न्यू सिल्क रूट को लेकर चीन के इरादे क्या हैं

चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption 'वन बेल्ट वन रोड' सम्मेलन के लिए चीन आईं चिली की राष्ट्रपति मिशेल बैशलेट के साथ गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण करते शी जिनपिंग

चीन में रविवार से शुरू हुए दो दिवसीय 'वन बेल्‍ट वन रोड' (न्यू सिल्क रूट) सम्‍मेलन का भारत ने बहिष्‍कार किया है.

चीन की ओबीओआर परियोजना को लेकर भारत ने संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सवाल उठाया है.

सवाल उठता है कि 'वन बेल्‍ट वन रोड' परियोजना आखिर है क्या? चीन ने पूरी दुनिया में अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए एशिया, यूरोप और अफ़्रीका के 65 देशों को जोड़ने की योजना बनाई है.

और इसे नाम दिया है 'वन बेल्ट, वन रोड' यानी ओबीओआर परियोजना. इसे न्यू सिल्क रूट नाम से भी जाना जाता है.

इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption इसी सम्मेलन के लिए चीन आए हंगरी के राष्ट्रपति विक्टर ओर्बान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण करते ली कचियांग

रूस तक कारोबार

देखा जाए तो ओबीओआर एक ही परियोजना नहीं है, बल्कि छह आर्थिक गलियारों की मिली-जुली परियोजना है, जिसमें रेलवे लाइन, सड़क, बंदरगाह और अन्य आधारभूत ढाँचे शामिल हैं.

ओबीओआर में तीन ज़मीनी रास्ते होंगे जिनकी शुरुआत चीन से होगी. पहला मार्ग मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप के देशों की ओर जाएगा.

इससे चीन की पहुँच किर्गिस्तान, ईरान, तुर्की से लेकर ग्रीस तक हो जाएगी. दूसरा मार्ग मध्य एशिया से होते हुए पश्चिम एशिया और भूमध्य सागर की ओर जाएगा. इस रास्ते से चीन, कज़ाकस्तान और रूस तक ज़मीन के रास्ते कारोबार कर सकेगा.

तीसरा मार्ग दक्षिण एशियाई देश बांग्लादेश की तरफ़ जाएगा. साथ ही पाकिस्तान के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाह ग्वादर को पश्चिमी चीन से जोड़ने की योजना पर काम चल ही रहा है.

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images
Image caption 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना से जुड़े दस्तावेजों पर दस्तखत करने के बाद नेपाली विदेश सचिव शंकर दास बैरागी और नेपाल में चीनी राजदूत यू हॉन्ग

वैश्विक कारोबार

इसके अलावा चीन से एक जल मार्ग थाईलैंड, मलेशिया होते हुए सिंगापुर और हिंद महासागर की ओर जाएगा.

इस तरह सड़क, रेल और बंदरगाहों के जाल बुनने के लिए चीन क़रीब 60 लाख करोड़ रुपए से अधिक की रकम उपलब्ध कराएगा.

दुनियाभर में कुल कारोबार का तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा अभी समुद्री रास्तों से होकर जाता है. ये सीधे-सीधे द्विपक्षीय आदान-प्रदान होता है.

यानी अगर सऊदी अरब से तेल चीन ले जाना हो तो जहाज़ समुद्री रास्ते से चीन पहुँचेगा और ऐसा बहुत कम होता है कि रास्ते में पड़ने वाले किसी और देश को इस व्यापारिक सौदे का फ़ायदा हो.

इस परियोजना से व्यापार के लिए समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम हो जाएगी और जहाँ तक अहमियत का सवाल है तो इससे वैश्विक कारोबार की तस्वीर बदल जाएगी क्योंकि,समुद्री रास्तों से कारोबार पर अभी अमरीका का दबदबा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)