क़तर का गहराता संकट आख़िर कहां ले जाएगा?

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कभी-कभी विवाद की रेसिपी कहती है कि 'चूल्हे पर रखकर पकने के लिए छोड़ दें'. क़तर को लेकर हुआ ताज़ा विवाद बहुत दिनों से पक रहा था.

फिर अचानक कुछ रसोइयों ने तापमान तेज़ी से बढ़ा दिया और विवाद उबलकर बाहर आ गया या यूं कहें कि एक बड़ा संकट बन गया.

खाड़ी देश क़तर और उसके तीन पड़ोसी देशों के बीच तनाव बीते दो दशकों से नज़र आ रहा था. मध्य पूर्व के इस खाड़ी क्षेत्र की ख़ास बात ये है कि यहां शाहों या 'अमीरों' का शासन है जिनकी अपनी अंदरूनी राजनीति पर गहरी पकड़ है और जो किसी भी विरोध को सख़्ती से दबा देते हैं.

लेकिन क़तर के अमीर ऐसी उदार नीतियों पर चल रहे हैं जो अन्य शाहों, ख़ासकर सुन्नी इस्लाम के सबसे शक्तिशाली देश सऊदी अरब के शाहों की कट्टर नीति के विपरीत है.

क़तर की अपरंपरागत विदेश नीति को सुन्नी एकता के लिए ख़तरा माना जाता है क्योंकि अमीर और उनके मंत्री क्षेत्र की दूसरी बड़ी शक्ति और शिया देश ईरान के साथ बेहतर रिश्तों के लिए बातचीत को बढ़ावा देते हैं.

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अमरीका का पेंच

सऊदी अरब क़तर के इस रवैये के सख़्त ख़िलाफ़ है. लेकिन अब नए अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के सऊदी शाह सलमान के साथ दिखने के बाद सऊदी अरब ने अपनी इस सख़्ती को क़तर से राजनयिक संबंध तोड़ने की कार्रवाई में बदल दिया है.

क़तर पर लगाए गए प्रतिबंधों का एकमात्र स्पष्टीकरण ये दिया गया है कि क़तर धार्मिक कट्टरपंथियों को पैसा देता है जिसमें जेहादी समूहों को गुप्त दान दिया जाना भी शामिल है.

क़तर की सरकार ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है. ऐसे ही आरोप पहले उन देशों पर भी लग चुके हैं जो अब क़तर के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रहे हैं.

लेकिन इन प्रतिबंधों का एकमात्र सबसे मज़बूत उद्देश्य क़तर के शक्तिशाली मीडिया नेटवर्क अल जज़ीरा को कमज़ोर करना या बंद होने के कगार पर पहुंचाना भी हो सकता है.

अल जज़ीरा क़तर के अमीर का सबसे पसंदीदा प्रोजेक्ट है.

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क़तर संकट आगे क्या होगा?

वो अल जज़ीरा को समूचे अरब देशों में सकारात्मक बदलाव के एजेंट के रूप में देखते हैं. उन्हें लगता है कि ये राजनीतिक बहसों को जन्म देगा और अरब दुनिया के आम लोगों के मु्द्दों को उठाएगा.

क़तर के अमीर ख़ुद निरंकुश राजशाही चलाते हैं जहां चुनावों के लिए कोई जगह नहीं है. ऐसे में उनका दूसरे देशों के नागरिकों के मुद्दों को उठाना दोगलापन लग सकता है. लेकिन क़तर के अमीर ने मध्य पूर्व के आधुनिकीकरण का यही रास्ता चुना है.

लेकिन मिस्र और अन्य खाड़ी देशों के शासक चीज़ों को दूसरे नज़रिए से देखते हैं. मिस्र के राष्ट्रपति फ़तह अल सीसी ने मुस्लिम ब्रदरहुड की चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाकर संगठन पर कट्टर इस्लामी होने का तमगा लगाकर उसे ख़त्म होने की कगार पर पहुंचा दिया है.

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Image caption क़तर के अमीर शेख तमीम बिन हम्माद अल थानी ने मई में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से मुलाकात की थी.

मिस्र में अल जज़ीरा पर आरोप लगाया गया कि वह मुस्लिम ब्रदरहुड के लिए प्रोपेगैंडा कर रहा है. अल जज़ीरा ने जिन अन्य नेताओं को चुनौती दी है वो भी इन आरोपों पर मुहर लगाते हैं.

क़तर पर आरोप

क़तर संकट के ख़त्म होने के कोई संकेत अभी नहीं नज़र आ रहे हैं बल्कि हालात इसके उलट ही नज़र आ रहे हैं. मतभेद और विवाद और बढ़ गए लगते हैं.

इसलिए भी क्योंकि दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर बेहद कड़वे आरोप लगा रहे हैं. संयुक्त अरब अमीरात इस बात पर अधिक ज़ोर दे रहा है कि क़तर कट्टरपंथ का समर्थक है.

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क़तर में काम करने वाले भारतीयों का क्या होगा?

क़तर का तर्क

क़तर, अपने मानवाधिकार परिषद के ज़रिए ये तर्क दे रहा है कि सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात उन सब लोगों के मानवाधिकारों का हनन कर रहे हैं जो उड़ानों पर प्रतिबंधों के कारण मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.

क़तर का कहना है कि खाड़ी सहयोग परिषद के देशों के बीच सीमाएं कभी भी इस तरह से बंद नहीं रही हैं.

इसी बीच बाहरी देश भी किसी न किसी पक्ष के साथ आ रहे हैं. इससे संकट और गहराता जा रहा है.

अरब लीग के कई अन्य देश क़तर विरोधी देशों के समर्थन में आ गए हैं. दूसरी ओर तुर्की और रूस दोनों ही क़तर के दोस्त के रूप में सामने आए हैं.

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Image caption तुर्की की संसद ने क़तर में तुर्क सैनिकों की तैनाती को मंजूरी दे दी है.

बाहरी देशों की चिंता

तुर्की की संसद ने क़ानून पास करके क़तर में तुर्क फ़ौजों की तैनाती को मंज़ूरी दे दी है. हालांकि क़तर और तुर्की के बीच इसे लेकर पहले ही समझौता था, लेकिन जिस तेज़ी से नए घटनाक्रम में तुर्की ने फ़ैसला लिया है उससे तुर्की साफ़तौर पर क़तर के साथ खड़ा नज़र आता है.

रूस ने क़तर के विदेश मंत्री को मॉस्को आकर वार्ता का न्यौता दिया है. क़तर को उम्मीद है कि वो रूस के समर्थन को बढ़ा सकेगा.

इसी बीच सुलह वार्ता की कोशिश कर रहे कुवैत के अमीर के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है. माहौल को हल्का करने की कोशिशों में वो खाड़ी देशों की राजधानियों के चक्कर लगा रहे हैं.

हालांकि अभी इस दिशा में किसी प्रगति के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि ये संकट गरम तापमान पर लंबे समय तक रह सकता है.

इससे बाहरी दुनिया की चिंता बढ़ना लाजिमी है क्योंकि ये मध्य पूर्व को और अधिक अस्थिर कर सकता है.

इस बार ये अस्थिरता आमतौर पर भरोसेमंद क्षेत्र में है.

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