ब्लॉग: '...तो भारत ब्रिक्स में चीन का साझेदार क्यों है?'

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हाय-हाय....आकाश कैसे-कैसे रंग बदलता है?

अभी कल ही की तो बात थी कि भारत ये कहते हुए पाकिस्तान की चुटकी भरा करता था कि कश्मीर को साइड में रखो और पहले एक-दूसरे का ये भरोसा बढ़ाने के लिए कि कहीं दूसरे ने आस्तीन में खंजर तो नहीं छिपा रखा है, व्यापार करते हैं.

जब व्यापार बढ़ेगा, तो दुश्मनी घटेगी....दुश्मनी घटेगी तो भरोसा बढ़ेगा, फिर कश्मीर के मुद्दे से भी आसानी से सुलट लेंगे.

और पाकिस्तान मुंह फुलाकर कहता था कि नहीं...पहले कश्मीर का मुद्दा सुलटेगा, फिर संबंध सामान्य होंगे, फिर व्यापार बढ़ेगा और फिर भरोसा बढ़ेगा.

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आज इसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ बीजिंग में वन बेल्ट, वन रोड सम्मेलन के मंच से कह रहे हैं कि आओ व्यापार करते हैं, व्यापार से प्यार होगा. एक-दूसरे को नीचा दिखाने की स्थिति छोड़ो और रास्ते खोलो. पाकिस्तान-चीन आर्थिक गलियारे को अपना ही बच्चा समझकर सर पर हाथ रख दो. जब धन बरसेगा तो आतंकवाद भी घटेगा.

कुछ ऐसा ही भाषण पाँच रोज़ पहले चीनी राजदूत ने भी दिया और कहा कि हमें भारत और पाकिस्तान की आपसी सियासत से कोई लेना-देना नहीं है, ये अड़चनें होते हुए भी इलाक़े में प्रगतिशील व्यापार का रास्ता खोला जा सकता है. मगर भारत का कहना है कि पहले आतंकवाद रोको, हमें अपनी संप्रभुता की कीमत पर वन बेल्ट, वन रोड और उसके साथ आने वाले कर्ज़े और चीनी कंपनियों के ठेके बिल्कुल मंज़ूर नहीं.

वैसे एक बात मैं अपने लिए समझना चाहता हूँ.

अगर भारत और चीन का तनाव इतना ज़्यादा है कि ओबीओआर के चीनी मंसूबे को भारत अपनी राजनीतिक और आर्थिक आज़ादी के लिए ख़तरा समझता है तो भारत और चीन के बीच सालाना 65 अरब डॉलर के व्यापार में भारत 48 अरब डॉलर का नुकसान भारत क्यों बर्दाश्त किए जा रहा है?

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भारत ब्रिक्स में चीन का साझेदार क्यों है? भारत क्यों चाहता है कि चीन उसे न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में आने दे और संयुक्त राष्ट्र का स्थाई सदस्य बनने के रास्ते में टांग अड़ाना छोड़ दे?

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और ऐसा क्यों है कि भारत ने बीजिंग के ओबीओआर सम्मेलन में जिन ख़तरों की वजह से भाग नहीं लिया, उसी सम्मेलन में शरीक़ भारत के दोस्त श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, ईरान, जापान और भारत के ब्रिक्स हमजोली रूस को वो ख़तरा क्यों नहीं दिखाई दे रहा है?

मैं वाकई ये समझना चाहता हूँ कि अगर भारत में इस वक़्त कांग्रेस सरकार होती तो क्या वो भी वही रुख़ अपनाती जो मोदी सरकार अपना रही है. ओबीओआर के बारे में भारत की चिंताएं क्या ओबीओआर सम्मेलन में ज़्यादा ध्यान से सुनी जाती या अब सुनी जा रही हैं.

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शायद वक्त आ गया है कि भारत और पाकिस्तान आईने के सामने खड़े होकर ख़ुद को देखने की आदत छोड़ने की सोचें और ऐन विवाह के समय किसी न किसी बात को बहाना बनाकर रूठ जाने और फिर मनाए जाने के इंतज़ार को नमस्ते कह दें. वैसे..., ऐसी कितनी शादियां हैं जो मामाजी के नहीं आने के कारण नहीं हो सकीं....किसी को याद है!

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