क्या सऊदी अरब क़तर पर बना रहा है हद से ज़्यादा दबाव

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Image caption कई खाड़ी देशों ने क़तर एयरवेज के लिए अपने हवाई क्षेत्र बंद कर दिए हैं

क़तर के मामले में खाड़ी देशों में रहने वाले अभी भी दहशत में हैं. सऊदी अरब ने कई अन्य खाड़ी देशों के साथ मिलकर क़तर पर अप्रत्याशित प्रतिबंध लगाए हैं.

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इन आर्थिक और राजनयिक प्रतिबंधों के लिए क़तर को जिम्मेदार ठहराया गया है. क़तर पर आरोप है कि इस देश ने चरमपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के साथ ही क्षेत्रीय शांति भंग की.

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क़तर ने इन दोनों आरोपों का खंडन किया है. फिलहाल, खाड़ी देशों ने क़तर के लिए अपने हवाई क्षेत्रों को बंद कर दिया है, सीमा पर सामान की आवाजाही रोक दी गई है.

इसके साथ ही क़तर के नागरिकों को खाड़ी देशों से बाहर निकाल दिया गया है.

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ऐसे में गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल के रूप में सामने आए खाड़ी अरब देशों की एकता के दिखावे से पर्दा उठ चुका है.

अब, जैसी कि अपेक्षा है, खाड़ी देशों में जारी ये संकट बातचीत के जरिए सुलझा लिया जाएगा तो भी खाड़ी दुनिया पहले जैसी कभी नहीं रहेगी.

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Image caption दोहा, क़तर की राजधानी (फाइल फोटो)

इस क्षेत्र से जुड़ा ये भय उभरकर सामने आ रहा है कि कहीं ये क्षेत्र एक नए और खतरनाक़ रास्ते पर आगे न बढ़ जाए.

ट्रंप भी हैं एक बड़ी वजह

क़तर के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की शुरुआत सऊदी अरब, सयुंक्त अरब अमीरात, बहरीन और मिस्र ने की है. इन चारों देशों में सुन्नी समुदाय से आने वाले मुस्लिम नेताओं का राज है.

ये नेता दुनिया को सिर्फ ईरान और राजनीतिक इस्लाम की नज़र से देखते हैं. इसमें हिंसक जिहाद भी शामिल है. ये देश क़तर पर इन दोनों चीजों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं.

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ईरान के मामले में भी इन चारों देशों के आरोप अतिश्योक्ति नज़र आते हैं. ईरान और क़तर दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस घनीभूत क्षेत्र दक्षिण पार्स और उत्तरी डोम क्षेत्र में साझीदार हैं.

भूगोल ने भी क़तर को ईरान का पड़ोसी बनाया है. ऐसे में उन्हें साथ घुलने मिलने की जरूरत है. लेकिन सऊदी अरब का नेतृत्व ट्रंप द्वारा ईरान की आलोचना होने के बाद पूरे खाड़ी अरबी देशों को इसके प्रतिद्वंदी ईरान के खिलाफ खड़े देखना चाहेगा.

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ऐसे में क़तर सऊदी अरब की अपेक्षाओं पर ख़रा नहीं उतर रहा है.

राजघरानों को सता रहा है सत्ता जाने का डर

राजनीतिक इस्लाम के मुद्दे पर अरब देशों के वंशवादी राजघरानों का क़तर से परेशान होना समझ में आता है. क़तर का सत्तारूढ़ राज परिवार अल थानी लंबे समय से मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन करता आया है.

ब्रदरहुड पूरी इस्लामी दुनिया में एक ख़लीफा होने का समर्थन करता है जिससे वर्तमान राज घरानों का अंत हो जाएगा. क़तर ने मिस्र, लीबिया, सीरिया, और गाज़ा पट्टी में इस्लामी घटनाओं का समर्थन किया है.

क़तर ने देश के सैटेलाइट चैनल अल जज़ीरा पर अरब नेताओं के निंदकों को जगह दी. हालांकि, क़तर के सरकारी टीवी चैनल पर ऐसा नहीं किया गया. सऊदी अरब अमीरात के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने मुझे बताया कि वह मुस्लिम ब्रदरहुड को अपने लिए खतरा मानते हैं.

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Image caption सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान

सऊदी अरब पहले ही सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद को अपदस्थ करने की असफल कोशिश में सीरिया के सुन्नी लड़ाकों पर सैकड़ों मिलियन डॉलर खर्च चुका है.

इनमें से कुछ पैसा कथित संगठन इस्लामिक स्टेट के पास भी पहुंचा है. हालांकि, इस बात में कोई शक नहीं है कि क़तर के सीरिया में कार्यरत अल-कायदा के एक गुट अल-नुसरा के साथ संबंध थे.

मेरी एक दोहा यात्रा के दौरान, खुफिया विभाग के अधिकारियों ने मुझे बताया कि कैसे उन्होंने साल 2014 में अल-नुसरा से बंधकों को छुड़वाया था.

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आम तौर पर, ये संगठन बंधकों को छोड़ने के बदले में कोई मांग करते.

इस साल अप्रैल में खबर आई थी कि क़तर ने बंधकों को छुड़ाने के लिए ने चरमपंथियों को एक बिलियन डॉलर की कीमत चुकाई थी. इसमें से कुछ हिस्सा इराक़ में चरमपंथी संगठनों को गया और कुछ हिस्सा ईरान को गया.

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Image caption क़तर में कार्यरत मजदूर

ये कीमत 26 राजकुमारों को छुड़वाने के लिए चुकाई गई थी जिन्हें शिकार खेलते समय अगवा कर लिया गया था. क़तर इस बात से इनकार करता है.

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क़तर को अलग-थलग करने और इस देश को सजा देने पर कई मुल्क सहमत हैं. लेकिन इस पूरे मामले का नेतृत्व सऊदी अरब के रक्षा मंत्री और क्राउन प्रिंस 31 वर्षीय मोहम्मद बिन सलमान कर रहे हैं.

ऐसे में अब ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या मोहम्मद बिन सलमान ने हद पार कर दी है.सऊदी अरब के पास फिलहाल समस्याओं की कोई कमी नहीं है.

सऊदी अरब ने हाल ही में यमन में सयुंक्त अरब अमीरात के साथ दो सालों तक एक विनाशकारी युद्ध लड़ा है जिसका हल अभी तक नहीं निकल सका है.

वहीं, ये मुल्क शिया बहुल्य पूर्वी प्रांत में उबलते विद्रोह से भी निपट रहा है. सऊदी अरब अभी भी कथित इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा है.

ये चरमपंथी संगठन इसी महीने में सऊदी अरब की कई मस्जिदों को निशाना बना चुका है और नए हमलों की चेतावनी दी है. क़तर को एक लंबे समय तक अलग-थलग रखने के आर्थिक नुकसान भी देखने को मिल सकते हैं.

खाड़ी अरब देशों को अपनी तेजी से बढ़ती युवा जनता को नौकरियां देने के लिए क्षेत्र में व्यापार के लिए बेहतर माहौल और स्थायित्व भी चाहिए. ये जानना मुश्किल है कि खाड़ी दुनिया में बनी हुई वर्तमान स्थिति से इस क्षेत्र की शांति को कितना नुकसान होगा.

लेकिन क़तर संकट के बने रहने से इस क्षेत्र में इन देशों के बीच दरारें गहरी होंगीं जिनसे न सिर्फ क़तर और इसकी छोटी सी जनसंख्या को नुकसान होगा बल्कि पूरे क्षेत्र पर संकट पैदा होगा.

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