क़तरः क्या ट्रंप को अपनी पीठ थपथपानी चाहिए

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Image caption अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप क़तर के शेख अमीर तमीम बिन अल थानी से हाथ मिलाते हुए.

ट्विटर कूटनीति की दुनिया में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने बहुत सावधानी से बनाई गई अमरीका की मध्यपूर्व नीति को चोट पहुंचाई है.

ट्रंप ने सिर्फ़ लंबे समय से विभाजित अरब देशों में एक पक्ष लिया बल्कि उन्होंने इसका श्रेय भी ले लिया.

ट्रंप ने एक ट्वीट कर कहा कि चरमपंथियों की फ़ंडिंग पर सऊदी अरब का प्रहार उनकी सऊदी की हालिया यात्रा का नतीजा है. उनके इस ट्वीट के निशाने पर क़तर था.

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ट्रंप ने अरब देशों के एक अन्य अमरीकी सहयोगी देश से संबंध तोड़ने के अभूतपूर्व निर्णय को प्रभावित किया.

अरब देशों ने क़तर पर चरमपंथियों को आर्थिक सहयोग देने का आरोप लगाया है.

पुराना तनाव

ये सच है कि क़तर से राजनयिक संबंध तोड़ने का अरब देशों का फ़ैसला एक बड़ा क़दम है. लेकिन इस क्षेत्र में तनाव लंबे समय से है.

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सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मिस्र - क़तर के मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे इस्लामी आंदोलन के समर्थन से गुस्से में हैं. वो इसे राजनीतिक ख़तरे के रूप में देखते हैं.

ये देश क़तर के प्रभावशाली अल-ज़ज़ीरा नेटवर्क से भी नाराज़ हैं और मानते हैं कि क़तर उनके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी ईरान के एजेंडे का समर्थन करता है.

हाल ही में क़तर ने अपने शाही परिवार के कुछ सदस्यों को दक्षिणी इराक़ में ईरान समर्थित शिया लड़ाकों के चंगुल से छु़ड़ाने के लिए बहुत बड़ी फ़िरौती की रकम दी.

इससे अरब देशों का क़तर के ईरान की मदद करने का शक़ और ज़्यादा बढ़ गया.

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माना जा रहा है कि इसमें से भारी रकम तेहरान पहुंच गई. खाड़ी देशों पर नज़र रखने वाले एक विशेषज्ञ ने फ़ाइनेंशियल टाइम्स से कहा है कि 'संबंध पूरी तरह इसी घटना से टूटे.'

बावजूद इसके, अपनी हालिया सऊदी अरब यात्रा के दौरान ट्रंप ने सऊदी अरब की ईरान को चरमपंथ की धुरी बताने की बात दोहराई. बहुत मुमकिन है कि सऊदी अरब को क़तर से संबंध विच्छेद का हौसला यहीं से मिला हो.

रही बात चरमपंथियों को आर्थिक मदद देने की हो तो कोई भी दूध का धुला नहीं है. क़तर, सऊदी, कुवैत सभी ने सीरिया युद्ध के दौरान चरमपंथियों को मदद पहुंचाई है.

हालांकि अमरीकी दबाव के बाद सभी ने अपने हाथ पीछे भी खींचे हैं, लेकिन बाक़ी देशों के मुकाबले क़तर का व्यवहार ज़्यादा गड़बड़ दिखाई देता है क्योंकि क़तर ख़ुद को एक तटस्थ खिलाड़ी दिखाते हुए दोनों ओर खेलना चाहता है.

इसमें कोई शक़ नहीं है कि क़तर के व्यवहार को लेकर अमरीका की अपनी चिंताएं रही हैं.

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क़तर और अमरीका

दरअसल ये एक बहुत ही अलग रिश्ता है. सिर्फ़ इसलिए ही नहीं कि क़तर में अमरीका का मध्य पूर्व का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है जहां से वो इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ अपने युद्ध को संचालित कर रहा है. क़तर ने इस लड़ाई में अरबों डॉलर का योगदान भी दिया है.

यही वजह है कि अमरीका का विदेश मंत्रालय और पेंटागन पसोपेश में फंस गए हैं. ये संस्थान अपने पत्ते बंद रखकर खेलते रहे हैं न की ट्रंप की तरह 140 अक्षरों में सबकुछ स्पष्ट करते हैं.

प्रवक्ताओं ने ट्रंप की बात की पुष्टि या खंडन नहीं किया बल्कि बात को घुमा दिया.

विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हैथर नॉवर्ट ने क़तर के चरमपंथी समूहों का फ़ंड रोकने के प्रयासों की तारीफ़ करते हुए कहा कि अभी और भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

पेंटागन ने अमरीकी सैन्य बलों के लिए अड्डा देने की फिर से तारीफ़ करते हुए क़तर की क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्धता की फिर से तारीफ़ की.

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पेंटागन ने कहा कि विवाद का असर सैन्य अभियानों पर नहीं पड़ा है. हालांकि ये भी कहा कि यदि ये लंबे समय तक चलता रहा तो इसका असर हो सकता है.

व्हाइट हाउस ने भी समझौते का ही आह्वान किया है.

प्रवक्ता शॉन स्पाइसर ने कहा कि अमरीका चाहता है कि तनाव कम हो तो मुद्दा तुरंत सुलझ जाए. हालांकि उन्होंने राष्ट्रपति के सोशल मीडिया इस्तेमाल की तारीफ़ करते हुए कहा कि वो सीधे अमरीकी लोगों से संवाद करते हैं.

हालांकि विदेश मंत्रालय ने इस विषय को टालना ही बेहतर समझा. ट्रंप के सोशल मीडिया के बारे में पत्रकारों के सवाल को टालते हुए नॉवर्ट ने कहा, "चलिए सोशल मीडिया के मुद्दे से आगे बढ़ते हैं."

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