पाकिस्तान की मीडिया में छाई हुई हैं कश्मीर की पत्थरबाज़ लड़कियां

  • 30 अप्रैल 2017
कश्मीर की पत्थरबाज़ लड़कियां इमेज कॉपीरइट BILAL BAHADUR

बीते हफ़्ते भी भारत से संबंधित ख़बरें पाकिस्तानी मीडिया में छाई रहीं. इसके साथ में कश्मीर में हिंसा की स्थिति और भारतीय कारोबारी सज्जन जिंदल के पाकिस्तान के दौरे की उर्दू अख़बारों में बहुत चर्चा रही.

तहरीक-ए-तालिबान के पाकिस्तान के प्रवक्ता एहसानुल्लाह एहसान के फौज़ के बारे में दिए गए बयान में भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसी रॉ का ज़िक्र हुआ. इसने कुलभूषण जाधव के हवाले से जारी चर्चा को एक बार फिर हवा दे दी.

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कश्मीर: सोशल मीडिया साइटों पर लगी पाबंदी

कश्मीर के लोग क्यों लिख रहे हैं 'आखिरी पोस्ट'?

सफेद कॉलेज यूनिफॉर्म में लिपटी कश्मीरी लड़कियों की भारतीय सुरक्षाबलों पर पत्थरबाज़ी की तस्वीरें उर्दू अख़बारों में पहले पन्ने पर छापी गईं, जबकि सुरक्षा बलों की फायरिंग से मारे जाने वाले कश्मीरी नौजवानों की पाकिस्तानी झंडे में दफ़नाने की घटना को भी कुछ अख़बारों ने अपने पहले पन्ने पर जगह दी.

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उर्दू अख़बार 'रोज़नामा इस्लाम' ने अपने एक संपादकीय में पत्थरबाज़ी करने वाली छात्राओं की तस्वीरों को कश्मीर में सोशल मीडिया पर पाबंदी की बड़ी वजह करार दिया.

अख़बार लिखता है, "सोशल मीडिया वेबसाइट पर वायरल होने वाली तलबट की तस्वीर के बाद भारतीय हुक्मरानों की नींदें उड़ गईं और वो सर पकड़ कर बैठ गए... तलबट के शहीद एहतजाज़ के बाद कश्मीर में सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई ताकि कश्मीरी नौजवान भारतीय अत्याचार और जबरदस्ती को मीडिया के ज़रिए पूरी दुनिया के सामने ना ला सकें."

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कश्मीर की ये 'पत्थरबाज़ लड़कियां'

क्या कश्मीर के हिंसक प्रदर्शन बड़े ख़तरे का संकेत हैं?

इसी अख़बार में छपने वाले एक और लेख में उन हिस्सों को इस्लाम का दुश्मन और भारत का तरफ़दार करार दिया है जो कश्मीर में जारी हिंसा की ताज़ा लहर को कम कर के दिखा रहे हैं.

नफ़रत में सुलगते रहेंगे

लेख में लिखा गया है, "भारत प्रशासित कश्मीर में रोज़बरोज़ बढ़ते हुए प्रदर्शन दुनिया भर में अगर कहीं कम होते या मंद पड़ते दिखाई दे रहे हैं तो समझ लीजिए कि ऐसे लोग या गिरोह या तो इस्लामी दुनिया के ख़िलाफ़ अपनी नफ़रत के अलाव में सुलगते रहते होंगे या फिर भारत के तरफ़दार होंगे."

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Image caption सज्जन जिंदल, पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ के साथ

भारतीय कारोबारी सज्जन जिंदल के पाकिस्तानी दौरे और प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से मुलाक़ात को भी उर्दू मीडिया में काफ़ी कवरेज दी गई है.

कराची से छपने वाले उर्दू अख़बार 'रोज़नामा उम्मत' ने 28 अप्रैल को इस ख़बर को 'अरबपति हिंदू कारोबारी का ख़ुफ़िया दौरा-ए-पाकिस्तान' की हेडलाइन के साथ बड़ी ख़बर के तौर पर छापा है.

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'संभल कर करें बातचीत'

अख़बार 'रोज़नामा उम्मत' के मुताबिक़ सज्जन जिंदल के इस दौरे को कश्मीर में आज़ादी के आंदोलन के संदर्भ में देखा जा रहा है क्योंकि कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने पिछले दिनों मोदी से मुलाक़ात की थी और कहा था कि कश्मीर में हालात गंभीर हो गए हैं इसलिए इस मसले के हल के लिए हुर्रियत नेताओं और पाकिस्तान से बात की जाए.

कुलभूषण जाधव की मां ने पाकिस्तान भेजी अर्ज़ी

क्या कुलभूषण जाधव को बचाया जा सकता है?

लाहौर से निकलने वाले उर्दू अख़बार 'नवाए वक़्त' ने एक संपादकीय में नवाज़ शरीफ़ की सज्जन जिंदल से मुलाक़ात पर सख़्त आलोचना की है और इसे राष्ट्रीय हित का सौदा करार दिया है.

अख़बार का कहना है, "पाकिस्तान की सलामती के ख़िलाफ़ भारत की नापाक कोशिशें तो अब किसी से ढंकी छिपी नहीं रहीं, इसके बावजूद हमारे हुक्मरान भारत से दोस्ती और व्यापार की ख़्वाहिशें को अमली जामा पहनाने के लिए राष्ट्रीय हितों का भी सौदा करते नज़र आते हैं."

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अख़बार ने इस दौरे को कुलभूषण जाधव की रिहाई के लिए भारतीय कोशिशों से भी जोड़ा है.

अख़बार लिखता है, "ये एकतरफा तमाशा है कि विदेश मंत्रालय को इस मुलाक़ात की कानोकान ख़बर नहीं थी जबकि भारतीय मीडिया ख़ूब प्रोपगैंडा कर रहा था कि जिंदल प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ख़ास पैग़ाम ले कर पाकिस्तान आए हैं और उनसे भारतीय जासूस कुलभूषण की रिहाई के लिए बातचीत हुई है."

'नाकारात्मक संदेश जाएगा'

उर्दू अख़बार 'रोज़नामा उम्मत' ने अपने एक संपादकीय में पीएम नवाज़ शरीफ़ को भारत के साथ बातचीत करते हुए अधिक एहतियात का मशविरा दिया है.

कुलभूषण जाधव के बारे में जो अभी तक पता है

अख़बार लिखता है, "भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी के क़रीबी दोस्त सज्जन जिंदल ने एक ऐसे वक़्त पीएम नवाज़ शरीफ़ से मुलाक़ात की है जब कश्मीर में आज़ादी का आंदोलन जोरों पर है और कश्मीरी रोज़ाना अपनी जान दे रहे हैं... ऐसे में इस मुलाक़ात से कश्मीरियों को नकारात्मक पैग़ाम जाएगा. पाकिस्तान कश्मीरियों का वकील है. वो अपने शहीदों को पाकिस्तानी झंडे में लपेट कर दफनाते हैं. हमें उनके जज़्बे की सराहना करनी होगी."

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अख़बार 'उम्मत' ने टीटीपी के पूर्व प्रवक्ता एहसानुल्लाह एहसान के पाकिस्तानी फौज के हवाले से सामने आने वाले बयान को भारत, अफ़गानिस्तान और ख़ुद टीटीपी की आलोचना के लिए इस्तेमाल किया है.

अख़बार ने लिखा है, "इस बयान ने पाकिस्तान के इस पुराने रुख़ की पुष्टि की है कि हमारे मुल्क को अस्थिरता से दोचार करने और यहां दहशतगर्दी फैलाने में पड़ोसी मुल्कों भारत और अफ़गानिस्तान ने हमेशा घिनौना रोल अदा किया है..... एहसानुल्लाह एहसान ने अपने बयान में कहा है कि हम इस्लाम का नाम ज़रूर लेते हैं लेकिन इस पर अमल नहीं करते. इस के बरक्श मुसलमानों के कत्ल में हिस्सा लेते हैं."

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