पाक विदेश नीति का पता- अमरीका या सऊदी अरब?

पाकिस्तान, प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ इमेज कॉपीरइट AFP

देशों की विदेश नीतियों आखिरकार बनती कहां हैं? क्या ये बंद कमरे में लंबी बैठकों में बनती हैं, प्रधानमंत्री के विशेष विमान में या विदेश दौरों के समय हवाई जहाज में बनती हैं या फिर संसद में बनती हैं?

इसके बारे में ज्यादा जानकारी या भनक न तो विदेश मंत्रालय की वेबसाइट से, सरकारी मीडिया या उसके विज्ञापन के अनगिनत विभागों से और न ही मंत्रालयों से मिलती है और न फौजी प्रवक्ताओं के ट्विटर एकाउंट्स से.

सरकार के विरोधी खासकर चरमपंथी गुट तो इस बारे में बात सात समंदर पार अमरीका तक ले जाते हैं कि शायद विदेश नीति के कारखाने वहाँ कहीं लगे हैं.

तो आखिर पाकिस्तान की विदेश नीति के ये कारखाने इतनी खुफिया जगहों पर क्यों हैं जहाँ किसी आम आदमी की आवाज या ख्वाहिश का पहुंचना तो दूर बल्कि मीडिया की जासूस नज़रों से भी ओझल रहता है.

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संसद के दोनों सदन सरकार से विदेश नीति के बारे में पूछ-पूछ कर थक गए हैं, लेकिन उन्हें तसल्ली देने के लिए मंत्रियों के पास शायद ही कोई जवाब होता है.

इन सदनों के सांसद फिर अपना एजेंडा ज़मीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए चुपचाप बदल लेते हैं.

ख्याल आता है कि शायद पाकिस्तान के पड़ोसी मुल्क जैसे खाड़ी के देश सऊदी अरब और क़तर तक की नीति तो शायद इस्लामाबाद में ही बनती होगी और आसानी से यहां हर किसी की पहुंच होती होगी, लेकिन ऐसा भी कुछ नहीं है.

प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपनी फौज के जनरल कमर जावेद बाजवा और अन्य मंत्रियों की टीम के साथ भागे-भागे 'खाड़ी देशों में पैदा हुए हालात' का जायजा लेने सऊदी अरब रवाना तो हो गए, लेकिन वहाँ पाकिस्तान क्या प्रस्ताव लेकर गया, उस पर बात क्या हुई, फैसला क्या हुआ और भविष्य का रणनीति क्या तय हुई, इस बाबत न सऊदी सरकार और न ही पाकिस्तान की ओर से कोई बयान आया है.

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पाक विदेश मंत्रालय

लोग हैरान हैं कि इस यात्रा से नतीजा क्या निकाला जाए? क्या ये केवल सऊदी बादशाह की तरफ से इफ्तारी की दावत थी या इससे बढ़कर कुछ और?

मेरे जैसे पत्रकार सऊदी प्रेस एजेंसी और पाकिस्तान की सरकारी मीडिया टटोलते रहे कि कुछ तो पता चले कि क्या बात हुई, लेकिन इस बारे में पूरी तरह से खामोशी छाई हुई है.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता भी हर गुरुवार को दिखाई तो देते हैं, लेकिन बताते कुछ नहीं.

इससे पहले यही प्रधानमंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल राहील शरीफ ने सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव खत्म करवाने के लिए दोनों देशों के तूफानी दौरे किए थे, लेकिन उनमें से निकला, क्या आज तक किसी को पता नहीं चल सका है.

दोनों मुस्लिम देशों के बीच तनाव तो अभी भी है, लेकिन एक-दूसरे पर ताबड़तोड़ हमलों में जाहिरा तौर पर कमी आई है तो इसका श्रेय किसके सिर है?

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जनरल राहील शरीफ

इसमें पाकिस्तान का कोई रोल होता तो शायद मुल्क का नेतृत्व इसे स्वीकार करते नहीं थकता, लेकिन ये भी जेद्दा यात्रा की तरह बस एक दौरा था.

सऊदी नेतृत्व में बनने वाले सैन्य गठबंधन में पाकिस्तान की भागीदारी का फैसला किया किसने? आज तक किसी को पता नहीं चल सका.

बस एक बयान जारी हुआ जेद्दा से और दो करोड़ जनता को मालूम हुआ कि पाकिस्तान इस मैच में भी खेल रहा है.

फिर जनरल राहील कब, कैसे और किन शर्तों पर सऊदी अरब गए किसी को कुछ नहीं पता. खुद सरकार ने भी कहा कि उन्हें एनओसी दे दी गई है फिर कहा नहीं दी है और आखिर में रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने माना कि हां, शायद दे दी है.

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इससे हमारी अदना सी अक्ल से तो जो नतीजा निकाला जा सकता है वह यही है कि हाल के भाग-दौड़ का मकसद खाड़ी देशों और कतर के बीच हालिया तनाव में कमी की कोई कोशिश हो सकती है.

अगर ये बात सही है तो इस बाबत लोगों को यहाँ विश्वास में लेने में क्या दिक्कत थी? जनता के सामने पूरी स्थिति रखने में क्या प्रॉब्लम है.

आखिर जिस विमान में यात्रा की गई और जो तेल जलाया वह तो इसी जनता के खून-पसीने की कमाई से दिए हुए टैक्स से आया है.

इतना तो उनका हक बनता है कि नहीं? जिस देश को पूर्णकालिक विदेश मंत्री न मिल सकता हो वहाँ विदेश नीति के कारखाने खोजने की जरूरत क्या है.

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