौरे पर आ रहे हैं. वे अपने देश में बेहद मज़बूत नेता हैं और ये संयोग है कि उनकी मेहमानवाज़ी करने वाले नरेंद्र मोदी भी भारत में बेहद मज़बूत नेता हैं.

इसी 16 अप्रैल को तुर्की में हुए जनमत संग्रह में एर्दोआन की अगुवाई में देश में राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू किए जाने को स्पष्ट बहुमत मिला है. इस फ़ैसले के बाद एर्दोआन उस स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां से वे कोई भी फ़ैसला ले सकते हैं.

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इस हिसाब से देखें तो एर्दोआन का क़द तुर्की में वहां तक पहुंच गया है, जिसके आसपास कोई नहीं दिखता. हालांकि इस दौरान वे उस देश की व्यवस्था को पूरी तरह बदलने की राह पर हैं, जिसे मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने बनाया था.

आधुनिक तुर्की के निर्माता

महात्मा गांधी ने, ख़िलाफ़त आंदोलन के लिए मौलाना मोहम्मद अली से इस्तांबुल में हाथ मिलाया था, लेकिन आधुनिक तुर्की के निर्माता ने उसके ठीक उलट जाकर ख़िलाफ़त आंदोलन को ख़त्म कर दिया.

आधुनिक इस्तांबुल के मशहूर चर्च सेंट सोफिया को ओटोमान वंश के सुल्तानों ने मस्जिद में बदल दिया था. अतातुर्क ने उस फ़ैसले को बदला. इस चर्च को मस्जिद बनाए जाने से यूरोप की भावनाएं आहत हुई थीं, अब यहां एक शानदार म्यूज़ियम है.

अतातुर्क ने आधुनिक तुर्की का भविष्य यूरोप में देखा था. तुर्की की लिपि की जगह उन्होंने रोमन लिपि को अपनाया. महिलाओं के सिर पर दुपट्टा रखना ज़रूरी नहीं रह गया. इतना ही नहीं, सौंफ के बीज को आसवित करके बनाया गया ड्रिंक राकी को उन्होंने राष्ट्रीय ड्रिंक घोषित कर दिया. यह ड्रिंक अतातुर्क को भी बेहद पसंद था.

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यूरोपीय संघ में शामिल होने की कोशिशें

अतातुर्क तुर्की को यूरोप जैसा बनाना चाहते थे, लेकिन उनकी राह में तुर्की का सामाजिक पिछड़ापन चुनौती बना हुआ था. ऐसे में उन्होंने देश में आधारभूत ढांचों का विकास, पर्यावरण की स्थिति को बेहतर करने की कोशिश की और यूरोप जितने कड़े क़ानून बनाए. लेकिन तुर्की के नेता ये भूल गए कि मध्यकालीन दौर से ही तुर्क नाम से यूरोपीय समुदाय पूर्वाग्रह पाले हुए है.

यही वजह है कि तुर्की को आज तक यूरोपीय संघ की सदस्यता नहीं मिली है, उन्हें बार बार चकमा दिया जाता रहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति वेलरी गिस्कार्ड का वो बयान लोग भूले नहीं हैं जिसमें उन्होंने कहा था, "यूरोपीय सभ्यता एक ईसाइयत वाली सभ्यता है."

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यूरोप के इस रुख़ से तुर्की के बेहतरीन प्रधानमंत्री रहे ब्यूलेंट एजिविट एकविट बेहद हताश हो गए थे.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एजिविट के बारे में जानना चाहिए, एजिविट ने खुद को भारतीयता सिखाई थी. रवींद्र नाथ टैगोर की गीतांजलि का उन्होंने तुर्की में अनुवाद किया, जो आज भी तुर्की साहित्य में मास्टरपीस माना जाता है.

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Image caption मुस्तफा कमाल अतातुर्क के पोस्टर

अतातुर्क ने तुर्की को जिस तरह से आधुनिक बनाया, वो शाह के नेतृत्व में उत्तरी तेहरान और अमानुल्ला के शासन में क़ाबुल में हुए विकास जैसा खोखला नहीं था. लेकिन ये इस्तांबुल और अंकारा से बाहर नहीं निकल पाया.

लेकिन क्या यूरोप इस मामले को लेकर संवेदनशीलता दिखा पाया?

पश्चिमी जगत मुस्लिम समुदाय को लेकर असंवेदनशील रहा है. इस्लामोफोबिया की वजह मुस्लिम समुदाय की धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को भी हिलाते रहे हैं. तुर्की में एजिविट, सुलेमान डेमिरेल, तुर्गुट ओज़ाल जैसे नेता हुए हैं.

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इतना ही नहीं वहां केनेन इवेरेन जैसे सेना प्रमुख हुए हैं, जिन्होंने एक मुस्लिम देश में धर्मनिरपेक्ष संविधान की वकालत की.

धर्मनिरपेक्ष तुर्की

इराक के नाम पर दिखाए गए डर और अमरीका में नौ सितंबर को हुए हमले के बाद जिस तरह से अफ़ग़ानिस्तानी ज़मीन से प्रत्येक मुस्लिम देश के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ा गया उससे लोगों की धारणाएं प्रभावित हुई हैं.

तुर्की में पश्चिमी विरोधी भावनाएं ज़ोर पकड़ने लगीं, ख़ासकर तब जब बोस्निया युद्ध के दौरान मुस्लिमों पर अत्याचार शुरू हुए. पश्चिमी जगत ये भूल गया कि बोस्निया एक समय में ओटोमान वंश के अधीन था.

साराजेवो भी सराय शब्द से निकला है.

ऐसे दौर में नेकमिटिन इरबाकान के नेतृत्व में रेफाह पार्टी सत्ता में आई. इरबाकान मुस्लिम ब्रदरहुड देशों के नज़दीकी थे. ऐसे में सेना ने सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया- तुर्की का संविधान सार्वजनिक जीवन में धर्म से किसी लगाव को बर्दाश्त नहीं करता.

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एर्दोआन का उदय

इरबाकान के शिष्य तेयेप एर्दोआन और अब्दुल्ला गुल ने पार्टी को जस्टिस एंड डेवलपेंट पार्टी के तौर पर विकसित किया और संविधान के दायरे में इसे बढ़ाया भी.

चालाकी से इस्लाम को बढ़ावा देकर पश्चिमी विरोध की आवाज़ को हवा दी गई. जब अमरीकी रक्षा मंत्री डोनल्ड रम्सफ़ील्ड ने इराक़ जाने के लिए तुर्की की सीमा के इस्तेमाल की बात कही, तो एर्दोआन ने इस मामले को संसद के हवाले कर दिया, संसद ने उसे इज़ाजत नहीं दी.

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इसके अलावा फ़िलिस्तीन की मदद के लिए भी राहत समानों से भरा जहाज तुर्की ने भेजा. जिसकी इसराइल ने काफ़ी आलोचना की. आज जब पश्चिमी सभ्यता को जन्म देने वाला ग्रीस घुटनों पर है तब तुर्की हर मायने में यूरोपीय देशों को टक्कर दे रहा है.

तीसरा चुनाव जीतने के बाद एर्दोआन की लोकप्रियता अतातुर्क से भी बढ़ गई है. उनसे ये उम्मीद की जाने लगी कि वे अरब वर्ल्ड के सामने लोकतांत्रिक मॉडल पेश कर सकें.

कुछ तुर्क सपने भी देखने लगे कि जिस तरह से कॉमनवेल्थ देशों का समूह हो सकता है, उसी तरह ओटोमान वंश के अधीन रहे देशों का समूह बने. इसने अरब देशों की मुश्किलें बढ़ाईं.

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देश में संकट

तुर्की के सबसे मशहूर पत्रकारों में शामिल स्वर्गीय मेहमेट बिरांड ने बोसपोरूस के एक बेहतरीन रेस्टोरेंट में खाते हुए कहा था, "हम पश्चिम के विनम्र सहयोगी बन गए थे, तुर्की का अभियान जा रहा था, लेकिन एर्दोआन के शासन में तुर्की पश्चिमी देशों से असंतुष्ट लेकिन गर्व से भरा देश है."

सीरिया के ख़िलाफ़ युद्ध ने भी एर्दोआन को मुस्लिम ब्रदरहुड में मज़बूत बनाया है. बशर अल असद की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं.

पिछले साल एर्दोआन के ख़िलाफ़ अमरीका में रह रहे प्रभावी मौलवी फ़तहुल्लाह गुलेन की तख़्तापलट की कोशिश भी नाकाम हो गई थी.

इसके बाद एर्दोआन ने राष्ट्रपति शासन प्रणाली के तहत सारे अधिकार अपने हाथ में कर लिए हैं. ऐसे में इस बात का सांकेतिक महत्व बहुत ज्यादा है कि एर्दोआन इतने शक्तिशाली होने के बाद सबसे पहले नरेंद्र मोदी से बातचीत कर रहे हैं.

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