काबुल धमाका: ऐसा लगा किसी ने दिल दबाकर छोड़ दिया

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अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में विदेशी दूतावासों के पास जब ज़ोरदार धमाका हुआ, तब संयुक्त राष्ट्र के लिए काम करने वाले भारतीय राकेश भट्ट घटनास्थल के नजदीक मौजूद थे.

उन्होंने अपनी आंखों देखी बीबीसी हिंदी सेवा को बताई-

सड़क नंबर 17 पर वज़ीर मुहम्मद अकबर ख़ान इलाक़े में एक मंत्रालय है. यह जर्मन दूतावास के बिल्कुल पास है. मैं वही पर करीब 8 बजकर 28 मिनट पर गया था. आठ बजकर 32 मिनट पर यह धमाका हुआ. मुझे यहां के सुरक्षाबल वापस ऑफिस ले जा रहे हैं.

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जब धमाका हुए तो ऐसा लगा कि किसी ने दिल को दबा दिया है और फिर एकदम से छोड़ दिया. बिल्कुल दहला देने वाली आवाज़ थी. पहले इमारत हिली और फिर धमाका हुआ. उसके बाद काफ़ी धुंआ निकलने लगा. इमारत से आग की लपटें तो उठ ही रही थीं. यहां जो नेशनल डिफेंस सर्विस है उसी में यह धमाका हुआ है. यह बहुत तंग इलाक़ा है.

जब धमाका हुआ तो मैं इमारत के भीतर ही था. धमाके के बाद हमें तुरंत बेसमेंट में ले जाया गया. हम सभी भागकर वहां गए. रमज़ान का महीना है. लोग भूखे हैं और डरे हुए भी हैं. मेरे आसपास के तमाम लोग क़ुरान की आयतें दोहरा रहे थे.

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मैंने तीन ऐसे लोगों को देखा जो मर चुके थे. हालांकि पता नहीं था कि वो हमलावर थे या आम लोग. मैंने बाहर देखा कि एक आदमी का दाहिना हाथ कटा हुआ था. मेरा अंदाज़ा है कि वो मर चुका था. मैंने देखा कि कुछ लोगों की आंतें फटकर बाहर लटकी हुई थीं.

हालात काफ़ी ख़राब हैं. सुरक्षा बलों ने पूरे इलाक़े को अपने घेरे में ले लिया है. यहां से भारतीय दूतावास भी ज़्यादा दूर नहीं है. जब किसी आत्मघाती हमलावर ने तय कर लिया, उसे धमाका करना है तो सुरक्षाबल क्या कर सकते हैं. आप लोहे की दीवार तो खड़ी कर नहीं सकते.

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आत्मघाती हमलावर को जान की परवाह नहीं होती है. उसकी परवाह सिर्फ़ इस बात की होती है कि वह कितनी जान ले सकता है. इस दुःसाहस में वो मर जाता है लेकिन उसे जो करना होता है कर लेता है.

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यहां सुरक्षाबलों की तैनाती बड़ी सख़्त होती है लेकिन आत्मघाती हमले अक्सर होते रहते हैं. कुछ देर बाद सुरक्षाकमी मुझे महफ़ूज निकालकर दफ्तर पहुंचाने आए. हमारी गाड़ी में संयुक्त राष्ट्र का लोगो लगा है फिर भी बार-बार रोका जा रहा है.

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चारों तरफ़ अफरातफरी का माहौल है. रमज़ान के महीने में इस तरह का हमला होना काफ़ी परेशान करने वाला है.

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मेरे साथ तीन सुरक्षाकर्मी हैं और मैं बख्तरबंद गाड़ी में हूं. मेरे लिए तो कोई जोखिम नहीं है. लोग सहमे हुए हैं.

यहां लाशों को देखना आम बात हो गई है. हम कह सकते हैं लोग लाशों को देखकर अपनी ज़िंदगी की शुरुआत करते हैं.

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