नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग

  • 1 मई 2017
Image caption महाभियोग का सामना कर रही नेपाल की मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की

नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को निलंबित कर दिया गया है.

नेपाल में सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दो बड़े दलों ने महिला मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाने का प्रस्ताव किया था.

उसी के बाद उन्हें निलंबित किया गया है.

राजनीतिक दलों ने सुशीला कार्की पर पक्षपातपूर्ण फ़ैसले देने और कार्यपालिका के न्यायक्षेत्र में हस्तक्षेप का आरोप लगाया है.

महाभियोग प्रस्ताव पर कम से कम 249 सांसदों ने दस्तख़त किया. महाभियोग प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक चौथाई से ज़्यादा सांसदों के समर्थन की ज़रूरत होती है.

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की पसंद वाले पुलिस प्रमुख की नियुक्ति को ख़ारिज कर दिया था. उसके बाद ही मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू हुई है.

पिछले महीने अदालत ने सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नवराज सिलवाल के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था और कहा था कि उन्हें ग़लत तरीके से दरकिनार कर जय बहादुर चंद नाम के एक कम सीनियर अधिकारी को आगे बढ़ाया गया है.

स्थानीय मीडिया के मुताबिक सरकार के दूसरे उम्मीदवार प्रकाश अर्याल को लेकर मामले की अगली सुनवाई 2 मई को होनी है.

आलोचकों का कहना है कि काबिलियत को नज़रअंदाज़ कर पुलिस की नियुक्तियों में राजनीतिक दलों की धांधली का इतिहास रहा है.

नेपाली मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस प्रमुख की नियुक्ति को लेकर सत्ताधारी गठबंधन में भी मतभेद थे.

महाभियोग कमेटी के गठन और जांच की प्रक्रिया शुरू होने की वजह से मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की स्वत: निलंबित हो गई हैं.

जांच के जो भी नतीजे होंगे उसे संसद के समक्ष वोटिंग के लिए रखा जाएगा जिसके पारित होने के लिए दो तिहाई बहुमत की दरकार होगी.

सत्ताधारी गठबंधन में यूसीपीएन (माओवादी-सेंटर), नेपाली कांग्रेस और कुछ दूसरी छोटी पार्टियां शामिल हैं जिन्हें महाभियोग प्रस्ताव को पारित करने के लिए बाहरी समर्थन की भी ज़रूरत होगी.

64 वर्षीय सुशीला कार्की को अप्रैल 2016 में मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था और वो इसी साल जून में रिटायर होने वाली हैं.

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