ब्लॉग: तो जाधव मामले में भारत का पलड़ा इसलिए भारी रहा!

  • 22 मई 2017
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अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कुलभूषण की फांसी मुक़दमे का फ़ैसला आने तक रुकवा दी.

मगर अब हम मीडिया वाले क्या करें?

हमने तो अपना सारा सामान पहली पेशी पर ही बेच दिया.

पाकिस्तानी वकील ने तर्क-वितर्क में भारतीय दलीलों के परखच्चे उड़ा दिए. भारतीय वकील ने अपने प्रोफ़ेशनल्जिम से न्यायालय के जज़ों का दिल लूट लिया.

भारतीय वकील ने अपने देश के लिए मुक़दमा लड़ने की सिर्फ़ एक रुपया फ़ीस ली और पाकिस्तानी वकील ने पांच लाख पाउंड.

अरे झूठ क्यों बोलते हो. शर्म करो पाकिस्तानी वकील ने भी सिर्फ एक पाउंड फ़ीस ली है.

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क्यों रहा भारत का पलड़ा भारी

पता है भारत का पहली पेशी में पलड़ा क्यों भारी रहा?

क्योंकि ये जो सज्जन जिंदल नवाज़ शरीफ से चुपके से मिल आया था न, उसने सलाह दी थी कि हम अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जा रहे हैं तुम कोई कमजोर सा वकील भेजना क्या समझे?

नवाज़ शरीफ ने कहा, "जी.. जी.. जी.. जी.."

अरे क्या बकवास लगा रखी है? नवाज़ शरीफ को तो मीडिया से पता चला कि कुलभूषण को फांसी की सज़ा सुना दी गई है. तो फिर नवाज़ शरीफ बिना पूछे अपनी मर्जी से वकील कैसे चुन सकता है.

ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ कि इधर किसी देश ने दर्खास्त दी और उधर झट से तारीख भी लग गई और वो भी सिर्फ एक हफ्ते बाद की. ताकि पाकिस्तान को तैयारी का मौका ही न मिल सके.

हो न हो न्यायालय का रजिस्ट्रार भारत से मिला हुआ है.

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घबराने की बात नहीं

अरे घबराने की बात नहीं. अभी तो पार्टी शुरू हुई है तुम देखते जाना इस बार पाकिस्तानी टीम एक-एक सवाल के जवाब की तैयार करके जाएगी और अगली पेशी में तमाम 16 जजों को मानना पड़ेगा,

अबे सोलह नहीं 11 जज थे

अब जितने भी थे, थे तो जज ही न. हां तो इन 11 जजों का मानना पड़ेगा कि कुलभूषण जासूस था. उसे पाकिस्तान के अंदर पकड़ा गया. हमें मौका ही कहां मिला उसके इक़बाली बयान की वीडियो दिखाने का वरना तो पहली पेशी में ही मामला निपट चुका होता.

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दिखा देते न वीडियो भी. तुम्हारे वकील को जो 90 मिनट बोलने के लिए मिले थे, उसमें वो 45 मिनट ही बोल पाया. तो बाकी वक्त में दिखा देते न इक़बाली बयान की वीडियो.

ओह हो तो अब ये भी अब तुम हमें ही बताओगे कि हमें क्या करना है और क्या नहीं. हमें क्या तुमसे अनुमति लेनी पड़ेगी?

पहली पेशी में ही अगर वीडियो दिखा दी होती तो अगली पेशी में कद्दू सस्पेंस रहेगा.

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मुसीबत

बात ये नहीं कि वो जासूस है या नहीं. बात ये है कि क्या विएना कन्वेंशन के अनुसार उसका ये हक़ बनता है कि नहीं कि उसके देश का कोई अधिकारी उससे मिलकर ये पूछ सके कि भैया कुलभूषण तू क्या कहता है? तू कब, कहां और कैसे पकड़ा गया और तू ईरान में क्या कर रहा था?

अब तुझे छुड़वाने की मुसीबत और न छूटा तो अलग मुसीबत.

अब जब फ़ैसला हो जाएगा तो ज़ाहिर है किसी के हक़ में तो किसी के खिलाफ होगा. मगर दोनों तरफ का मीडिया चीख-चीख के कह रहा होगा- हम तो पहले ही कह रहे थे कि फ़ैसला 16 आने यही आएगा.

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मगर तब तक क्या करें?

कौन-कौन सी घटना नोंच-नोंच के खाएं. एक तो भूख इतनी लगी है, ऊपर से इस रामपीटी अल्लाहमारी अदालत ने भी फ़ैसला महफूज़ कर लिया है.

क्यों महफूज़ कर लिया भई? साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि केस तुम्हारी समझ में नहीं आया. हम मीडिया से ही सीख लो कि फ़ैसला कैसे देते हैं.

अभी घटना का गांव बसा भी नहीं होता और हम पहले से ही बता देते हैं कि बसने के बाद बर्बाद कैसे होगा और कौन-कौन करेगा.

अब दे भी दो न फ़ैसला वरना जजी वजी छोड़ो और हमारी तरह पत्रकार बन जाओ.

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