ब्लॉग- 'मोदी जी के लिए अगला चुनाव हलवा होगा'

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जैसे पिछले हफ़्ते सत्ता में श्री नरेंद्र मोदी के तीन साल पूरे हुए, उसी तरह आज श्रीमान नवाज़ शरीफ़ के भी चार साल पूरे हो गए. मोदी जी के तीन साल कैसे गुजरे, मुझे क्या. मैं क्या जानूं कि सबका विकास, सबके साथ हुआ या सबके साथ हाथ हुआ.

अच्छे दिन आए कि गए? एक तो मैं विदेशी और उस पर से पाकिस्तानी, इसलिए मेरा मोदी जी के तीन साल पर टिप्पणी करना वैसे भी नहीं बनता.

यदि मैं ये बता सकता हूं कि हमारे मियां साहब के चार साल कैसे गुजरे? कुछ अशुभचिंतक यह भी कहते हैं कि ये चार साल मियां नवाज़ शरीफ़ ने नहीं बल्कि मियां साहब को इन चार सालों ने गुजारा है.

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सत्तर साल में लोकतंत्र की गाड़ी कुछ तो खिसकी

कुछ यहां गुजरी, कुछ वहां गुजरी, ज़िंदगी चैन से नहीं गुजरी. शब जो गुजरी तो दिन नहीं गुजरा. दिन जो गुजरा तो शब नहीं गुजरी.

लेकिन मुझे लगता है कि मियां साहब की पहली सफलता तो यह है कि तीन मर्तबा प्रधानमंत्री बने लेकिन पिछली दो पारियों में उन्हें चौथा साल देखना नसीब ना हो सका.

पर इस बार वो चौथा साल मुकम्मल करके, खुदा उन्हें बुरी नज़र से बचाए, पांचवे साल में लग गए हैं.

हलवा चुनाव

जैसे मोदी जी के बारे में लोग कहते हैं कि अगला चुनाव उनके लिए हलवा होगा. इसी तरह यहां भी लोग कहते हैं कि मियां नवाज़ शरीफ़ पनामा करप्शन केस की अग्नि परीक्षा से निकल आए तो अगला चुनाव भी निकाल ही लेंगे और इमरान खान अंपायर से अपीलें करते रह जाएंगे.

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मियां साहब जब तीसरी बार चार साल पहले सत्ता में आए तो उन्होंन एक वादा तो यह किया था कि बिजली की लोड शेडिंग ख़त्म हो जाएगी और अगले चुनाव से पहले पाकिस्तानियों को इतनी बिजली दे देंगे कि गली-गली करंट दौड़ जाएगा.

दूसरा वादा यह था कि आतंकवाद का भुरकस निकाल दिया जाएगा. तीसरा वादा यह किया गया कि पूरे पाकिस्तान को पेशावर से कराची तक एक मोटर वे से जोड़ देंगे और चौथा यह कि मैरेट और गुड गर्वनेंस का बोलबाला होगा.

पहला वादा यानी कि बिजली की लोड शेडिंग ज़ीरो करने में सिर्फ़ आठ महीने बचे हैं. पेशावर से कराची मोटर वे लिंक आधा बन चुका मगर आधा ड्राइंग बोर्ड पर है.

और सारा तकिया इस पर है कि चीन और पाकिस्तान इकॉनॉमिक कॉरिडोर किस स्पीड से आगे बढ़ता है.

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आतंकवादी घटनाएं ख़त्म तो नहीं हुई मगर चार साल पहले के मुकाबले में बहुत कम रह गई है.

सबसे बड़े शहर कराची में शांति है, जहां चार साल पहले रोजाना दस से पंद्रह लाशे गिरती थीं.

गुड गवर्नेंस

जहां तक गुड गवर्नेंस और मैरिट कल्चर लाने का मामला है तो पंजाब में गुड गवर्नेंस पहले से बहुत बेहतर है. खैबर पख्तूनख्वाह में इमरान ख़ान ने स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और कानून लागू करने के मैदान में गुड गवर्नेंस दिखाई है.

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सिंध में बस जरदारी की गवर्नेंस है. गुड-वुड का कोई चक्कर नहीं.

और बलूचिस्तान में तो काल ही गुड गवर्नेंस का पड़ा हुआ है. पर सबसे बड़ी कामयाबी यह होगी कि जिस तरह नवाज़ शरीफ़ ने दो आर्मी चीफ़ के साथ आराम से गुजारा कर लिया, अगर इसी तरह तीसरे के साथ भी कर लें तो मज़ा ही आ जाए.

अगर नवाज़ शरीफ़ पहली बार पूरे पांच साल निकालने में कामयाब हो गए और अगली सरकार भी वोटों से ही बनी तो हम गर्व से कह पाएँगे कि सत्तर साल में लोकतंत्र की गाड़ी कुछ तो आगे खिसकी और वो भी अपने ही दम पर.

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