चीन और ताइवान के बीच तनातनी की वजह क्या?

  • 13 जून 2017
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Image caption वैश्विक व्यापार के लिए पनामा नहर बहुत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है

पनामा ने ताइवान के साथ लंबे समय से चले आ रहे अपने राजनयिक संबंधों को तोड़ लिया है और चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किया है.

पनामा ने कहा है कि वो 'ओनली वन चाइना' को 'मान्यता' देता है और 'ताइवान को चीन का हिस्सा' मानता है.

ताइवान ने इसपर 'गुस्सा और अफ़सोस' ज़ाहिर किया है और पनामा पर 'धमकाने' का आरोप लगाया है.

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चीन ने ताइवान को हमेशा से ऐसे प्रांत के रूप में देखा है जो उससे अलग हो गया है. चीन मानता रहा है कि भविष्य में ताइवान चीन का हिस्सा बन जाएगा.

जबकि ताइवान की एक बड़ी आबादी अपने आपको एक अलग देश के रूप में देखना चाहती है और यही वजह रही है दोनों के बीच तनाव की.

तनाव की शुरुआत

वर्ष 1642 से 1661 तक ताइवान नीदरलैंड्स का उपनिवेश था. उसके बाद चीन का चिंग राजवंश वर्ष 1683 से 1895 तक ताइवान पर शासन करता रहा.

लेकिन साल 1895 में जापान के हाथों चीन की हार के बाद ताइवान, जापान के हिस्से में आ गया.

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दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद अमरीका और ब्रिटेन ने तय किया कि ताइवान को उसके सहयोगी और चीन के बड़े राजनेता और मिलिट्री कमांडर च्यांग काई शेक को सौंप देना चाहिए.

च्यांग की पार्टी का उस वक़्त चीन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण था.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद

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लेकिन कुछ सालों बाद च्यांग काई शेक की सेनाओं को कम्युनिस्ट सेना से हार का सामना करना पड़ा.

तब च्यांग और उनके सहयोगी चीन से भागकर ताइवान चले आए और कई वर्षों तक 15 लाख की आबादी वाले ताइवान पर उनका प्रभुत्व रहा.

कई साल तक चीन और ताइवान के बीच बेहद कड़वे संबंध होने के बाद साल 1980 के दशक में दोनों के रिश्ते बेहतर होने शुरू हुए.

तब चीन ने 'वन कंट्री टू सिस्टम' के तहत ताइवान के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर वो अपने आपको चीन का हिस्सा मान लेता है तो उसे स्वायत्तता प्रदान कर दी जाएगी.

ताइवान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

चीन की नाराज़गी

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Image caption चेन श्वाय बियान ने खुलेआम ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन किया

साल 2000 में चेन श्वाय बियान ताइवान के राष्ट्रपति चुने गए जिन्होंने खुलेआम ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन किया. ये बात चीन को नागवार गुज़री.

तब से ताइवान और चीन के संबंध तनावपूर्ण ही रहे. बीच-बीच में ज़रूर ताइवान ने चीन के साथ व्यापारिक संबंध बेहतर बनाने की कोशिशें कीं.

जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप चुने गए तो उन्होंने ताइवान की तत्कालीन राष्ट्रपति साइ इंग वेन से फ़ोन पर बात की. इसे इसे अमरीका की ताइवान को लेकर चली आ रही नीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा गया.

साल 1979 में अमरीका ने माना था कि वो ताइवान को चीन के हिस्से के रूप में देखेगा.

अमरीका की भूमिका

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Image caption अमरीका राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और ताइवान की राष्ट्रपति साइ इंग वेन

अमरीका ताइवान का सबसे अहम और एकमात्र दोस्त माना जाता रहा है.

दूसरे विश्व युद्ध से साल 1979 तक दोनों देशों के संबंध बेहद घनिष्ठ रहे. फिर वर्ष 1979 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने चीन से रिश्ते प्रगाढ़ करने की पहल करते हुए ताइवान के साथ अपने राजनयिक संबंध तोड़ लिए.

हालांकि तब अमरीकी कांग्रेस ने इसके जवाब में 'ताइवान रिलेशन एक्ट' पास किया जिसके तहत तय किया गया कि अमरीका, ताइवान को सैन्य हथियार सप्लाई करेगा और अगर चीन ताइवान पर किसी भी तरह का हमला करता है तो अमरीका उसे बेहद गंभीरता से लेगा.

उसके बाद से अमरीका का ज़ोर चीन और ताइवान दोनों ही के साथ अपने रिश्तों का संतुलन बनाए रखने की नीति पर रहा.

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Image caption साइ इंग वेन, शी जिनपिंग

ताइवान को लेकर अमरीका और चीन के बीच सबसे ज़्यादा तनाव तब देखा गया जब साल 1996 में ताइवान के राष्ट्रपति चुनाव को अपने तरीके से प्रभावित करने के लिए चीन ने मिसाइल परीक्षण किए.

इसके जवाब में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने बड़े पैमाने पर अमरीकी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया जिसे वियतनाम युद्ध के बाद एशिया में सबसे बड़ा अमरीकी सैन्य प्रदर्शन कहा गया.

अमरीका ने ताइवान की ओर बड़े युद्धक अमरीकी जहाज भेजे और चीन को संदेश देने की कोशिश की कि ताइवान की सुरक्षा से अमरीका कोई समझौता नहीं करेगा.

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