'आप गर्भवती हैं तो सांसद का काम कैसे करेंगी?'

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जब तक आप अख़बार के पन्ने ना पलटें या टीवी ना देखें, ये शहर आपको महसूस ही नहीं होने देगा कि यहाँ करीब एक हफ्ते बाद आम चुनाव होने वाले हैं- वो चुनाव जो ब्रिटेन की दशा और दिशा तय करेंगे.

लंदन की सड़कों, चौराहों, गलियों पर चुनावी अभियान का साया भी नज़र नहीं आता. भारत के चुनाव से ठीक उलट जहाँ हर गली-कूचा चुनावी पोस्टरों से पटा होता है, नेताओं की रैलियाँ और लोगों की रेलमपेल रहती है.

वैसे बाहरी तौर पर भले ही चीज़ें सामान्य दिखती हों लेकिन चुनावी मुद्दों की यहाँ भी कमी नहीं है.

ब्रेक्सिट, लोगों को मिलने वाली सोशल केयर सुविधाओं में कटौती, अप्रवासन पर ज़ोरों की बहस जारी है.

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राजनीति में महिलाएं

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ब्रितानी चुनाव और भारतीय महिलाएं

मेरी ख़ास दिलचस्पी इन दिनों ये देखने में रहती है कि यहाँ की राजनीति में महिलाओं के मुद्दों को कैसे देखा जाता है, ख़ुद महिलाओं को कैसे देखा जाता है.

मुख्य चुनावी दलों की बात करें तो चाहे सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी हो या लेबर या लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी, इनके चुनावी अभियान में औरतों से जुड़े मुद्दे उठते रहे हैं- जैसे मैटरनिटी लीव, चाइल्ड-केयर, गर्भपात से जुड़े अधिकार, महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा.

इस बार तो 'वुमेन्स इक्वेलिटी पार्टी' नाम से भी एक दल चुनाव लड़ रहा है.

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पार्टी के मुताबिक उसका मकसद महिलाओं को समान अधिकार दिलाना है जिससे समाज में सबका विकास हो सके... कुछ-कुछ सबका साथ, सबका विकास के नारे के तर्ज पर.

इस पार्टी की सातों उम्मीदवार महिलाएँ हैं.

फिर उठेगा स्कॉटलैंड की आज़ादी का मुद्दा ?

चुनावी पोस्टर में हिजाब वाला चेहरा पर फ़ोटो नहीं

ब्रिटेन चुनाव 2017

  • कुल उम्मीदवारों में से 29 फ़ीसदी महिलाएँ
  • महिलाएँ कुल जनसंख्या का 51 फ़ीसदी हैं
  • संसद में प्रतिनिधित्व 29 फ़ीसदी
  • इस चुनाव में करीब 30 फ़ीसदी उम्मीदवार महिलाएँ हैं
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भारत की बात करें तो भारत में 48 फ़ीसदी आबादी महिलाओं की है जबकि लोकसभा में महिला सांसदों का प्रतिशत महज़ 12 फ़ीसदी है.

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नहीं था वोट डालने का हक़

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ब्रिटेन के चुनावी इतिहास पर नज़र डालें तो यहाँ महिलाओं को वोट डालने का हक़ 1918 में मिला जिसके लिए उन्हें काफ़ी संघर्ष करना पड़ा था.

धीरे-धीरे महिलाओं का रोल राजनीति में बढ़ा है. 2010 के आम चुनाव को तो 'मम्सनेट' चुनाव (mumsnet) तक कहा जाता है.

ये एक वेबसाइट है जहाँ बच्चों की माएँ उनसे जुड़े मुद्दों पर खुलकर बात करती हैं.

ब्रिटेन के बड़े से बड़े नेता चुनावी अभियान के दौरान इस वेबसाइट की वेब चैट में हिस्सा लेते हैं और सवालों के जवाब देते हैं.

वहीं 1997 के चुनाव के बारे में कहा जाता है इसमें ऐसी महिला वोटरों पर ज़ोर दिया गया था जिनकी उम्र 30 के आस-पास थीं उनके बच्चे थे, जिन्हें सामाजिक मुद्दों में दिलचस्पी थी पर राजनीति में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी.

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ब्रिटेन में पूर्व चुनाव

सोशल मीडिया

माना जाता है कि यही वो वोटर वर्ग था जिसने लेबर पार्टी के पक्ष में रुख़ मोड़ दिया और टोनी ब्लेयर सत्ता में आए. ये महिलाएँ 'वॉरस्टर वुमेन' के नाम से मशहूर हुईं.

वैसे आम धारणा यही है कि भारत जैसे देशों के मुकाबले महिला वोटरों और महिला नेताओं की पूछ ब्रिटेन जैसे देशों में ज़्यादा है.

लेकिन मुझे ये भी महसूस होता है कि बहुत कुछ अलग होते हुए भी, जब बात महिलाओं की आती है तो कुछ बातें समान हैं फिर वो भारत हो या ब्रिटेन.

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भारतीय सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठी प्रियंका चोपड़ा के कपड़ों और खुली टाँगों के लिए उन्हें ट्रोल किया गया.

वहीं कुछ महीने पहले जब ब्रितानी प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे और स्कॉटलैंड की सत्ताधारी पार्टी की नेता निकोला स्टर्जन जब मिली थीं तो ब्रेक्सिट जैसे मुद्दों पर उनकी राजनीतिक विचारधारा बताने के बजाय ब्रितानी अख़बार डेली मेल ने दोनों की टाँगें दिखाती तस्वीर छापी थी और लिखा था- किसकी टाँगे बेहतर हैं.

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ब्रिटेन में आम चुनाव

ब्रिटेन के एक पार्षद के उस बयान पर भी पिछले महीने अच्छा खासा बवाल मचा था जब उन्होंने सांसद का चुनाव लड़ रही एक गर्भवती महिला राजनेता के बारे में कह दिया था, "वो गर्भवती हैं और उनका समय तो नैपी बदलने में ही बीत जाएगा, वो आम लोगों की आवाज़ क्या उठाएंगी."

वहीं मार्च 2015 में कंजर्वेटिव पार्टी की एंड्रिया जेंकिन्स माँ बनी थीं और तीन हफ्ते बाद ही ब्रिटेन में आम चुनाव घोषित हो गया. उन्होंने न सिर्फ़ चुनाव लड़ा बल्कि जीता भी.

इसी तरह ब्रिटेन में विपक्षी दल लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन के उस इंटरव्यू को ही लीजिए जिसमें उन्होंने मंगलवार को बीबीसी के मशहूर रेडियो प्रोग्राम 'वुमन्स आर' में प्रेज़ेंटर एमा बारनेट से बात की थी.

ये महिलाओं के मुद्दों से जुड़ा कार्यक्रम है.

इंटरव्यू में एमा बारनेट ने कॉर्बिन के एक चुनावी वादे पर सवाल पूछा कि हर हफ़्ते 30 घंटों के लिए 13 लाख बच्चों की मुफ़्त देखरेख की सुविधा (चाइल्ड केयर) के लिए कितना खर्च आएगा. उन्होंने अपना आईपैड भी चैक किया लेकिन जवाब नहीं ढूँढ पाए.

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भारत की राजनीति

कॉर्बिन के कई समर्थकों ने बीबीसी प्रेज़ेन्टर पर पक्षपात करने का आरोप लगाया. लेकिन बात तब बिगड़ी जब सोशल मीडिया पर महिला प्रेज़ेन्टर को अभद्र संदेश भेजे जिसमें उनके धर्म और महिला होने को लेकर अपशब्द कहे गए.

हालांकि कॉर्बिन ने बाद में कड़ा बयान देते हुए कहा कि वे किसी पत्रकार के ख़िलाफ़ इस तरह के निजी बयान बर्दाश्त नहीं करेंगे.

भारत की राजनीति में भी ये आम बात है जब राजनीतिक बहस में नेताओं को उनके महिला होने के नाते अपशब्द कहे जाते हैं.

ब्रिटेन में फ़िलहाल एक महिला प्रधानमंत्री हैं. स्कॉटलैंड की सबसे बड़ी पार्टी की नेता निकोला स्टर्जन भी एक महिला हैं.

ब्रेक्सिट और अप्रवासन जैसे जटिल मुद्दों के बीच भी यहाँ औरतों से सरोकार रखने वाले मुद्दों की जगह बनी हुई.

जैसा कि एक स्थानीय महिला रोज़ ने मुझसे कहा, "मैं वोट डालते समय सारे मुद्दों को तवज्जो दूँगी लेकिन मैं ये देखूंगी कि मेरे नेता की सूची में औरतों के मुद्दे भी शामिल हों. औरतों के अधिकारों में हम कई देशों से बेहतर हो सकते हैं लेकिन सबसे बेहतर नहीं हैं."

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