क़तर संकट पर खाड़ी देशों में क्यों है ख़ामोशी

  • 10 जून 2017
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Image caption क़तर को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति और विदेश मंत्री ने अलग-अलग बयान दिए हैं.

क़तर पर राजनयिक प्रतिबंध लगाने वाले देशों ने अपने समर्थन में आए अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के बयान का स्वागत किया था.

लेकिन अब जब अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने क़तर पर प्रतिबंध हटाने की मांग की तो किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

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क़तर में काम करने वाले भारतीयों का क्या होगा?

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और बहरीन ने क़तर पर चरमपंथ का समर्थन करने के आरोप लगाते हुए राजनयिक संबंध तोड़ लिए हैं. क़तर इन आरोपों का खंडन करता रहा है.

संयुक्त अरब अमीरात ने ट्रंप के नेतृत्व की तारीफ़ भी की थी.

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टिलरसन का बयान

लेकिन अब विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन की मानवीय परिणामों को लेकर दी गई चेतावनी को अरब देशों ने नज़रअंदाज़ कर दिया है.

शुक्रवार को ट्रंप ने क़तर से कहा था, "लोगों को दूसरे लोगों की जान लेना सिखाना बंद करो."

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क़तर संकट आगे क्या होगा?

उन्होंने कहा था, "मैंने रेक्स टिलरसन के साथ तय किया है कि क़तर से कहा जाए कि अब कट्टरपंथी विचारधारा को मदद देना बंद करने का वक़्त आ गया है."

ट्रंप ने कहा, "मैं चाहता हूं कि क़तर फिर से देशों की एकजुटता का हिस्सा हो."

मानवीय परिणाम

हालांकि उनका सुर रेक्स टिलरसन के सुर से अलग है जिन्होंने कहा है कि क़तर पर राजनयिक प्रतिबंधों के मानवीय परिणाम हो रहे हैं.

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Image caption क़तर संकट का सबसे ज़्यादा असर क़तर आने-जाने वाली उड़ानों पर हुआ है.

टिलरसन ने ये भी कहा है कि चल रहे राजनयिक विवाद से क्षेत्रीय सहयोग और चरमपंथ के ख़िलाफ़ अभियान भी प्रभावित हो रहे हैं.

उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों से क्षेत्र में अमरीका की और अन्य अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक गतिविधियों पर असर हो रहा है और कुवैत की अमरीका समर्थित मध्यस्थता की कोशिशें भी प्रभावित हो रही हैं.

शनिवार को सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने टिलरसन के आह्वान का कोई ज़िक्र नहीं किया.

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