नज़रिया: 'गॉड फ़ादर से सिसीलियन माफ़िया तक'

  • 3 जून 2017
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किसी भी विवाद में दोनों पक्षों के बीच तनाव और कड़वाहट आना स्वाभाविक-सी बात है.

पनामा लीक्स का मामला जब से पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है अदालत ने उसे एक टेस्ट केस के रूप में काफी गंभीरता से लिया है.

ऐसे में सच की तलाश में जुटा सुप्रीम कोर्ट एक पक्ष बन चुका है और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ की सरकार दूसरा पक्ष बन चुकी है. जाहिर तौर पर दोनों के बीच कड़वाहट को हम प्राकृतिक प्रक्रिया ही कहेंगे.

सरकार कोर्ट और न्यायपालिका के सम्मान और उसके फैसलों को लागू करने की बातें तो ज़रूर करती है, लेकिन पनामा लीक्स के मामले में आए फ़ैसले के बाद सत्ताधारी दल की ओर से दबे शब्दों में इसकी आलोचना की जाती रही है.

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ऐसे हालात में अदालत ने भी न्यायपालिका की गरिमा के लिए एक मज़बूत स्टैंड लिया है जिस पर वो कायम है.

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय खंडपीठ ने जब 20 अप्रैल को पनामा लीक्स मामले में अपना फैसला सुनाया तो उसकी शुरुआत में चीफ़ जस्टिस आसिफ़ सईद ख़ोसा के नोट ऑफ़ ऑब्जेक्शन से की गई.

इस नोट की शुरूआत की गई थी साल 1969 में मारियो पूज़ो के लिखे उपन्यास 'द गॉड फ़ादर' के पॉपुलर वाक्य "हर महान सफलता के पीछे एक अपराध छिपा होता है" से.

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हालांकि पनामा लीक्स से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला जस्टिस एजाज़ अफ़ज़ल ने लिखा है लेकिन जस्टिस आसिफ़ सईद ख़ोसा के इस नोट की गूंज न केवल पाकिस्तानी संसद के दोनों सदनों में सुनाई दी बल्कि इसके चर्चे भी देश में आम हो गए.

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Image caption नवाज़ शरीफ़ के बेटे, हसन नवाज़

याचिकाओं की सुनवाई के दौरान जब भी विधायकों के 'सादिक़ और अमीन' (ईमानदारी और भरोसेमंद) होने के संबंध में तर्क दिए जा रहे थे तो उस दौरान जस्टिस आसिफ़ सईद ख़ोसा ने कहा था कि सही तरीके से जांच की जाए तो शायद याचिका दायर करने वाले सीनेटर सिराजुल हक़ के अलावा कोई सांसद संविधान के इस प्रावधान पर खरा न उतर सके.

लेकिन इस पर हुए विवाद के बाद अगले दिन आसिफ़ सईद ने माफ़ी मांगी और अपने शब्द वापस ले लिए थे.

पनामा लीक्स से जुड़े कोर्ट के फैसले को विपक्ष दल, ख़ासकर पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के प्रमुख इमरान ख़ान ख़ूब भुना रहे हैं. वो जनसभाओं में असिफ़ सईद के नोट ऑफ़ ऑब्जेक्शन और 'द गॉड फ़ादर' के पॉपुलर वाक्य के बारे में बातें कर रहे हैं.

इमरान ख़ान कोर्ट के इस फैसले का सहारा लेते हुए शरीफ़ को झूठा बताते रहे हैं.

पनामा लीक्स से संबंधित याचिका का फैसला लिखने वाले जस्टिस एज़ाज़ अफ़ज़ल ने इस बात का संज्ञान लिया और चेतावनी दी कि कोर्ट के फैसले की ग़लत व्याख्या न की जाए और ऐसा करना जारी रहा तो दोषियों को अदालत कठघरे में लाएगी.

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कोर्ट की इस चेतावनी के बाद इमरान ख़ान अब शब्दों के प्रयोग में सावधानी बरत रहे हैं.

हालांकि फ़ैसले में 'गॉड फ़ादर' शब्द के प्रयोग पर सरकार ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी लेकिन केंद्रीय मंत्री ख़्वाज़ा आसिफ़ ने एक नोट में सुप्रीम कोर्ट के जज की 'विवादित टिप्पणी' पर चिंता ज़रूर जाहिर की.

मामला अभी खत्म नहीं हुआ था कि सत्ताधारी दल के सीनेटर निहाल हाशमी के संस्थानों का मज़ाक बनाने का सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और इसकी सुनवाई के दौरान अदालत काफी आक्रामक मूड में दिखी.

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अज़मत सईद ने इस मुद्दे पर सरकार को आढ़े हाथों लेते हुए उसे सिसीलियन माफ़िया करार दे दिया.

इटली के सिसीलियन माफिया का ख़ौफ दुनिया भर में है. इसके बारे में बताया जाता है कि इस गिरोह के सदस्य दुनिया भर में नशीली दवाओं के कारोबार में भी शामिल हैं.

शुरुआत में यह माफिया गरीब किसानों की फ़सलों और पशुओं को सुरक्षा देता था लेकिन फिर वक्त बीतने के साथ वह उन पर ही हावी हो गया.

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सुप्रीम कोर्ट के जज से टिप्पणी के बाद फिर प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रवक्ता के हस्ताक्षर के बिना एक बयान जारी किया गया जिसमें टिप्पणी पर न केवल चिंता जताई गई बल्कि उन्हें जजों के कोड ऑफ़ कंडक्ट का उल्लंघन भी माना गया.

सीनेट में नेता विपक्ष एतजाज़ हसन का कहना है कि जजों को केवल फ़ैसले चाहिए, इस तरह की टिप्पणियां माहौल ख़राब करती हैं.

इस्लामाबाद हाईकोर्ट की बार के पूर्व अध्यक्ष तारिक महमूद जहांगीरी कहते हैं कि अगर किसी को जजों की टिप्पणियां पर आपत्ति है तो इसके लिए भी तरीके मौजूद है.

उन्होंने कहा कि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की जा सकती है और किसी भी जज की टिप्पणी को अदालती कार्यवाही से हटाने का अनुरोध किया जा सकता है.

सत्ताधारी दल इस बात पर भी चिंता व्यक्त करता रहा है कि प्रधानमंत्री के मुद्दे पर तो "संस्थाएं" जल्द हरकत में आ जाती हैं, जबकि इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ कई मामलें लंबित हैं, यहां तक कि आतंकवाद की सुनवाई कर रही अदालत ने उन्हें इश्तेहारी भी घोषित किया है लेकिन उनके ख़िलाफ़ जल्द तेज़ कार्रवाई नहीं करते.

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पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) पर पहले भी पूर्व चीफ जस्टिस सज्जाद अली शाह के दौर में सुप्रीम कोर्ट पर हमला करने का आरोप है. लेकिन इसके साथ वह अदालतों की बहाली के आंदोलन की सफलता के भी सबसे बड़े दावेदार हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक मामले लेने से बचना चाहिए क्योंकि नेता उनके कंधों का इस्तेमाल कर अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करते हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी स्थिति में न तो संस्थाएं मजबूत होंगी और न ही लोकतंत्र.

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