ब्लॉग: 'धोनी जैसे लोग कम सही पर याद सबसे ज़्यादा रहते हैं'

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मैंने पिछले हफ़्ते क्या कहा था? यही ना कि मुद्दा मैच जीतना नहीं इंडिया या पाकिस्तान में से किसी एक को हराना है.

और वही हुआ. फ़र्ज़ करें यही मैच पाकिस्तान की बजाय साउथ अफ्रीका जीतता तो क्या कानपुर में ग़ुस्से में लोग-बाग टीवी तोड़ते? क्या पेशावर में हवाई फ़ायरिंग से पांच बच्चे ज़ख़्मी होते?

मुझे तो सबसे अच्छी मैच के पहले की एक तस्वीर लगी जिसमें महेंद्र सिंह धोनी ने पाकिस्तानी कप्तान सरफ़राज़ अहमद के बच्चे को गोद में उठाया हुआ है.

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पहली बार किसी इंडियन क्रिकेटर पे प्यार आया जिसने किसी पाकिस्तानी क्रिकेटर को बेवक़ूफ़ कहा हो- यानी आमिर सोहेल को.

सुना है भारत ने पाकिस्तान को हॉकी में सात गोल ठोक दिए. पाकिस्तानी चैनलों में इस ख़बर के लिए स्क्रीन के निचले हिस्से में चलने वाली पट्टी पे भी कोई जगह नहीं थी.

और अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी ने इस पर प्रोग्राम कर डाला.

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ये प्रोग्राम उसी चैनल पे ही हो सकता था जहां हॉकी में भारत की विजय से भी ज़्यादा ख़ुशी इस बात की मनाई गई कि भारतीय टीम ने काली पट्टियां बांध के इन-प्रोटेस्ट मैच खेला. यानी 'ए आतंकवादियों हम तुम्हारी शक्ल नहीं देखना चाहते लेकिन क्या करें टूर्नामेंट की मजबूरी है.'

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तो फिर भारतीय क्रिकेट टीम की वतन से मोहब्बत के बारे में अर्नब जी क्या कहेंगे जिन्होंने बिना काली पट्टी बांधे ओवल में पाकिस्तान का सामना किया. कहिए ना देशद्रोही.

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अकबर के ज़माने में प्राइवेट टीवी चैनल होते तो?

क्या मोदी जी ने पाकिस्तानी टीम को अब तक बधाई का ट्वीट किया? करना चाहिए. खेल में क्या भेदभाव. खिलाड़ी तो सांझे होते हैं.

कल तक तुम जीतते रहे, आज हम जीत गए. कल जाने कौन जीते? कल हो ना हो?

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तभी तो मैं कहता हूं कि खिलाड़ी नेताओं और एंकरों से अच्छे ही होते हैं. जो करते हैं सामने करते हैं, नहीं करते तो वो भी सामने आ जाता है.

ना उनकी हार में मिलावट, ना उनकी जीत में.

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इंडिया पाकिस्तान के क्रिकेटर मैदान के बाहर एक दूसरे से कैसे मिलते हैं ये सुनने की भी बातें है और सीखने की भी. पर ये रामपेटी सियासत इतनी निगोड़ी है कि एंकर्स छोड़ अच्छे भले क्रिकेटर नेता को भी तंगदिल बना देती है.

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एक ऐसे वक़्त जब पूरी पाकिस्तानी क़ौम ख़ुश है, वर्ल्ड कप 1992 के विजेता इमरान ख़ान का ट्वीट पढ़ने लायक़ है.

पाकिस्तान भारत को हरा कर चैंपियन बन गया, अब पूरी क़ौम को भ्रष्टाचार माफ़िया के हारने का इंतज़ार है. यानी ख़ान साहब ने कल भी सियासत से छुट्टी नहीं की और बधाई के दूध में मेगनिया डालना ज़रूरी समझा.

हालांकि यही मेगनिया आज तक के लिए भी सैंती जा सकती थी.

अर्नब हो कि इमरान ख़ान कि आमिर सोहेल ऐसी मख़लूक़ हर देश में पाई जाती है.

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धोनी जैसे लोग कम सही पर याद सबसे ज़्यादा रहते हैं.

यूं गया शनिवार और इतवार बहुत देर तलक याद रहेगा, आज से फिर घटियापन शुरू.

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