ब्रितानी चुनाव: भारतीयों के लिए इसके मायने

ब्रिटेन के संसदीय चुनाव में सत्ताधारी कंज़रवेटिव पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें (318) मिली हैं, लेकिन प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे के नेतृत्व में पार्टी स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर सकी है.

प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने कहा है कि वो अल्पमत की सरकार बनाएंगी और इसके लिए वो उत्तरी आयरलैंड की पार्टी डीयूपी (10 सीटें) का समर्थन लेंगी. इस तरह 650 सदस्यीय निचले सदन में उन्हें 328 सांसदों का समर्थन हासिल हो जाएगा जो बहुमत के आंकड़े (326) से ज़्यादा है.

ब्रिटेन में चुनाव के नतीजों ने जहां कई लोगों को चौंका दिया है वहीं दक्षिण एशियाई मूल के लोगों के लिए ये चुनाव ख़ास साबित हुए हैं.

2015 में जहां भारतीय मूल के 10 लोग संसद के लिए चुने गए थे, इस बार ये संख्या 12 हो गई है.

सिख सांसद

इस बार तनमनजीत सिंह धेशी और प्रीत कौर गिल जैसे सिख भी चुने गए हैं.

तनमनजीत ब्रिटेन में सांसद चुने गए पहले पगड़ीधारी सिख हैं जबकि प्रीत कौर पहली सिख सांसद हैं.

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लंदन में बसे पत्रकार और लेखक सलिल त्रिपाठी ने इस विषय पर बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक लाइव में कहा, "भारतीय मूल के लोगों का चुना जाना बेहद महत्वपूर्ण है. जो लोग ब्रेक्जि़ट की मांग करते थे उनकी बातों में ज़हर घुला था. वो लोग कहते थे कि इंग्लैंड सिर्फ़ हमारे लिए है. वो लोग 1950 से पहले के (गोरों के प्रभुत्व वाले) ब्रिटेन की बात करते थे."

सलिल त्रिपाठी के अनुसार ऐसी बात कंज़रवेटिव पार्टी के नेता तो नहीं, लेकिन बीएनपी (ब्रिटिश नेशनल पार्टी) और यूकिप (यूके इंडिपेंडेंस पार्टी) के लोग बोल रहे थे.

सरकार की कोशिश रही है कि ब्रिटेन को ऐसे देश की तरह पेश किया जाए जहां दुनिया भर की विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के लिए जगह है.

लेकिन पिछले कुछ सालों से आप्रवासन ब्रिटेन में ज्वलंत मुद्दा रहा है.

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भारतीयों की चिंता

दुनिया भर से आप्रवासी ब्रिटेन पहुंचते हैं. भारत और आसपास के देशों से भी लोग बड़ी संख्या में यहां आते हैं. याद रहे कि ब्रिटेन में रहने वाले कई भारतीय और पाकिस्तानी लोग दूसरी, तीसरी पीढ़ी के हैं. यहां की युवा पीढ़ी यहीं पैदा हुई है. उनके माता-पिता भारत और पाकिस्तान से आए थे.

यहां आने वाले लोगों के लिए ब्रिटेन आने में आसानी, यहां पढ़ने में आसानी, ब्रिटेन में काम करने में आसानी और वीज़ा मिलने में सुविधा जैसे मुद्दे बेहद महत्वपूर्ण हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों में ब्रिटेन आना कठिन होता जा रहा है.

कई स्थानीय लोग बाहर से आने वाले लोगों को बढ़ते अपराध या नौकरियों में कमी के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में दक्षिण एशिया सेंटर की डायरेक्टर मकुलिका बैनर्जी कहती हैं, "हम सालों से सरकार से मांग कर रहे हैं कि ब्रितानी विश्वविद्यालयों के लिए ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय छात्र यहां आ सकें. और वो तभी आएंगे जब आप उनको पोस्ट स्टडी वीज़ा देंगे. लेकिन सरकार अपने स्टैंड पर कायम है. वो इस पर बातचीत करने के लिए भी राज़ी नहीं है. अगर कंज़रवेटिव सत्ता में रहते हैं तो ये परेशानियां बनी रहेंगी."

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याद रहे नवंबर 2016 में जब टेरीज़ा मे भारत की यात्रा पर गई थीं तब भी उन्होंने आप्रवासन और भारतीयों को वीज़ा देने को लेकर कड़ा रुख अपनाया था.

आप्रवासन को लेकर जेरेमी क़ॉर्बिन की लेबर पार्टी का रवैया इतना सख्त नहीं रहा है.

गठबंधन सरकार

इस बीच गठबंधन सरकार की स्थिरता को लेकर यहां लोगों में शंकाएं कम नहीं हैं, लेकिन मुकुलिका बैनर्जी कहती हैं कि मिली-जुली सरकार बनाने में ब्रिटेन को भारत से सीख लेनी चाहिए.

वो कहती हैं, "जब 2010 में मिली-जुली सरकार बनी तब यहां लोग सोचते थे कि ये सरकार कितनी स्थिर होगी. मैंने उस वक्त भी कहा था कि मिली-जुली सरकार बुरी बात नहीं है. वो सरकार चली और पांच साल चली. तो अब लोगों का तज़ुर्बा बदल रहा है."

सलिल त्रिपाठी कहते हैं, "अगर पार्टियों ने जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई तो उसका ऐसा ही हाल होगा जैसा कि भारत में 1997 से 1999 तक हुआ जब देवगौड़ा, गुजराल ने गठबंधन बनाने की कोशिश की थी."

वो कहते हैं, "हिंदुस्तान में 30 साल अल्पमत की सरकार चली. अब ब्रिटेन को हिंदुस्तान से सीखना चाहिए."

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