क्या चीन वाकई ताइवान को ख़त्म कर सकता है?

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
चीन और ताइवान के उलझे रिश्ते

पनामा ने ताइवान के साथ लंबे समय से चले आ रहे अपने राजनयिक संबंधों को तोड़ लिया है और चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर लिए हैं.

ताइवान के विदेश मंत्री डेविड ली ने ताइवान पर आरोप लगाते हुए कहा कि पनामा ने आर्थिक फायदे के लिए ताइवान के साथ अपने रिश्तों को बेच दिया.

तो कहानी ये है कि पानामा ने ताइवान को छोड़ा और चीन का हाथ थाम लिया, पर क्या ये सिर्फ आर्थिक फायदे का है या फिर चीन ने अपनी दबाब की रणनीति का इस्तेमाल किया है.

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "पनामा नहर ही उनके देश की अर्थव्यस्था का मुख्य आधार है. अमरीका के बाद चीन ही इस नहर का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करता है. कुछ साल पहले चीन ने सेंट्रल अमरीकन बेस वॉटर प्रोजेक्ट शुरू किया है जो कि पनामा नहर को चुनौती दे सकता है. साथ ही चीन की दबाव की रणनीति तो है ही."

ताइवान मामले में 'आग से खेल रहे हैं ट्रंप'

'वन-चाइना पॉलिसी' के बारे में ट्रंप का बड़ा बयान

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption वैश्विक व्यापार के लिए पनामा नहर बहुत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है

चीन ताइवान तनाव की जड़

दरअसल ये उलझा मामला है चीन और ताइवान के बीच, और दोनों ही देश खुद को असली चीन कहते हैं. चीन ताइवान के बीच तनाव की जड़ें इन देशों के अतीत में हैं.

इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज़ स्टडीज दिल्ली में एडजंक्ट फैलो अतुल भारद्वाज कहते हैं, "इसकी जड़ें 1930 के दशक में चीन के गृह युद्ध तक जाती हैं, ये चीन की नेशनलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच जंग का नतीजा है. 1949 में जब माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी जीत गई तो चीन के बड़े हिस्से पर इसका प्रभुत्व स्थापित हो गया. चांग काई शेक अपने समर्थकों के साथ ताइवान चले गए थे. तब से लेकर अब तक इस बात को लेकर संघर्ष जारी है कि कौन असली चीन का प्रतिनिधित्व करता है."

एक ओर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (पीआरसी), जिसे आम तौर पर चीन कहा जाता है, वो साल 1949 में बना था. इसके तहत मेनलैंड चीन और हांगकांग-मकाऊ जैसे दो विशेष रूप से प्रशासित क्षेत्र आते हैं.

दूसरी तरफ़ रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (आरओसी) है, जिसका साल 1911 से 1949 के बीच चीन पर कब्ज़ा था, लेकिन अब उसके पास ताइवान और कुछ द्वीप समूह हैं. इसे आम तौर पर ताइवान कहा जाता है.

चीन-ताइवान के बीच ऐतिहासिक समझौता

ताइवान की पहली महिला राष्ट्रपति

इमेज कॉपीरइट CENTRAL PRESS
Image caption चांग काई शेक अपने समर्थकों के साथ ताइवान चले गए थे.

'वन चाइना पॉलिसी'

दशकों तक चीन और ताइवान के बीच बेहद कड़वे संबंध होने के बाद 1980 के दशक में दोनों रिश्ते बेहतर होने शुरू हुए.

उस वक्त चीन ने 'वन कंट्री टू सिस्टम' के तहत ताइवान के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर वो अपने आपको चीन का हिस्सा मान लेता है तो उसे स्वायत्तता प्रदान कर दी जाएगी. लेकिन ताइवान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

दुनिया भर के देश जो कि चीन या फिर ताइवान के साथ संबंध रखते हैं वो वन 'वन चाइना पॉलिसी' के आधार पर रखते हैं.

अतुल भारद्वाज कहते हैं, "वन चाइना पॉलिसी का मतलब ये है कि दुनिया के जो देश पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (चीन) के साथ कूटनीतिक रिश्ते चाहते हैं, उन्हें रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (ताइवान) से सारे आधिकारिक रिश्ते तोड़ने होंगे."

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption चेन श्वाय बियान ने खुलेआम ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन किया

अमरीका कभी ताइवान का तो कभी चीन का

दोनों देशों की खींचतान में अमरीका को ताइवान का सबसे अहम और एकमात्र दोस्त माना जाता रहा है.

दूसरे विश्व युद्ध से साल 1979 तक अमरीका ताइवान के संबंध काफी अच्छे रहे.

1979 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने चीन से रिश्ते प्रगाढ़ करने की पहल करते हुए ताइवान के साथ अपने राजनयिक संबंध तोड़ लिए और चीन की वन चाइना पॉलसी को मान लिया.

ताइवान को लेकर अमरीका और चीन के बीच सबसे ज़्यादा तनाव तब देखा गया जब साल 1996 में ताइवान के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान चीन ने मिसाइल परीक्षण किए.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption जिमी कार्टर और बिल क्लिंटन

सुरक्षा की गारंटी

जवाब में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने बड़े पैमाने पर अमरीकी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया जिसे वियतनाम युद्ध के बाद एशिया में सबसे बड़ा अमरीकी सैन्य प्रदर्शन कहा गया.

अमरीका ने ताइवान की ओर बड़े युद्धक अमरीकी जहाज़ भेजे और चीन को संदेश देने की कोशिश की कि ताइवान की सुरक्षा से अमरीका कोई समझौता नहीं करेगा.

अतुल भारद्वाज कहते हैं, "अमरीका साम्यवादी विचारधारा में विभाजन करना चाहता था तो उसने चीन के साथ दोस्ती तो निभाई लेकिन उसने ताइवान के साथ रक्षा समझौता जारी रखा. इसका मतलब ये है कि अगर चीन ताइवान को अपने साथ मिलाने के लिए कोई युद्ध छेड़ता है तो वो उसे सुरक्षा की गारंटी देता है."

इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption अमरीका राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद ताइवान की राष्ट्रपति साइ इंग वेन को फोन किया था

अफ़्रीका और कैरेबियाई क्षेत्र के कई छोटे देश अतीत में वित्तीय सहयोग के चलते चीन और ताइवान, दोनों से बारी-बारी रिश्ते बना और तोड़ चुके हैं.

ताइवान ओलंपिक खेल जैसे अंतरराष्ट्रीय समारोह में 'चीन' का नाम इस्तेमाल नहीं कर सकता.

इसकी वजह वो लंबे समय से ऐसे मंचों पर 'चाइनीज़ ताइपे' के नाम के साथ शिरकत करता है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption चीन और पनामा के विदेश मंत्री

ताइवान ख़त्म होने की कगार पर?

पनामा ने तो ताइवान का साथ तो छोड़ दिया पर अगर इसी तरह दुनिया के बाकी देश भी एक एक करके ताइवान को छोड़ कर चीन से राजनयिक संबंध स्थापित करते रहे तो फिर ताइवान का भविष्य क्या है.. कहीं वो दुनिया में अलग थलग तो नहीं पड़ जाएगा..

प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "करीब 22 देश ऐसे हैं जो ताइवान को मान्यता देते हैं तो ऐसा नहीं कि बस कुछ ही महीनों में वो बदल जाएंगे और ताइवान अकेला रह जाएगा. आज चीन की ताकत उसकी आर्थिक व्यवस्था है. लेकिन ताइवान का निवेश भी बहुत से देशों में हैं. करीब 70 देशों के साथ उसके आर्थिक संबंध हैं, पूरी दुनिया से उनका संबंध बना हुआ है. तो बहुत जल्द ताइवान मिट जाएगा, ऐसा नहीं होने वाला है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे