क़तर संकट क्यों और क्या है आगे की राह?

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क़तर संकट आगे क्या होगा?

क़तर की चर्चा उसकी संपदा, उसकी दौलत के चलते ही होती है, लेकिन खाड़ी देशों ने कूटनीतिक संबंध ख़त्म कर अब इसी क़तर को अलग-थलग कर दिया.

राजनयिक संबंध खत्म करने वाले देशों में हैं सउदी अरब, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, यमन और लीबिया. सऊदी अरब, यूएई, मिस्र और बहरीन से क़तर के लिए हवाई, ज़मीनी और समुद्री रास्ते बंद कर दिए गए.

इन देशों ने एक सुर में कतर पर आरोप लगाया कि वो क्षेत्र में कथित इस्लामिक स्टेट और चरमपंथ को बढ़ावा दे रहा है.

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हालांकि क़तर चरमपंथ को बढ़ावा देने के आरोपों का खंडन करता है.

आरोपों में कितना है दम?

चरमपंथ को बढ़ावा देने वाले इन आरोपों में कितना दम है इस सवाल के जवाब में अल जज़ीरा के पूर्व पत्रकार और वर्तमान में हिंदुस्तान टाइम्स के नेशनल अफेयर एडियर रुबिन बनर्जी का मानना हैं, " आरोप लगाना तो बेहद आसान है लेकिन क्या सउदी अरब से तमाम तरह की फंडिंग नहीं होती. क़तर के पास काफ़ी पैसा है, लेकिन वो पैसा अल क़ायदा को या फिर तालिबान को जा रहा है कहा नहीं जा सकता. प्रतिबंध लगाने के पीछे राजनीति है."

संबंध तोड़ने की तात्कालिक वजह

सऊदी अरब और अन्य देशों ने जिस तरह से कतर से राजनयिक संबध तोड़े हैं इसकी तात्कालिक वजह क्या रही, चरमपंथ का मुद्दा या फिर कुछ और.

पाकिस्तान में लाहौर इस्लामी दुनिया की राजनीति को समझने वाले पत्रकार राशिद हुसैन कहते हैं," तात्कालिक वजह तो क़तर के शेख का वो विवादित मैसेज है, जिसमें वो कहते हैं कि क्षेत्र में स्थिरता के लिए ईरान बेहद ज़रुरी है. हालांकि क़तर ने बाद में इस पर सफाई देते हुए कहा कि ये उनकी आधिकारिक टिप्पणी नहीं है. इसके बाद प्रतिबंध लगाना इन 6 मुस्लिम देशों का जवाब है."

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लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब क़तर से इस्लामी दुनिया के देशों ने संपर्क तोड़े हों.

2014 के मार्च महीने में भी सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने क़तर पर उनके आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाते हुए अपने राजदूत वापस बुला लिए थे.

जवाहर लाल विश्वविद्यालय में पश्चिम एशिया मामलों के प्रोफेसर आफताब कमाल पाशा कहते हैं, " पहले अरब और फ़ारस का विवाद था, बाद में शिया सुन्नी विवाद बना और अब ये क़तर सउदी अरब की शक्ल में है. क़तर पहले से ही ईरान का समर्थन रहा है, ईरान से सउदी अरब की असुरक्षा की भावना अब सामने आ रही है."

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मुस्लिम देशों के गठबंधन में दरार

अरब देशों ने यह फ़ैसला ऐसे समय पर लिया है जब खाड़ी देशों और उनके पड़ोसी ईरान के बीच तनाव बढ़ा है. हालिया अरब यात्रा पर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान पर चरमपंथ को बढ़ावा दने के आरोप लगाए थे.

इस घटना को अमरीका के दोस्त कहे जाने वाले ताक़तवर खाड़ी देशों के बीच एक बड़ी दरार की तरह देखा जा रहा है.

राशिद हुसैन कहते हैं, " क़तर पहले भी इस तरह के प्रतिबंधों का सामना कर चुका है. ना तो क़तर इन देशों पर निर्भर है और ना ही ये देश क़तर पर निर्भर हैं. लेकिन महत्वपूर्ण बात ये है कि ईरान के ख़िलाफ़ जिन 54 देशों को एकजुट करने की कोशिश हो रही थी, उसमें ये पहली दरार है."

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क्या संकट सुलझेगा?

इस्लामी देशों के राजनयिक संपर्क तोड़ने और तमाम प्रतिबंधों के बाद क्या वाकई कतर दुनिया में अलग थलग पड़ जाएगा. कतर के पास क्या विकल्प हैं इस संकट का भविष्य क्या है.

इस सवाल के जवाब में रुबिन बनर्जी कहते हैं कि ये संकट जल्द सुलझ जाना चाहिए क्योंकि अगर ऐसा ना हुआ और ईरान के साथ क़तर ने रणनीतिक साझेदारी कर ली तो खाड़ी देशों के लिए दिक्कतें बढ़ जाएंगी. साथ ही अगर क़तर ने चीन के साथ साझेदारी कर ली तो फिर अमरीका सउदी के साथ मिल कर भी क्या करेगा.

हालांकि, क़तर और सऊदी अरब के बीच इस संकट को हल करने का प्रयास लगातार जारी है. कुवैत के अमीर इन देशों के बीच मध्यस्थता का नेतृत्व कर रहे हैं.

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