ये सिल्क रूट है या चीन की बढ़ती ताक़त का नज़ारा

  • 19 मई 2017
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नए सिल्क रूट पर दुनिया की चिंता

हज़ारों साल पहले धरती के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों को आपस में मिलाने का एक ऐसा रास्ता बना था जिसने शुरुआत तो कारोबार से की लेकिन आगे चल संसार में कई देशों के बनने और मिटने का जरिया बना.

दुनिया आज भी उसे सिल्क रूट के नाम से जानती है. इतिहासकार पुष्पेश पंत बताते हैं कि वो केवल एक रास्ता नहीं था बल्कि उससे कई रास्ते निकले थे.

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बीबीसी से बातचीत में पुष्पेश पंत ने कहा, "जब हम रेशम राजमार्ग की बात करते हैं जो ऐतिहासिक रूप से सिल्क रूट कहा जाता है, तो हमें एक बात याद रखनी चाहिए कि वो एक मार्ग नहीं था वो एक ऐसी नदी के समान था जिसकी कई उपधाराएं होती हैं, सहायक नदियां होती हैं, संगम होता है तो चीन को तुर्की से जोड़ने वाला जो मार्ग था उसमें कई सिल्क रूट थे."

'शांति का मार्ग'

तीन दिन पहले बीजिंग में दुनिया के 28 बड़े नेताओं और 120 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक नए सिल्क रूट का एलान किया और उसे रोड ऑफ पीस यानी शांति का मार्ग बताया.

राष्ट्रपति जिनपिंग ने कहा, "हमें बेल्ट एंड रोड को शांति का मार्ग बनाना चाहिए. हमें ऐसे अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को बढ़ावा देना चाहिए जो सबके लिए फायदेमंद सहयोग पर आधारित हो और जो बिना गठबंधन वाले सहयोगियों में टकराव के बगैर बातचीत के लिए साझेदारी बनाए.

देशों को एक दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के साथ ही विकास के रास्तों और सामाजिक तंत्र का सम्मान करना चाहिए और एक दूसरे के प्रमुख हितों और बड़ी चिंताओं का भी ध्यान रखना चाहिए."

चीन ने सड़क, पानी और पाइपलाइन के रास्तों से एशिया को एक बार फिर यूरोप के थोड़ा और करीब लाने का सपना देखा है. इस परियोजना पर 124 अरब डॉलर खर्च होंगे.

पूर्वी एशिया मामलों के जानकार राहुल मिश्रा बताते हैं कि इसके लिए पैसा जुटाने से लेकर निर्माण की योजना तक सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं.

राहुल ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पिछले सिल्क रूट में बहुत से देशों की भागीदारी थी और उसे मुख्य रूप से व्यापारी चला रहे थे उसमें सरकारों का बहुत योगदान नहीं था.

नए सिल्क रूट को चीन की सरकार सुनियोजित तरीके से बना रही है. इसके लिए न्यू डेवलपमेंट बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक, चीन की प्रांतीय सरकारें और केंद्रीय सरकार ने पैसा जुटाया है."

चीन ने दिया सिल्क रूट को ये नाम

पुराने सिल्क रूट को ये नाम चीन के कारोबारियों से मिला था. तब ख़ास तरीके से बनाए अपने रेशम को बाक़ी दुनिया तक पहुंचाने के लिए चीन ने बड़ी मेहनत की थी.

कहते हैं कि चीन की दीवार भी इन कारोबारियों की रक्षा के लिए ही बनी थी. समय के साथ इसका विस्तार कई दिशाओं में हुआ. ध्यान रखने की बात है कि इसे किसी एक देश या सरकार ने नहीं बनाया था.

पुष्पेश पंत कहते हैं, "पुराने सिल्क रूट में देशों की भौगोलिक सीमाएं बहुत निश्चित नहीं थीं, कबायली और घुमंतू इलाक़ों से होकर जो आज कजाक़िस्तान है, तुर्कमेनिस्तान है उससे होकर निकलता था, ईरान की ऊपरी सतह को छूता और अफ़गानिस्तान के पांव पखारता यह गुजरता था. बहुत सा हिस्सा तो ऐसा था जिस पर कोई आबादी ही नहीं थी."

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इस विस्तार ने दुनिया की तस्वीर बदलने में बड़ी भूमिका निभाई. रेशम राजमार्ग थोड़ी ही समय में सैन्य, सिद्धांत, संस्कृति, और संस्कार, मार्ग बन गया.

भारत की काली मिर्च जूलियस सीज़र के देश पहुंच गई और ईरान का समोसा भारत के गलीकूचों में बनने लगा.

पुष्पेश पंत बताते हैं कि तब इस रास्ते का सफर कई कई महीनों में पूरा होता था, "इसमें व्यापार के साथ विचारों का आदान प्रदान होता था, धार्मिक विचारों का आदान प्रदान होता, आज भी लद्दाख में जो रोटी मिलती है वो मध्य एशिया की रोटी जैसी है भारत जैसी नहीं, उसी तरह जो समोसा हम खाते हैं, उसका कजाकिस्तान या आसपास के इलाक़े में रूप बदल जाता है."

भारत क्यों परेशान?

2013 में चीन ने जब वन बेल्ट वन रोड या फिर नए सिल्क रूट परियोजना की नींव रखी तभी इसे लेकर दुनिया के कुछ देशों के मन में आशंकाएं उठने लगीं.

अमरीका और जापान के साथ भारत भी उन देशों में शामिल है जिसे चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना से परेशानी है.

चीन ने परियोजना की शुरुआत में अपनी ओर से भारत के कुछ बंदरगाहों को भी इसमें शामिल किया था लेकिन पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से गुजरता चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भारत की आशंकाओं को बढ़ाने और उसे इससे दूर करने के लिए काफी था.

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राहुल मिश्रा ने कहा, "चीन कहता आया है कि दो देशों के विवादित क्षेत्र में तीसरे देश को आर्थिक गतिविधी नहीं चलानी चाहीए लेकिन सीपीईसी के मामले में उसने अपने ही पैमाने को नहीं माना. चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के लिए ये जरूरी नहीं था कि वो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से ही गुजरे."

हालांकि भारत की चिंताएं और भी हैं. उसे परियोजना में शामिल हो रहे नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान जैसे देशों की भी फिक्र है जिन्हें इस परियोजना में शामिल होने पर महंगी निर्माण योजानाओं का लाभ तो मिलेगा लेकिन अभी ये तय नहीं है कि अगर अनुमानित फ़ायदा नहीं मिला तो चीन का पैसा वापस कैसे होगा.

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चीन प्रत्यक्ष रूप से बार बार यही कह रहा है कि उसका मकसद दुनिया के अलग-अलग हिस्से में कारोबार को सरल, सुगम और सब की पहुंच में आने वाला बनाना है.

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तो इसे संरक्षणवाद से लड़ने का भी रास्ता माना है.

उन्होंने कहा, "ये बहुत जरूरी है कि हमारे अंदर सहयोग की भावना हो, हम संयुक्त बातचीत के रास्ते पर चलें. संयुक्त निर्माण और साझेदारी, नीतियों में सहयोग, सुविधाओं को जोड़ना, बाधारहित कारोबार, आर्थिक एकीकरण और लोगों के बीच अनुबंध हमारी सामूहिक चिंता होनी चाहिए. निश्चित रूप से हमें सहयोग में फायदा हासिल करने के लिए खुलेपन में सहयोग करना चाहिए ना की दीवारें बनाने में और ऊंची सीमाएं रखने में. हमें ख़ास इंतजामों से बचना चाहिए और संरक्षणवाद का विरोध करना चाहिए."

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समस्या का समाधान या वर्चस्व की कोशिश

जानकार मानते हैं कि चीन ने अपने देश में निर्माण और उत्पादन का इतना बड़ा साम्राज्य ख़ड़ा कर लिया है कि उसके लिए तैयार माल को बेचना एक बड़ी समस्या है.

नए नए मार्गों की तलाश और दुनिया के हर छोटे बड़े बाज़ार तक पहुंचने की उसकी अभिलाषा इसी समस्या से निबटने का तरीका है.

राहुल मिश्रा कहते हैं, "जाहिर है कि संपर्क बढ़ेगा तो उनका व्यापार बढ़ेगा लेकिन इसके साथ चीन अपनी मुद्रा के प्रसार की भी कोशिश करेगा इससे उसका प्रभुत्व बढ़ेगा इतना ही नहीं चीन की लिबरेशन आर्मी यानी उसकी सेना भी इन रास्तों का इस्तेमाल करेगी जैसा की जिबूटी में हुआ. चीन अमरीका की तरह एशिया में अपने सैन्य ठिकाने बना कर अमरीका को चुनौती दे सकता है."

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भारत जैसे देशों की वन बेल्ट वन रेडियो परियोजना से दूरी इसकी सफलता पर प्रश्नचिन्ह तो उठाएगी ही दुनिया को अलग अलग खेमों में भी बांटेगी.

आने वाले वक्त में जब अमरीका, चीन और भारत दुनिया की सबसे बड़ी ताकत होंगे तब दुनिया को उनकी प्रतिस्पर्धा नहीं सहयोग की जरूरत होगी.

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